sn vyas
#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदि के द्वारा पाण्डवों के लिये शोक प्रकाश एवं जलांजलि दान तथा पाण्डवों का वन में प्रवेश...(दिन 438)
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(समेतास्तु ततः सर्वे भीष्मेण सह कौरवाः । धृतराष्ट्रः सपुत्रश्च गङ्गामभिमुखा ययुः ।। एकवस्त्रा निरानन्दा निराभरणवेष्टनाः ।
उदकं कर्तुकामा वै पाण्डवानां महात्मनाम् ।।)
उस समय भीष्म, सब कौरव तथा पुत्रोंसहित धृतराष्ट्र एकत्र हो महात्मा पाण्डवोंको जलांजलि देनेकी इच्छासे गंगाजीके निकट गये। उन सबके शरीरपर एक-एक ही वस्त्र था। वे सभी आभूषण और पगड़ी आदि उतारकर आनन्दशून्य हो रहे थे।
रुरुदुः सहिताः सर्वे भृशं शोकपरायणाः ।
हा युधिष्ठिर कौरव्य हा भीम इति चापरे ।। १६ ।।
उस समय सब लोग अत्यन्त शोकमग्न हो एक साथ रोने और विलाप करने लगे। कोई कहता- 'हा कुरुवंश-विभूषण युधिष्ठिर!' दूसरे कहते- 'हा भीमसेन !' ।। १६ ।।
हा फाल्गुनेति चाप्यन्ये हा यमाविति चापरे ।
कुन्तीमार्ताश्च शोचन्त उदकं चक्रिरे जनाः ।। १७ ।।
अन्य कोई बोलते- 'हा अर्जुन!' और इसी प्रकार दूसरे लोग 'हा नकुल-सहदेव!' कहकर पुकार उठते थे। सब लोगोंने कुन्तीदेवीके लिये शोकार्त होकर जलांजलि दी ।। १७ ।।
अन्ये पौरजनाश्चैवमन्वशोचन्त पाण्डवान्।
विदुरस्त्वल्पशश्चक्रे शोकं वेद परं हि सः ।। १८ ।।
इसी प्रकार दूसरे-दूसरे पुरवासीजन भी पाण्डवोंके लिये बहुत शोक करने लगे। विदुरजीने बहुत थोड़ा शोक मनाया; क्योंकि वे वास्तविक वृत्तान्त से परिचित थे ।। १८ ।।
(ततः प्रव्यथितो भीष्मः पाण्डुराजसुतान् मृतान् ।
सह मात्रेति तच्छ्रुत्वा विललाप रुरोद च।।
न हि तौ नोत्सहेयातां भीमसेनधनंजयौ ।
भीष्म उवाच
तरसा वेगितात्मानौ निर्भत्तुमपि मन्दिरम्।
परासुत्वं न पश्यामि पृथायाः सह पाण्डवैः ।।
सर्वथा विकृतं नीतं यदि ते निधनं गताः ।
धर्मराजः स निर्दिष्टो ननु विप्रैर्युधिष्ठिरः ।।
सत्यव्रतो धर्मदत्तः सत्यवाक्छुभलक्षणः । कथं कालवशं प्राप्तः पाण्डवेयो युधिष्ठिरः ।।
आत्मानमुपमां कृत्वा परेषां वर्तते तु यः ।
सह मात्रा तु कौव्यः कथं कालवशं गतः ।।
यौवराज्येऽभिषिक्तेन पितुर्येनाहृतं यशः । आत्मनश्च पितुश्चैव सत्यधर्मस्य वृत्तिभिः ।।
कालेन स हि सम्भग्नो धिक् कृतान्तमनर्थकम् ।।
यच्च सा वनवासेन क्लेशिता दुःखभागिनी ।
पुत्रगृध्नुतया कुन्ती न भर्तारं मृता त्वनु ।।
अल्पकालं कुले जाता भर्तुः प्रीतिमवाप या ।
दग्धाद्य सह पुत्रैः सा असम्पूर्णमनोरथा ।।
पीनस्कन्धश्चारुबाहुर्मे रुकूटसमो युवा । मृतो भीम इति श्रुत्वा मनो न श्रद्दधाति मे ।।
अनिन्द्यानि च यो गच्छन् क्षिप्रहस्तो दृढायुधः । प्रपत्तिमॉल्लब्धलक्ष्यो रथयानविशारदः ।। दूरपाती त्वसम्भ्रान्तो महावीर्यो महास्त्रवित् । अदीनात्मा नरव्याघ्रः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ।। येन प्राच्याः ससौवीरा दाक्षिणात्याश्च निर्जिताः । ख्यापितं येन शूरेण त्रिषु लोकेषु पौरुषम् ।। यस्मिञ्जाते विशोकाभूत् कुन्ती पाण्डुश्च वीर्यवान् । पुरन्दरसमो जिष्णुः कथं कालवशं गतः ।। कथं तावृषभस्कन्धौ सिंहविक्रान्तगामिनी ।
