Jagdish Sharma
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।। ॐ ।।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ।।११/४८।।
अर्जुन ! इस मनुष्यलोक में इस प्रकार विश्वरूपवाला मैं न वेद से, न यज्ञ से, न अध्ययन से, न दान से, न क्रिया से, न उग्र तप से और न तेरे सिवाय किसी अन्य से देखा जाने को सम्भव हूँ अर्थात् तेरे सिवाय यह रूप अन्य कोई देख नहीं सकता। तब तो गीता आपके लिये बेकार है। भगवद्दर्शन की भी योग्यताएँ अर्जुन तक सीमित रह गयीं, जबकि पीछे बता आये हैं कि- अर्जुन! राग, भय और क्रोध से रहित अनन्य मन से मेरी शरण हुए बहुत से लोग ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। यहाँ कहते हैं- तेरे सिवाय न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। अतः अर्जुन कौन है? क्या कोई पिण्डधारी है? क्या कोई शरीरधारी है? नहीं, वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है। अनुरागविहीन पुरुष न कभी देख सका है और न भविष्य में कभी देख सकेगा। सब ओर से चित्त समेटकर एकमात्र इष्ट के अनुरूप राग ही अनुराग है। अनुरागी के लिये ही प्राप्ति का विधान है। #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #यथार्थ गीता
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