RadheRadheje
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सृष्टि के सबसे पहले राक्षस कौन थे?
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क्या आप जानते हैं कि इस सृष्टि के सबसे पहले राक्षस कौन थे? अधिकांश लोग हिरण्यकश्यपु, रावण या महिषासुर का नाम लेते हैं, लेकिन सत्य इससे भी कहीं अधिक प्राचीन है। सृष्टि की रचना से पहले, जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा और न ही समय का कोई अस्तित्व था, तभी दो ऐसे महादैत्यों का जन्म हुआ जिन्होंने स्वयं भगवान विष्णु को भी हजारों वर्षों तक युद्ध करने पर विवश कर दिया। उनका नाम था—मधु और कैटभ। यह कथा केवल दो दैत्यों के जन्म की नहीं, बल्कि सृष्टि की रक्षा, वेदों की महिमा और भगवान विष्णु की दिव्य बुद्धि की भी है।
सृष्टि के आदि काल में चारों ओर केवल अनंत जल ही जल था। उस विराट जलराशि के मध्य अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। उनके हृदय में संपूर्ण सृष्टि का भविष्य छिपा था, किंतु अभी सृष्टि का विस्तार प्रारंभ नहीं हुआ था। उसी समय भगवान विष्णु के कानों की मैल से दो अत्यंत विशाल, भयानक और तेजस्वी दैत्यों का जन्म हुआ। जन्म लेते ही उनका शरीर पर्वतों के समान विशाल और उनकी शक्ति असाधारण थी। भगवान की दिव्य शक्ति से उत्पन्न होने के कारण वे साधारण असुर नहीं थे।
दोनों दैत्यों ने जन्म के बाद एक-दूसरे से कहा, "यदि हमें इस ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली बनना है, तो हमें ऐसी शक्ति प्राप्त करनी होगी जिसे कोई देवता भी न जीत सके।" इसके बाद दोनों ने समस्त भोगों का त्याग कर महाशक्ति आदिशक्ति देवी की कठोर तपस्या आरंभ कर दी। हजारों वर्षों तक वे निरंतर तप में लीन रहे। उनका तप इतना प्रचंड था कि तीनों लोकों में उसकी आभा फैल गई। अंततः आदिशक्ति उनके सामने प्रकट हुईं और बोलीं, "वत्स, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। मांगो, क्या वरदान चाहते हो?"
दोनों दैत्यों ने बिना विलंब किए कहा, "मां, हमें ऐसा वरदान दीजिए कि हमारी मृत्यु केवल तभी हो, जब हम स्वयं उसे स्वीकार करें।"
महादेवी ने कुछ क्षण विचार किया और बोलीं, "तथास्तु। तुम्हारी इच्छा के बिना कोई भी तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा।"
यह वरदान प्राप्त होते ही मधु और कैटभ के मन में भयंकर अहंकार उत्पन्न हो गया। उन्हें लगने लगा कि अब तीनों लोकों में कोई उनका सामना नहीं कर सकता। वे जहां जाते, वहां भय और विनाश फैलने लगता। धीरे-धीरे उनका अभिमान इतना बढ़ गया कि उन्होंने स्वयं ब्रह्मा जी को चुनौती दे दी।
उस समय ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करने की तैयारी कर रहे थे। उनके पास चारों वेद थे, जिनके आधार पर संपूर्ण सृष्टि का निर्माण होना था। मधु और कैटभ वहां पहुंचे और बोले, "यदि तुम सृष्टि के निर्माता हो, तो पहले अपनी शक्ति सिद्ध करो।"
ब्रह्मा जी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही दोनों दैत्यों ने उनके हाथों से चारों वेद छीन लिए और उन्हें लेकर महासागर की अथाह गहराइयों में छिप गए। वेदों के बिना सृष्टि की रचना रुक गई। समय जैसे ठहर गया। देवताओं में चिंता फैल गई।
ब्रह्मा जी ने तब भगवान विष्णु का स्मरण किया। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे जगतपालक, यदि वेद वापस नहीं मिले तो सृष्टि की रचना कभी प्रारंभ नहीं हो सकेगी। हमारी रक्षा कीजिए।"
ब्रह्मा जी की करुण पुकार सुनते ही भगवान विष्णु ने अपनी योगनिद्रा त्याग दी। उन्होंने नेत्र खोले और संपूर्ण स्थिति को समझ लिया। वे तुरंत महासागर की ओर बढ़े, जहां मधु और कैटभ वेदों को छिपाकर बैठे थे।
भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "मधु, कैटभ, वेद सृष्टि की धरोहर हैं। उन्हें वापस लौटा दो।"
दोनों दैत्य जोर से हंस पड़े। उन्होंने कहा, "अब यह वेद हमारे हैं। यदि इन्हें चाहिए, तो पहले हमें युद्ध में पराजित करो।"
इसके बाद भगवान विष्णु और दोनों दैत्यों के बीच ऐसा भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। महासागर की लहरें प्रचंड हो उठीं। पर्वतों के समान प्रहार होने लगे। हजारों वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा। भगवान विष्णु ने अपने अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन महादेवी के वरदान के कारण दोनों दैत्य बार-बार बच जाते। वे जितनी बार घायल होते, उतनी ही शक्ति से फिर खड़े हो जाते।
भगवान विष्णु समझ गए कि केवल बल से इस युद्ध को नहीं जीता जा सकता। तब उन्होंने अपनी दिव्य बुद्धि का प्रयोग करने का निश्चय किया।
युद्ध के बीच भगवान मुस्कुराए और बोले, "मधु और कैटभ, तुम दोनों वास्तव में अद्वितीय योद्धा हो। आज तक मैंने तुम्हारे समान पराक्रमी किसी को नहीं देखा। मैं तुम्हारे शौर्य से अत्यंत प्रसन्न हूं।"
दोनों दैत्य अपने पराक्रम की प्रशंसा सुनकर अत्यंत प्रसन्न हो गए। अहंकार से भरकर बोले, "यदि तुम हमसे प्रसन्न हो, तो वरदान मांगो। आज हम तुम्हें वर देंगे।"
भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "यदि तुम सचमुच मुझे वर देना चाहते हो, तो मुझे यही वरदान दो कि तुम्हारा वध मेरे हाथों से हो।"
भगवान की बात सुनते ही दोनों दैत्य एक क्षण के लिए मौन हो गए। उन्हें समझ आ गया कि वे अपनी ही वाणी के जाल में फंस चुके हैं। फिर भी वे अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते थे।
उन्होंने कहा, "हम अपना वचन नहीं तोड़ेंगे। लेकिन हमारी एक शर्त है। हमारा वध ऐसी जगह होना चाहिए जहां जल न हो, क्योंकि इस समय तो संपूर्ण सृष्टि जल से भरी हुई है।"
भगवान विष्णु मुस्कुराए। उन्होंने तुरंत अपने विराट स्वरूप को धारण किया। फिर अपनी दोनों जांघों को महासागर के जल से ऊपर उठा दिया। उनकी जांघें ही उस समय जलरहित स्थान बन गईं। भगवान ने मधु और कैटभ को अपनी जांघों पर रखा और अगले ही क्षण सुदर्शन चक्र का आह्वान किया।
सुदर्शन चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ आया और देखते ही देखते दोनों महादैत्यों का अंत हो गया। उनके प्राण निकलते ही महासागर शांत हो गया। देवताओं ने राहत की सांस ली।
भगवान विष्णु ने तत्पश्चात चारों वेदों को सुरक्षित निकाला और उन्हें ब्रह्मा जी को सौंप दिया। ब्रह्मा जी ने वेदों को अपने हृदय से लगाया और भगवान को प्रणाम करते हुए कहा, "प्रभु, आपके बिना सृष्टि की रचना कभी संभव नहीं थी।"
इसके बाद वेदों के आधार पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया। पृथ्वी बनी, आकाश बना, सूर्य और चंद्रमा प्रकट हुए, देवता उत्पन्न हुए और जीवन का विस्तार प्रारंभ हुआ।
यह कथा हमें केवल यह नहीं बताती कि मधु और कैटभ पहले राक्षस थे, बल्कि यह भी सिखाती है कि केवल बल कभी पर्याप्त नहीं होता। अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंततः वह बुद्धि, धर्म और ईश्वर की इच्छा के सामने टिक नहीं सकता। यही कारण है कि भगवान विष्णु को केवल पालनकर्ता ही नहीं, बल्कि धर्म और नीति के सर्वोच्च रक्षक भी कहा जाता है।
जय श्रीहरि विष्णु। जय श्री लक्ष्मी नारायण।
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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे..
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