sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदि के द्वारा पाण्डवों के लिये शोक प्रकाश एवं जलांजलि दान तथा पाण्डवों का वन में प्रवेश...(दिन 439) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तस्य विक्रन्दितं श्रुत्वा उदकं च प्रसिञ्चतः । देशकालं समाज्ञाय विदुरः प्रत्यभाषत ।। मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाव्रत । न तेषां विद्यते पापं प्राप्तकालं कृतं मया । एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत ।। सोऽब्रवीत् किंचिदुत्सार्य कौरवाणामशृण्वताम् । क्षत्तारमुपसंगृह्य बाष्पोत्पीडकलस्वरः ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जलांजलि दान देते समय भीष्मजीका यह विलाप सुनकर विदुरजीने देश और कालका भलीभाँति विचार करके कहा- 'नरश्रेष्ठ ! आप दुःखी न हों। महाव्रती वीर ! आप शोक त्याग दें, पाण्डवोंकी मृत्यु नहीं हुई है। मैंने उस अवसरपर जो उचित था, वह कार्य कर दिया है। भारत! आप उन पाण्डवोंके लिये जलांजलि न दें।' तब भीष्मजी विदुरका हाथ पकड़कर उन्हें कुछ दूर हटा ले गये, जहाँसे कौरवलोग उनकी बात न सुन सकें। फिर वे आँसू बहाते हुए गद्‌गद वाणीमें बोले। भीष्म उवाच कथं ते तात जीवन्ति पाण्डोः पुत्रा महारथाः । कथमस्मत्कृते पक्षः पाण्डोर्न हि निपातितः ।। कथं मत्प्रमुखाः सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात् । जननी गरुडेनेव कुमारास्ते समुद्धृताः ।। भीष्मजीने कहा-तात ! पाण्डुके वे महारथी पुत्र कैसे जीवित बच गये? पाण्डुका पक्ष किस तरह हमारे लिये नष्ट होनेसे बच गया? जैसे गरुड़ने अपनी माताकी रक्षा की थी, उसी प्रकार तुमने किस तरह पाण्डुकुमारोंको बचाकर हम सब लोगोंकी महान् भयसे रक्षा की है? वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम् । आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार पूछे जानेपर धर्मात्मा विदुरने कौरवोंके न सुनते हुए अद्भुत कर्म करनेवाले भीष्मजीसे इस प्रकार कहा- विदुर उवाच धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च । विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चयः ।। ततो जतुगृहं गत्वा दहनेऽस्मिन् नियोजिते । पृथायाश्च सपुत्राया धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ।। ततः खनकमाहूय सुरङ्गां वै बिले तदा । सगुहां कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा ।। निष्क्रामिता मया पूर्व मा स्म शोके मनः कृथाः । निर्गताः पाण्डवा राजन् मात्रा सह परंतपाः ।। अग्निदाहान्महाघोरान्मया तस्मादुपायतः । मा स्म शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवाः ।। प्रच्छन्ना विचरिष्यन्ति यावत् कालस्य पर्ययः ।। तस्मिन् युधिष्ठिरं काले दक्ष्यन्ति भुवि भूमिपाः ।) विदुर बोले- धृतराष्ट्र, शकुनि तथा राजा दुर्योधनका यह पक्का विचार हो गया था कि पाण्डवोंको नष्ट कर दिया जाय। तदनन्तर लाक्षागृहमें जानेपर जब दुर्योधनकी आज्ञासे पुत्रोंसहित कुन्तीको जला देनेकी योजना बन गयी, तब मैंने एक भूमि खोदनेवालेको बुलाकर भूगर्भमें गुफासहित सुरंग खुदवायी और कुन्तीसहित