मर्त्यधर्ममनुप्राप्तौ यमावरिनिबर्हणौ ।।
तदनन्तर भीष्म जी यह सुनकर कि राजा पाण्डुके पुत्र अपनी माताके साथ जल मरे हैं, अत्यन्त व्यथित हो उठे और रोने एवं विलाप करने लगे।
भीष्मजी बोले- वे दोनों भाई भीमसेन और अर्जुन उत्साह-शून्य हो गये हों, ऐसा तो नहीं प्रतीत होता। यदि वे वेगसे अपने शरीरका धक्का देते तो सुदृढ़ मकानको भी तोड़-फोड़ सकते थे। अतः पाण्डवोंके साथ कुन्तीकी मृत्यु हो गयी है, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता। यदि सचमुच उन सबकी मृत्यु हो चुकी है, तब तो यह सभी प्रकारसे बहुत बुरी बात हुई है। ब्राह्मणोंने तो धर्मराज युधिष्ठिरके विषयमें यह कहा था कि ये धर्मके दिये हुए राजकुमार सत्यव्रती, सत्यवादी एवं शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न होंगे। ऐसे वे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर कालके अधीन कैसे हो गये? जो अपने-आपको आदर्श बनाकर तदनुरूप दूसरोंके साथ बर्ताव करते थे वे ही कुरुकुलशिरोमणि युधिष्ठिर अपनी माताके साथ कालके अधीन कैसे हो गये? जिन्होंने युवराजपदपर अभिषिक्त होते ही पिताके समान ही अपने सत्य एवं धर्मपूर्ण बर्तावके द्वारा अपना ही नहीं, राजा पाण्डुके भी यशका विस्तार किया था, वे युधिष्ठिर भी कालके अधीन हो गये। ऐसे निकम्मे कालको धिक्कार है। उत्तम कुलमें उत्पन्न कुन्ती, जो पुत्रोंकी अभिलाषा रखनेके कारण ही वनवासका कष्ट भोगती और दुःखपर दुःख उठाती रही तथा पतिके मरनेपर भी उनका अनुगमन न कर सकी, जिसे बहुत थोड़े समयतक ही पतिका प्रेम प्राप्त हुआ था, वही कुन्तिभोजकुमारी अभी अपने मनोरथ पूरे भी न कर पायी थी कि पुत्रोंके साथ दग्ध हो गयी! जिनके भरे हुए कंधे और मनोहर भुजाएँ थीं, जो मेरु-शिखरके समान सुन्दर एवं तरुण थे, वे भीमसेन मर गये, यह सुनकर भी मनको विश्वास नहीं होता। जो सदा उत्तम मार्गोंपर चलते थे, जिनके हाथोंमें बड़ी फुर्ती थी, जिनके आयुध अत्यन्त दृढ़ थे, जो गुरुजनोंके आश्रित रहते थे, जिनका निशाना कभी चूकता नहीं था, जो रथ हाँकनेमें कुशल, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, कभी व्याकुल न होनेवाले, महापराक्रमी और महान् अस्त्रोंके ज्ञाता थे, जिनके हृदयमें कभी दीनता नहीं आती थी, जो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे, जिन्होंने प्राच्य, सौवीर और दाक्षिणात्य नरेशोंको परास्त किया था, जिस शूरवीरने तीनों लोकोंमें अपने पुरुषार्थको प्रसिद्ध किया था और जिनके जन्म लेनेपर कुन्ती और महापराक्रमी पाण्डु भी शोकरहित हो गये थे, वे इन्द्रके समान विजयी वीर अर्जुन भी कालके अधीन कैसे हो गये? जो बैलके-से हृष्ट-पुष्ट कंधोंसे सुशोभित थे तथा सिंहकी-सी मस्तानी चालसे चलते थे, वे शत्रुओंका संहार करने वाले नकुल-सहदेव सहसा मृत्यु को कैसे प्राप्त हो गये?
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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