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स्वाती बूँद पीयूष सी, राधिका रूप अनूप:
प्रकृति और साहित्य में स्वाति नक्षत्र की बूँद को अत्यंत पवित्र और दुर्लभ माना गया है, जिसे पाकर सीप में मोती बनता है। यहाँ श्रीराधा का अनुपम (जिसकी किसी से तुलना न हो सके) रूप और उनका सौंदर्य स्वाति नक्षत्र की उस अमृत (पीयूष) रूपी बूँद के समान है, जो अत्यंत अलौकिक, दिव्य और जीवनदायिनी है।
चातक ह्वै रस पीवते, मोहन स्याम सरूप:
चातक पक्षी की यह विशेषता होती है कि वह प्यास से मर जाएगा, लेकिन केवल स्वाति नक्षत्र के जल की बूँद ही ग्रहण करता है। इस दोहे में सांवले सलोने श्रीकृष्ण (मोहन) को उसी निष्ठावान चातक पक्षी के रूप में दर्शाया गया है। वे राधा जी के इस अलौकिक रूप-रस को पीने के लिए व्याकुल रहते हैं। उनके दिव्य सौंदर्य और प्रेम का रसपान करके ही मोहन की अंतरात्मा तृप्त होती है।
राधे राधे.
जय श्रीकृष्ण.
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