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अपरा एकादशी को अचला एकादशी, भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी नामों से भी नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और भगवान श्रीहरि की उपासना करने से जीवन के समस्त दुख दूर होते हैं और पापों से मुक्ति मिलती है।
धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या, भूत योनि में जाना, किसी की निंदा करना, परस्त्रीगमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र बनाना या पढ़ना, और झूठा वैद्य अथवा ज्योतिष बनने जैसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत महान पुण्यदायक और कल्याणकारी माना गया है।
माघ मास में मकर संक्रांति के दिन प्रयाग में स्नान करने, काशी में शिवरात्रि का व्रत रखने, गया में पिंडदान देने, सिंह राशि में गुरु होने पर गोदावरी स्नान, बदरिकाश्रम में भगवान केदारनाथ के दर्शन और सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दान यज्ञ करने जितना पुण्य इस एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, व्रत करने और इसकी महिमा सुनने-पढ़ने से सहस्त्र गोदान जितना पुण्य भी प्राप्त होता है।
इस दिन भगवान विष्णु या उनके वामन रूप की पूजा की जाती है।
इस दिन परनिंदा, छल-कपट, लोभ और द्वेष जैसी भावनाओं से दूर रहकर भक्ति भाव से भगवान का भजन करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करें।
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