sn vyas
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#भक्ति #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
`~ एक ब्राह्मण शालिग्राम रख कर विष्णु जी की तपस्या कर रहा था । तदोपरांत विष्णु सहित लक्ष्मी , इंद्र आदि देवता वहां उस ब्राह्मण के पास जाते हैं ।`
*ददर्श स महाविष्णुं ब्रह्मेन्द्रादिसमन्वितम् ।*
*ततः प्रणम्य बहुधा स्तुत्वा स्तोत्रैरुपस्थितः ॥*
`~ उन्होंने वहाँ ब्रह्मा , इंद्र आदि देवताओं से युक्त महाविष्णु को देखा । तदोपरांत बारंबार प्रणाम कर स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की ।`
*स ययाचे वरं देव मोक्षं देहि जनार्दन ।*
`~ तब उन्होंने वर माँगा — हे देव ! हे जनार्दन ! मुझे मोक्ष प्रदान कीजिए ।`
*ततो विष्णुरुवाचेदं वचनं सार्थकं मुनिम् ।*
*त्वया घोरं तपस्तप्तं मामुद्दिश्य वृथा श्रमात् ॥*
`तब विष्णु ने उस मुनि से यह सार्थक वचन कहा — “तुमने मुझे लक्ष्य बनाकर अत्यंत कठोर तप किया है , किन्तु यह व्यर्थ का श्रम है ।`
*मोक्षदाने न शक्तोऽहं सर्वथा मुनिपुङ्गव ।*
*स्वर्गापवर्गलाभाय सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥*
`— हे श्रेष्ठ मुनि ! मैं किसी भी प्रकार से मोक्ष देने में समर्थ नहीं हूँ । स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति के कारण वही हैं जो सृष्टि , स्थिति तथा प्रलय के कारण हैं ।`
*शरणं व्रज देवेशं महादेवं महेश्वरम् ।*
*मोक्षप्रदाता भगवान् देवदेवोत्तमः शिवः ॥*
`— देवेश महादेव महेश्वर की शरण में जाओ । मोक्ष देने वाले भगवान , देवों में श्रेष्ठ शिव ही हैं ।`
*मामर्चयन्ति बहवः शिवमायाविमोहिताः ।*
*शुक्तिः किं भविता क्वापि रजतं मुनिपुङ्गव ॥*
`— शिव की माया से मोहित होकर बहुत से लोग मेरी पूजा करते हैं । हे मुनिवर ! क्या कभी सीपी से चाँदी उत्पन्न हो सकती है❔`
*तथाहमीश्वरत्वेन ज्ञातवेदीश्वरोऽस्मि किम् ।*
*ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां चेश्वरः शिवः ॥*
`— तो क्या मुझे ही ईश्वर अथवा वेदों का स्वामी समझा जाए❔ समस्त विद्याओं औऱ समस्त प्राणियों के स्वामी तो ईशान—भगवान शिव ही हैं ।`
*विज्ञातो न तदन्यस्तु नेश्वरो विद्धि साम्प्रतम् ।*
*इति विष्णुवचः श्रुत्वा वभाषे वचनं द्विजः ॥*
`— हे द्विज ! अभी यह जान लो कि उनके अतिरिक्त कोई औऱ ईश्वर नहीं है । भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर ब्राह्मण ने उत्तर दिया ।`
*मम वैकुण्ठवासो वा दीयतां भक्तवत्सल ।*
*ततो विष्णुरुवाचेदं वचनं सुरसन्निधौ ॥*
`— हे भक्तवत्सल ! मुझे वैकुण्ठ में निवास प्रदान कीजिए । तब देवताओं की सभा में भगवान विष्णु ने यह वचन कहा ।`
*विप्र वैकुण्ठवासोऽपि मया दातुं न शक्यते ।*
*मम वैकुण्ठलाभोऽपि प्राप्तः शङ्करपूजनात ॥*
`— हे विप्र ! वैकुण्ठ का निवास भी मैं देने में समर्थ नहीं हूँ । मुझे स्वयं भी वैकुण्ठ की प्राप्ति भगवान शंकर की पूजा से ही हुई है ।`
*स्वेच्छाधिकारो नैवास्ति शिवाज्ञामतिलङ्घ्य मे ।*
*न शिवाज्ञां विना तत्र वासस्ते सुलभो भवेत् ॥*
`— मुझे अपनी इच्छा से अधिकार नहीं है कि मैं शिव की आज्ञा का उल्लंघन करूँ । शिव की आज्ञा के बिना वहाँ ( वैकुण्ठ में ) तुम्हारा निवास सहज नहीं हो सकता ।`
*न वैकुण्ठे तवावासः विना शङ्करपूजया ।*
*स्वतन्त्रः फलदाता तु शिव एव न संशयः ॥*
`— शंकर की पूजा के बिना तुम्हारा वैकुण्ठ में निवास नहीं हो सकता । फल देने में पूर्णतः स्वतंत्र केवल शिव ही हैं— इसमें कोई संदेह नहीं ।`
*स सम्यक्पूजितश्चेत्स्यात्तवाभीष्टं प्रयच्छति ।*
*अस्वतन्त्रा वयं सर्वे वरदानेऽब्जजादयः ॥*
`— यदि शिव की विधिपूर्वक पूजा की जाए , तो वे तुम्हारी समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं । हम सब—ब्रह्मा आदि— वरदान देने में स्वतंत्र नहीं हैं ।`
*अतोऽहं स्वल्पमपि ते न दास्ये फलमीप्सितम् ।*
*तत्फलं दत्तमपि ते नोपभोगाय कल्पते ॥*
`— इसलिए मैं तुम्हें इच्छित फल का थोड़ा–सा ( अल्प/तनिक ) भी नहीं दे सकता । यदि वह फल दिया भी जाए , तो वह तुम्हारे उपभोग के योग्य नहीं होगा ।`
[ `शिव रहस्य महा इतिहास , अंश ७ अध्याय १६` ]
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