sn vyas
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 🍁बाहर-भीतर से चुप जायँ🍁 🌍संसार में बहुत-से पुण्यकर्म होते हैं, पर क्या हमें उनसे पुण्य होता है ? ऐसे ही संसार में बहुत- से पापकर्म होते हैं, पर क्या हमें उनका पाप लगता है ? नहीं लगता। क्यों नहीं लगता ? कि हमारा उनसे सम्बन्ध नहीं है। उनके साथ हमारा सहयोग नहीं है। जैसे संसार में पुण्य-पाप हो रहे हैं, ऐसे ही मन में संकल्प-विकल्प हो रहे हैं। हम उनको करते नहीं और करना चाहते भी नहीं। जब हम उनके साथ चिपक जाते हैं तो उनकी पुण्य और पाप की, अच्छे और बुरे की संज्ञा हो जाती है, जिससे उनका फल पैदा हो जाता है और वह फल हमें भोगना पड़ता है। इसलिये उनके साथ मिले नहीं। न अनुमोदन करें, न विरोध करें। संकल्प-विकल्प उठते हैं तो उठते रहें। यह करना है और यह नहीं करना है- इन दोनों को त्याग दें। गीता में आया है-🌍 *नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।* (३।१८) 🛐करने और न करने- दोनों का ही आग्रह न रखें। करने का आग्रह रखना भी संकल्प है और न करने का आग्रह रखना भी संकल्प है। करना भी कर्म है और न करना भी कर्म है। करने में भी परिश्रम है और न करने में भी परिश्रम है। अतः करने और न करने- दोनों से किंचिन्मात्र भी कोई मतलब न रख कर चुप हो जायँ तो प्रकृति का सम्बन्ध छूट जाता है और स्वतः परम विश्राम प्राप्त हो जाता है; क्योंकि क्रियारूप से प्रकृति ही है। वह क्रिया चाहे शरीर की हो, चाहे मन की हो, सब प्रकृति की ही है। इस प्रकार बाहर-भीतर से चुप हो जायँ तो जिसको तत्त्वज्ञान कहते हैं, जीवन्मुक्ति कहते हैं, सहज समाधि कहते हैं, वह स्वतः हो जायगी।🛐 🙏*राम !राम!.राम !!!*🙏
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