सुशील मेहता
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वर्ष का सबसे बड़ा दिवस साइंस के अनुसार, जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध से चलकर भारत के बीच से गुजरने वाली कर्क रेखा में आ जाता है, तो ऐसी स्थिति में सूर्य की किरणें धरती पर ज्यादा समय के लिए बनी रहेंगी। जिसके कारण 21 जून को साल का सबसे लंबा दिन होता है। 21 जून का दिन सालभर का सबसे लंबा दिन होता है, जिसमें दिन 12 नहीं बल्कि 14 घंटे का होता है. इस दिन एक समय ऐसा भी आता है, जब आपकी परछाई भी साथ छोड़ देती है। 21 जून का दिन खासकर उन देश या हिस्से के लोगों के लिए सबसे लंबा होता है जो भूमध्यरेखा यानि इक्वेटर के उत्तरी हिस्से में रहते हैं. इसमें रूस, उत्तर अमेरिका, यूरोप, एशिया, आधा अफ्रीका आते हैं. तकनीकी रूप से समझें तो ऐसा तब होता है जब सूरज की किरणें सीधे, कर्क रेखा/ट्रॉपिक ऑफ कैंसर पर पड़ती हैं. इन दिन सूर्य से पृथ्वी के इस हिस्से को मिलने वाली ऊर्जा 30 फीसदी ज्यादा होती है। पृथ्वी अपना खुद का चक्कर 24 घंटे में पूरा करती है जिसकी वजह से दिन और रात होती है. वहीं सूरज का पूरा एक चक्कर लगाने में उसे 365 दिन का वक्त लगता है. जब पृथ्वी खुद में घूम रही होती है और आप उस हिस्से पर है जो सूरज की तरफ है, तो आपको दिन दिखता है. अगर उस हिस्से की तरफ हैं जो सूरज से दूर है, तो आपको रात दिखती है। पृथ्वी सूरज का चक्कर लगा रही होती है तब मार्च से सितंबर के बीच पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध यानि नॉर्थ हेमिस्फेयर के हिस्से को सूरज की सीधी किरणों का सामना करना पड़ता है, तब यहां दिन लंबे होते हैं. बाकी के वक्त दक्षिण गोलार्ध यानि सदर्न हेमिस्फेयर पर सूरज की किरणें सीधी पड़ती हैं. गर्मी, सर्दी यह सारे मौसम पृथ्वी के इस तरह चक्कर लगाने की ही देन है. उत्तरी गोलार्ध पर सबसे ज्यादा सूर्य की किरण 20,21,22 जून को पड़ती है. यानि इस वक्त हम सूरज के सबसे ज्यादा करीब होते हैं. पश्चिम में कई जगहों पर इसे ग्रीष्मकालीन संक्रांति भी कहा जाता है. वहीं दक्षिणी गोलार्ध में यह दिन 21,22,23 दिसंबर को आता है। समुद्र और चांद जब से पृथ्वी के जीवन का हिस्सा बने, तब से उसका अपनी धुरी पर घूमने का वक्त धीमा होता चला गया. इसे टाइडल फ्रिक्शन कहते हैं यानि ज्वार भाटा से होने वाला घिसाव. ज्वार भाटा से समुद्र में खिंचाव आता है और बहुत हद तक पृथ्वी के सॉलिड हिस्से भी खिंचाव महसूस करते हैं। इन्हीं रुकावटों की वजह से अपने आप में एक चक्कर पूरा करने के दौरान पृथ्वी के कई तत्व बिगड़ते रहे हैं. इस दौरान पृथ्वी की काफी ऊर्जा चक्कर लगाने में खर्च न होकर, गर्मी में बदल जाती है. पृथ्वी और उसके महासागर लगातार ज्वार भाटा से बिगड़ते हैं जिससे पृथ्वी की चक्कर लगाने की रफ्तार कम होती जाती है। कम ऊर्जा होने की वजह से पृथ्वी की चक्कर लगाने की रफ्तार कम हो जाती है. दिन लंबे होते जाते हैं. हर सदी में दिन 3 मिलीसेकंड से बढ़ जाता है. सुनने में कम लगता है लेकिन 1 करोड़ साल बाद हमारा एक दिन, एक घंटे से बढ़ जाएगा. यानि 24 की जगह 25 घंटे भी हो सकते हैं। 21 जून के बाद इक्वेटर पर ऐसी स्थिति बनती है कि दिसंबर के बाद से दिनों का बड़ा होना रुक जाता है और रातें धीरे धीरे बड़ी होने लगती हैं. यानि अब दिन कुछ छोटे होने लगेंगे. जल्दी अंधेरा होगा और सुबह सूरज की किरणें कुछ देर से दस्तक देंगी. ये क्रम 21 दिसंबर तक चलेगा। #🏵️ प्राकृतिक 🏵️
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