sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣1️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोण का शिष्यों द्वारा द्रुपद पर आक्रमण करवाना, अर्जुन का द्रुपद को बंदी बनाकर लाना और द्रोण द्वारा द्रुपद को आधा राज्य देकर मुक्त कर देना...(दिन 411)
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माद्रेयी चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाकरोत् । सेनाग्रगो भीमसेनः सदाभूद् गदया सह ।। २७ ।।
उस समय अर्जुनने माद्रीकुमार नकुल और सहदेवको अपने रथके पहियोंका रक्षक बनाया, भीमसेन सदा गदा हाथमें लेकर सेनाके आगे-आगे चलते थे ।। २७ ।।
तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
अयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन् दिशः ।। २८ ।।
तब शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर भाइयोंसहित निष्पाप अर्जुन रथकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ।। २८ ।।
पाञ्चालानां ततः सेनामुद्धतार्णवनिःस्वनाम् । भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ।। २९ ।।
प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा ।
स्वयमभ्यद्रवद् भीमो नागानीकं गदाधरः ।। ३० ।।
पांचालोंकी सेना उत्ताल तरंगोंवाले विक्षुब्ध महासागरकी भाँति गर्जना कर रही थी। महाबाहु भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस विशाल सेनामें घुस गये, ठीक उसी तरह जैसे समुद्रमें मगर प्रवेश करता है। गदाधारी भीम स्वयं हाथियोंकी सेनापर टूट पडे ।। २९-३० ।।
स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः ।
अहनत् कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृत् ।। ३१ ।।
कुन्तीकुमार भीम युद्धमें कुशल तो थे ही, बाहुबलमें भी उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था। उन्होंने कालरूप धारणकर गदाकी मारसे उस गजसेनाका संहार आरम्भकिया ।। ३१ ।।
ते गजा गिरिसंकाशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु ।
भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः ।। ३२ ।।
पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः ।
गजानश्वान् रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः ।। ३३ ।।
पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः ।
गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ।। ३४ ।।
चालयन् रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः ।
भीमसेनकी गदासे मस्तक फट जानेके कारण वे पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज लोहूके झरने बहाते हुए वज्रके आघातसे (पंख कटे हुए) पहाड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। अर्जुनके बड़े भाई पाण्डुनन्दन भीमने हाथियों, घोड़ों एवं रथोंको धराशायी कर दिया। पैदलों तथा रथियोंका संहार कर डाला। जैसे ग्वाला वनमें डंडेसे पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन रथियों और हाथियोंको खदेड़ते हुए उनका पीछा करने लगे ।। ३२ -३४३ ।।
वैशम्पायन उवाच
भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ।। ३५ ।।
पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात् स पाण्डवः ।
हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ।। ३६ ।।
पातयन् समरे राजन् युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! उस समय द्रोणाचार्यका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रुपदपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उनपर चढ़ आये। वे रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके झुंडोंका सब ओरसे संहार करते हुए प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ३५-३६३ ।।
ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ३७ ।।
शरैर्नानाविधैस्तूर्ण पार्थ संछाद्य सर्वशः ।
सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ।। ३८ ।।
उनके बाणोंसे घायल हुए पांचाल और सुंजय वीरोंने तुरंत ही नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया और मुखसे सिंहनाद करते हुए उनसे लोहा लेना आरम्भ किया ।। ३७-३८ ।।
तद् युद्धमभवद् घोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् ।
सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत् पाकशासनिः ।। ३९ ।।
वह युद्ध अत्यन्त भयानक और देखनेमें बड़ा ही अद्भुत था। शत्रुओंका सिंहनाद
सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन न कर सके ।। ३९ ।।
ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान् समरेऽद्रवत् ।
छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ।। ४० ।।
उस युद्धमें किरीटधारी पार्थने बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर पांचालोंको आच्छादित और मोहित-सा करते हुए उनपर सहसा आक्रमण किया ।। ४० ।।
शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।
नान्तरं ददृशे किंचित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ।। ४१ ।।
यशस्वी अर्जुन बड़ी फुर्तीसे बाण छोड़ते और निरन्तर नये-नये बाणोंका संधान करते थे। उनके धनुषपर बाण रखने और छोड़नेमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं दिखायी पड़ता था ।। ४१ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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