sn vyas
825 views • 18 days ago
#जय शिव शंकर
गंगाधर भगवान् शंकर
पूर्वकालकी बात है, महाराज सगर नामके चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्होंने अपने गुरु और्वके उपदेशानुसार सर्वशक्तिमान् भगवान्की आराधनाके उद्देश्यसे अश्वमेधका घोड़ा छोड़ा, परंतु इन्द्रने उसे चुराकर पातालस्थित कपिलमुनिके आश्रममें ले जाकर बाँध दिया।
महाराज सगरकी दो रानियाँ थीं- सुमति और केशिनी। महारानी सुमतिसे उत्पन्न सगरके साठ हजार पुत्रोंने अश्वमेध यज्ञके अश्वका अन्वेषण करते हुए सारी पृथ्वी खोद डाली। खोदते खोदते उन्हें पूर्व और उत्तरके कोनेपर कपिलमुनिके पास अपना यज्ञका घोड़ा दिखायी दिया। घोड़ेको देखकर वे साठ हजार राजकुमार शस्त्र उठाकर यह कहते हुए उनकी ओर दौड़ पड़े कि 'यही हमारे घोड़ेको चुरानेवाला चोर है। देखो तो सही, इसने इस समय कैसे आँखें मूँद रखी हैं।' उसी समय कपिलमुनिने अपनी आँखें खोलीं, जिससे वे उद्दण्ड सगरपुत्र क्षण-भरमें ही सब के सब जलकर खाक हो गये।
सगरकी दूसरी पत्नीका नाम था केशिनी। उसके गर्भसे उन्हें असमंजस नामका पुत्र प्राप्त हुआ था। असमंजसके पुत्रका नाम था अंशुमान्। वे अपने दादा सगरकी आज्ञाओंके पालन तथा उन्हींकी सेवामें लगे रहते थे। उनकी आज्ञासे अंशुमान् घोड़ेको ढूँढ़नेके लिये निकले। वे अपने चाचाओंके द्वारा खोदे हुए समुद्रके किनारे-किनारे चलकर भगवान् कपिलमुनिके आश्रममें पहुँचे और वहाँ बँधे अपने यज्ञीय अश्व और चाचाओंके शरीरकी भस्मको उन्होंने देखा। कपिल मुनिको देख अंशुमान्ने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और एकाग्र मनसे उनकी स्तुति करने लगे।
अंशुमान्की स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् कपिलने कहा- 'बेटा! यह घोड़ा तुम्हारे पितामहका यज्ञपशु है। इसे तुम ले जाओ। तुम्हारे जले हुए चाचाओंका उद्धार केवल गंगाजलसे होगा और कोई उपाय नहीं है।' अंशुमान्ने बड़ी नम्रतासे उन्हें प्रसन्न करके उनकी परिक्रमा की और वे घोड़ेको ले आये। सगरने उस यज्ञपशुके द्वारा यज्ञकी शेष क्रिया समाप्त की और अंशुमान्को राज्यभार सौंपकर स्वयं विषयोंसे निःस्पृह हो गये।
अंशुमान्ने गंगाजीको लानेकी कामनासे बहुत वर्षोंतक घोर तपस्या की, परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली; समय आनेपर उनकी मृत्यु हो गयी। अंशुमान्के पुत्र दिलीपने भी वैसी ही तपस्या की, परंतु वे भी असफल ही रहे; समयपर उनकी भी मृत्यु हो गयी। दिलीपके पुत्र थे भगीरथ; उन्होंने बहुत बड़ी तपस्या की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगाजीने उन्हें दर्शन दिया और वर माँगनेको कहा। उनके ऐसा कहनेपर राजर्षि भगीरथने बड़ी विनम्रतासे अपना अभिप्राय प्रकट किया कि 'आप मर्त्यलोकमें चलिये।'
गंगाजीने कहा- 'भगीरथ ! जिस समय मैं स्वर्गसे भूतलपर गिरूँ, उस समय मेरे वेगको कोई धारण करनेवाला होना चाहिये। ऐसा न होनेपर मैं पृथ्वीको फोड़कर रसातलमें चली जाऊँगी।'
भगीरथने कहा- 'माता ! समस्त प्राणियोंके आत्मा रुद्रदेव आपके वेगको धारण कर लेंगे; क्योंकि जैसे साड़ी सूतोंमें ओत-प्रोत है, वैसे ही यह सारा विश्व भगवान् रुद्रमें ओत-प्रोत है।'
गंगाजीसे इस प्रकार कहकर राजा भगीरथने तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न किया। भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण विश्वके हितैषी हैं, राजाकी बात उन्होंने स्वीकार कर ली। फिर सावधान होकर भगवान् शंकरने गंगाजीको अपने सिरपर धारण किया, इससे उनका एक नाम 'गंगाधर' भी हो गया।
इसके बाद राजर्षि भगीरथ त्रिभुवनपावनी गंगाजीको वहाँ ले गये, जहाँ उनके पितरोंके शरीर राखके ढेर बने पड़े थे। उस राखकी ढेरसे गंगाजीके पावन जलका स्पर्श होते ही वे सब स्वर्ग चले गये। [ श्रीमद्भागवत ]
15 shares