sn vyas
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#प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण 🌺 यह अनूठी और रोचक कथा शिव पुराण की रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) में आती है। रामायण में शूर्पणखा को केवल एक दुष्ट राक्षसी के रूप में देखा जाता है, किंतु शिव पुराण उसके पूर्वजन्म की उस भूल और लालसा को उजागर करता है जिसके कारण उसे अगले जन्म में भयानक राक्षसी का शरीर मिला। 1. पूर्वजन्म में 'नयन्ती' और उसकी लालसा अपने पूर्वजन्म में शूर्पणखा 'नयन्ती' नाम की एक अत्यंत रूपवती और गंधर्व-कन्या समान सुंदरी थी। वह अपने रूप-सौंदर्य पर अत्यंत गर्व करती थी। उसके मन में केवल एक ही प्रबल अभिलाषा थी—संसार का सबसे सुंदर, शक्तिशाली और कामदेव जैसा मनमोहक पुरुष उसका पति बने। जब उसने देखा कि ऐसा पति केवल ईश्वर की अनुकंपा से ही मिल सकता है, तो उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने का निर्णय लिया। 2. भगवान शिव की तपस्या और कामासक्ति नयन्ती वन में जाकर पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग का निर्माण कर भगवान शिव की कठिन साधना करने लगी। वह वर्षों तक पंचाग्नि तप करती रही और 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करती रही। किंतु, उसकी तपस्या में एक बहुत बड़ी त्रुटि थी—उसकी तपस्या में 'भक्ति' या 'मुक्ति' का भाव नहीं था, बल्कि केवल 'काम' (शारीरिक सौंदर्य और सुंदर पति) की तीव्र वासना थी। वह पूजा करते समय भी भगवान शिव के निष्काम स्वरूप का ध्यान करने के बजाय केवल एक अति-सुंदर पति की कल्पनाओं में खोई रहती थी। 3. भगवान शिव की परीक्षा और वरदान जब उसकी तपस्या की अवधि पूर्ण हुई, तब भगवान शिव एक दिव्य वृद्ध ब्राह्मण के रूप में नयन्ती के आश्रम में प्रकट हुए। वृद्ध ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उससे पूछा: "हे कल्याणी! तुम इस सुकुमार अवस्था में इतना कठोर तप क्यों कर रही हो? तुम्हें किस वस्तु की अभिलाषा है?" नयन्ती ने बिना संकोच के अपने मन की कामना प्रकट करते हुए कहा: "हे महाराज! मैं इस ब्रह्मांड के सबसे सुंदर, कांतिमान और कामातुर पुरुष को अपने पति के रूप में पाना चाहती हूँ, जो केवल मुझसे ही प्रेम करे और उसके रूप की तुलना कोई न कर सके।" ब्राह्मण रूपी शिव जी ने उसे समझाया कि केवल बाहरी रूप-सौंदर्य और काम-वासना के लिए की गई तपस्या जीव को अंत में दुख ही देती है। किंतु नयन्ती अपनी हठ पर अड़ी रही। तब शिव जी ने अपने असली स्वरूप में दर्शन दिए और कहा: "हे नयन्ती! तुम्हारी तपस्या के फलस्वरूप तुम्हें अगले जन्म में संसार का सबसे सुंदर पुरुष पति के रूप में पाने का अवसर मिलेगा, किंतु तुम्हारी इस अत्यधिक काम-लालसा और आसक्ति के कारण तुम्हें राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ेगा।" 4. शूर्पणखा के रूप में जन्म और फल अगले जन्म में वही नयन्ती महर्षि विश्रवा की पुत्री और रावण की बहन 'शूर्पणखा' के रूप में जन्मी। राक्षसी योनि में जन्म लेने के बाद भी उसके पूर्वजन्म का वह 'संस्कार' (सुंदर पति पाने की लालसा) वैसा ही बना रहा। जब त्रेतायुग में उसने पंचवटी में परम सुंदर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तो उसके पूर्वजन्म की वही काम-वासना पुनः जागृत हो गई। उसने श्रीराम और लक्ष्मण को अपने मोहिनी रूप से रिझाने का प्रयास किया। किंतु, प्रभु श्रीराम तो 'एकपत्नीव्रती' और मर्यादा पुरुषोत्तम थे तथा लक्ष्मण जी भी अपनी भ्रातृ-भक्ति में लीन थे। जब शूर्पणखा ने माता सीता पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, तो लक्ष्मण जी ने उसके नाक और कान काट दिए। 5. कथा का आध्यात्मिक रहस्य शिव पुराण में इस कथा के माध्यम से समझाया गया है कि शूर्पणखा की नाक-कान कटना केवल रामायण की एक घटना नहीं थी, बल्कि उसके पूर्वजन्म के अशुद्ध मनोरथ का परिणाम था। यदि उसने अपने पूर्वजन्म में शिव जी से 'सुंदर पति' के स्थान पर 'सच्ची भक्ति' माँगी होती, तो उसका उद्धार हो जाता। कथा का संदेश: ईश्वर की भक्ति सदैव निष्काम और पवित्र भाव से करनी चाहिए। यदि भक्ति में केवल भौतिक सुख, काम-वासना या शारीरिक सौंदर्य की कामना होगी, तो वह फल तो देती है, किंतु वह फल अंततः विनाश और कष्ट का कारण बनता है।
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