sn vyas
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#जय श्री कृष्ण ॥ विजयते् श्रीबालकृष्ण प्रभु ॥ "मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो" श्रीबालकृष्ण की मधुर लीला... वृन्दावन की भोर थी। ग्वालिनें अपने घरों में माखन मथ रही थीं। चारों ओर दही-माखन की सुगंध फैली हुई थी। तभी नटखट नन्दलाल अपने सखा सुदामा, श्रीदामा और अन्य ग्वालबालों के साथ धीरे-धीरे एक घर में पहुँच गए। कान्हा ने मुस्कुराकर कहा— "सखाओं! देखो, इस घर का माखन तो बहुत ही स्वादिष्ट लगता है। चलो, थोड़ा-सा प्रसाद ग्रहण करें।" सखा बोले— कन्हैया! यदि मैया को पता चल गया तो? कान्हा हँस पड़े— अरे! मैं हूँ न। सब ठीक हो जाएगा। फिर क्या था! किसी ने पीढ़ा रखा, किसी ने कंधा दिया, और नन्दलाल मटकी तक पहुँच गए। मटकी फोड़ी, माखन निकाला, स्वयं खाया और बंदरों को भी खिलाया। इसी बीच घर की गोपी आ गई। उसने देखा—श्यामसुन्दर के मुख पर माखन लगा है और हाथ में भी माखन है। वह बोली— "अरे! आज तो रंगे हाथों पकड़ लिया। चलो, अब तुम्हारी शिकायत यशोदा मैया से करती हूँ।" सभी गोपियाँ मिलकर नन्दभवन पहुँचीं। वे बोलीं— "यशोदा! तुम्हारा लाल बड़ा शैतान हो गया है। रोज़ हमारे घर आकर माखन चुरा लेता है, मटकी फोड़ देता है और बंदरों को भी खिला देता है।" माता यशोदा ने कान्हा को बुलाया। श्री बालकृष्ण धीरे-धीरे आए, सिर झुकाए, पर आँखों में वही चंचल मुस्कान थी। यशोदा ने पूछा— कन्हैया! सच-सच बता, क्या तूने माखन खाया? तब नटखट कान्हा ने भोलेपन से दोनों हाथ जोड़कर कहा— "मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो।" फिर बड़ी चतुराई से अपनी सफाई देने लगे— "ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायो। देखु तुही, छीके पर भाजन ऊँचे धरि लटकायो। हौं जु कहत नान्हें कर अपने, मैं कैसे करि पायो?" अर्थात— "मैया! मेरे सभी सखाओं ने मिलकर मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। तुम ही बताओ, इतनी ऊँचाई पर रखी मटकी तक मेरे छोटे-छोटे हाथ कैसे पहुँच सकते हैं?" मैया ने मुस्कुराकर कहा— "तो फिर तेरे हाथों में माखन कैसे आया?" कान्हा तुरंत बोले— "मैया! मैं तो बंदरों को भगाने गया था। उन्होंने मेरे हाथ में माखन लगा दिया। मैंने तो कुछ भी नहीं खाया।" सारी गोपियाँ हँसी से लोटपोट हो गईं। यशोदा ने फिर पूछा— "और तेरे होंठों पर जो माखन लगा है?" श्रीबालकृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया— मैया! ये सब झूठा इलज़ाम है। सखाओं ने मेरे मुख पर लगा दिया है। मैं तो निर्दोष हूँ। कन्हैया की तोतली वाणी, भोला चेहरा और मनमोहक मुस्कान देखकर यशोदा का हृदय पिघल गया। उन्होंने नन्हे कान्हा को गोद में उठा लिया और बोलीं.. "लाला! चाहे तू माखन खाए या सारी गोकुल की मटकी फोड़ दे, तू तो मेरी आँखों का तारा है।" कान्हा हँस पड़े और मैया के गले से लिपट गए। इसी प्रेमपूर्ण लीला का वर्णन सूरदास ने अपने अमर पद में किया है मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो। ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायो॥ यह केवल माखन चोरी की कथा नहीं है। माखन भक्त के निर्मल, प्रेममय हृदय का प्रतीक है। जैसे माखन दही को मथने से निकलता है, वैसे ही भक्ति, साधना और प्रेम से शुद्ध हुआ हृदय भगवान को सबसे प्रिय होता है। इसलिए नंद किशोर "माखन चुराते" नहीं, बल्कि अपने भक्तों का निष्कलुष प्रेम स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि आज भी भक्त प्रेम से गाते हैं... "मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो…" और इस मधुर लीला का स्मरण करते ही वृन्दावन की गलियाँ, यशोदा का वात्सल्य और बाल गोपाल की मोहक मुस्कान मन में सजीव हो उठती है। जय हो माखन चोर कान्हा... जय हो नन्दलाला.... .
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