sn vyas
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#श्री रामेश्वरम शिवलिंग रामेश्वरम कथा:: यह कथा भारत में अत्यंत लोकप्रिय लोककथाओं में से एक है, किंतु यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस या अन्य प्रमुख प्राचीन रामायणों में इस रूप में वर्णित नहीं मिलता। यह बाद की लोकपरंपराओं और कुछ क्षेत्रीय कथाओं में प्रचलित है। उसी लोककथा को भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया जा रहा है। रामेश्वरम में रावण द्वारा शिवलिंग स्थापना की अद्भुत कथा:: समुद्र की लहरें मंद-मंद स्वर में "हर-हर महादेव" का गान कर रही थीं। एक ओर करोड़ों वानरों की सेना थी, दूसरी ओर अथाह समुद्र। भगवान श्रीराम दूर क्षितिज की ओर देख रहे थे। उनका हृदय युद्ध की नहीं, धर्म की चिंता से भरा था। उन्होंने मन ही मन कहा— "युद्ध केवल विजय पाने के लिए नहीं, धर्म की स्थापना के लिए होता है।" तभी महर्षियों ने निवेदन किया— "हे रघुनन्दन! लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व भगवान शिव का पूजन आवश्यक है। शिवलिंग की स्थापना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कीजिए।" श्रीराम ने विनम्र होकर कहा— "महादेव मेरे आराध्य हैं। उनकी कृपा के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।" उन्होंने शिव का स्मरण किया— नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। तब उठी एक अद्भुत बात ऋषियों ने कहा— "यज्ञ तभी पूर्ण होगा जब कोई महान वेदज्ञ, परम शिवभक्त ब्राह्मण उसका आचार्य बने।" सब मौन हो गए। श्रीराम मुस्कुराए। उन्होंने कहा— "तीनों लोकों में शिवतत्त्व का सबसे बड़ा ज्ञाता यदि कोई है, तो वह लंका का राजा रावण है।" यह सुनकर लक्ष्मण चौंक उठे। "भैया! वही रावण जिसने माता सीता का हरण किया?" राम बोले— "शत्रु होने से किसी के ज्ञान का अपमान नहीं किया जाता। धर्म हमें यही सिखाता है।" निमंत्रण यामवन्त जी को संदेश लेकर लंका भेजा गया। रावण सभा में बैठा था। यामवन्त ने कहा— "लंकेश्वर! प्रभु श्रीराम शिवलिंग स्थापना हेतु आपको आचार्य के रूप में आमंत्रित करते हैं।" सभा स्तब्ध रह गई। रावण कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसकी आँखों में तेज चमका। वह बोला— "राम मेरे शत्रु हैं, किन्तु शिव मेरे प्राण हैं। यदि महादेव के यज्ञ का प्रश्न है, तो रावण अवश्य जाएगा।" सीता माता को साथ ले चलना यज्ञ की तैयारी होने लगी। तब रावण ने कहा— "यज्ञ में यजमान अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठता है। बिना अर्धांगिनी के यह अनुष्ठान पूर्ण नहीं होगा।" विभीषण ने पूछा— "तो क्या करेंगे?" रावण बोला— "सीता राम की धर्मपत्नी हैं। उन्हें यज्ञस्थल पर ले जाना होगा।" लोककथा के अनुसार रावण माता सीता को पूर्ण सम्मान के साथ यज्ञस्थल पर लाया। उसके मन में उस समय केवल यज्ञ की मर्यादा थी। राम और सीता का पुनर्मिलन:: यज्ञमण्डप में श्रीराम और सीता आमने-सामने बैठे। दोनों की आँखें भर आईं। किन्तु धर्म की मर्यादा के कारण दोनों मौन रहे। समुद्र भी जैसे शांत हो गया। वानर सेना भी निःशब्द थी। शिवलिंग की स्थापना:: रावण ने वेदमंत्रों का उच्चारण आरम्भ किया— ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ फिर उसने श्रीराम से कहा— "हे राघव! श्रद्धा से जल अर्पित करें।" राम ने दोनों हाथ जोड़कर महादेव का अभिषेक किया। रावण की अद्भुत विनम्रता:: पूजन पूर्ण हुआ। अब आचार्य को यजमान को आशीर्वाद देना था। रावण कुछ क्षण मौन रहा। उसके सामने उसका शत्रु बैठा था। किन्तु उसी क्षण उसके भीतर का ब्राह्मण जाग उठा। उसने हाथ उठाए और कहा— "विजयी भव। धर्मो जयति। अधर्मो विनश्यति।" उसके मुख से अनायास निकल पड़ा— "हे राम! धर्म की विजय हो। तुम्हारी विजय निश्चित हो।" कहा जाता है कि यह सुनते ही देवताओं ने पुष्पवृष्टि की। लक्ष्मण का आश्चर्य:: लक्ष्मण ने मन ही मन सोचा— "जो स्वयं युद्ध करने जा रहा है, वही अपने शत्रु को विजय का आशीर्वाद दे रहा है!" राम मुस्कुराए और बोले— "यही सच्चे ब्राह्मण का धर्म है। जब वह आचार्य बनता है, तब न मित्र देखता है, न शत्रु; केवल धर्म देखता है।" शिव का आशीर्वाद:: तभी आकाश में दिव्य ध्वनि गूँजी— "राम! जहाँ धर्म है, वहीं मेरी कृपा है।" समुद्र की लहरें ऊँची उठीं। सारा वातावरण "हर हर महादेव" और "जय श्रीराम" के घोष से गूँज उठा। इस कथा का संदेश:: इस लोककथा का संदेश अत्यंत गहरा है— ज्ञान का सम्मान शत्रु में भी करना चाहिए। धर्म व्यक्तिगत वैर से ऊपर होता है। सच्चा विद्वान पक्षपात नहीं करता। भगवान राम ने विनम्रता का आदर्श प्रस्तुत किया। रावण ने आचार्य बनकर यज्ञ की मर्यादा निभाई। श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्। नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद-कंजारुणम्॥ शिवाय रामरूपाय, रामाय शिवरूपिणे। शिवस्य हृदयं रामः, रामस्य हृदयं शिवः॥ हर-हर महादेव! जय श्रीराम!
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