पाण्डवोंको घरमें आग लगनेसे पहले ही निकाल लिया, अतः आप अपने मनमें शोकको स्थान न दीजिये। राजन् ! शत्रुओं को संताप देने वाले पाण्डव अपनी माता के साथ उस महाभयंकर अग्निदाह से दूर निकल गये हैं। मेरे पूर्वोक्त उपायसे ही यह कार्य सम्भव हो सका है। पाण्डव निश्चय ही जीवित हैं, अतः आप उनके लिये शोक न कीजिये। जबतक यह समय बदलकर अनुकूल नहीं हो जाता, तबतक वे पाण्डव छिपे रहकर इस भूतलपर विचरेंगे। अनुकूल समय आनेपर सब राजा इस पृथ्वीपर युधिष्ठिरको देखेंगे। पाण्डवाश्चापि निर्गत्य नगराद् वारणावतात् । नदीं गङ्गामनुप्राप्ता मातृषष्ठा महाबलाः ।। १९ ।। (इधर) महाबली पाण्डव भी वारणावत नगरसे निकलकर माता के साथ गंगा नदी के तट पर पहुँचे ।। १९ ।। दाशानां भुजवेगेन नद्याः स्रोतोजवेन च । वायुना चानुकूलेन तूर्ण पारमवाप्नुवन् ।। २० ।। वे नाविकोंकी भुजाओं तथा नदीके प्रवाहके वेगसे अनुकूल वायुकी सहायता पाकर जल्दी ही पार उतर गये ।। २० ।। ततो नावं परित्यज्य प्रययुर्दक्षिणां दिशम्। विज्ञाय निशि पन्थानं नक्षत्रगणसूचितम् ।। २१ ।। तदनन्तर नाव छोड़ रातमें नक्षत्रोंद्वारा सूचित मार्गको पहचानकर वे दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।। २१ ।। यतमाना वनं राजन् गहनं प्रतिपेदिरे । ततः श्रान्ताः पिपासार्ता निद्रान्धाः पाण्डुनन्दनाः ।। २२ ।। पुनरूचुर्महावीर्यं भीमसेनमिदं वचः । इतः कष्टतरं किं नु यद् वयं गहने वने । दिशश्च न विजानीमो गन्तुं चैव न शक्नुमः ।। २३ ।। राजन् ! इस प्रकार आगे बढ़नेकी चेष्टा करते हुए वे सब-के-सब एक घने जंगलमें जा पहुँचे। उस समय पाण्डवलोग थके-माँदै, प्याससे पीड़ित और (अधिक जगनेसे) नींदमें अंधे-से हो रहे थे। वे महापराक्रमी भीमसेनसे पुनः इस प्रकार बोले- 'भारत ! इससे बढ़कर महान् कष्ट क्या होगा कि हमलोग इस घने जंगलमें फँसकर दिशाओंको भी नहीं जान पाते तथा चलने-फिरनेमें भी असमर्थ हो रहे हैं ।। २२-२३ ।। तं च पापं न जानीमो यदि दग्धः पुरोचनः । कथं तु विप्रमुच्येम भयादस्मादलक्षिताः ।। २४ ।। 'हमें यह भी पता नहीं है कि पापी पुरोचन जल गया या नहीं। हम दूसरोंसे छिपे रहकर किस प्रकार इस महान् कष्टसे छुटकारा पा सकेंगे?' ।। २४ ।। पुनरस्मानुपादाय तथैव व्रज भारत । त्वं हि नो बलवानेको यथा सततगस्तथा ।। २५ ।। भैया ! तुम पुनः पूर्ववत् हम सबको लेकर चलो। हमलोगोंमें एक तुम्हीं अधिक बलवान् और उसी प्रकार निरन्तर चलने-फिरनेमें भी समर्थ हो' ।। २५ ।। इत्युक्तो धर्मराजेन भीमसेनो महाबलः । आदाय कुन्तीं भ्रातूंश्च जगामाशु महाबलः ।। २६ ।। धर्मराजके यों कहनेपर महाबली भीमसेन माता कुन्ती तथा भाइयोंको अपने ऊपर चढ़ाकर बड़ी शीघ्रताके साथ चलने लगे ।। २६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि पाण्डववनप्रवेशे एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पाण्डवोंका वनमें प्रवेशविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४९ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं) क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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