sn vyas
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#जय श्री राधे वृंदावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं, प्रेमामृतैक मकरन्द रसौघपूर्णम् । ह्रधर्पितं मधुपतेः स्मरतापमुग्रं, निर्वापयत्परम शीतलमाश्रयामि ।। भावार्थ :- हे श्री वृंदावनेश्वरी राधे जू ! आपके ये परम शीतल युगल चरण कमल नित्य ही एकान्तिक प्रेमामृतमय मकरन्द के रस प्रवाह से परिपूर्ण हैं ।आप के जिन चरण युगल को निज ह्रदय मे पधराने से रसिक भ्रमर प्रीतम श्याम सुन्दर का तीक्ष्ण काम ताप भी दूर हो जाता हैं । मैं उन्ही चरणो का आश्रय ग्रहण करती हूं ।। ...
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