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pargat chopra - Author on ShareChat
pargat chopra
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মানশাবিনন্তঃয Charateti  &cloes % Tiveles Mothew प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान  ক নিনক্নান  f೩೩] वह माँ धन्य है,जो गर्भ से लेकर होने तक उसे सुशीलता का उपदेश करे। 9 তX { চে /djjsworld आप अपनी स्वलिखित कविताओं को cc@djjs org पर SHARE करें। wwwdjjs org CC-4407 মানশাবিনন্তঃয Charateti  &cloes % Tiveles Mothew प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान  ক নিনক্নান  f೩೩] वह माँ धन्य है,जो गर्भ से लेकर होने तक उसे सुशीलता का उपदेश करे। 9 তX { চে /djjsworld आप अपनी स्वलिखित कविताओं को cc@djjs org पर SHARE करें। wwwdjjs org CC-4407
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    Charanvti  पराजित होकर भी जो न रुके विजयन्पताका वही लहराए दृढ संकल्पों के बल पर कितनों ने नएन्नए कीर्तिमान रचाए गिरकर फिर जो खडा न होता उसकी शक्ति बिखर जाती जीत खडी होे द्वार पर फिर भी उससे दूर निकल जाती आप अपनी स्वलिखित कविताओं को cc@djjs org पर SHARE करें। p @Xf @/djjsworld  WWWdjjsorg CC4500
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    चरैवेति Charaiveti उ७ोl! जiागो! कुछ कर दिखाओ को यूँही न व्यर्थ गँवाओ समय मिला है हमको श्रेष्ठ अवसर तत्परता से स्वयं को गढ़कर आशुतोष के सच्चे शिष्य कहलाएँ सतत भक्ति पथ पर बढ़ते निखरते जाएँ @0X00 'DJJSWORLD | WWWDJJS ORG अपनी स्वलिखित कविताओं को CC@DJJSORG पर SHARE करें। CC4499 ಖ चरैवेति Charaiveti उ७ोl! जiागो! कुछ कर दिखाओ को यूँही न व्यर्थ गँवाओ समय मिला है हमको श्रेष्ठ अवसर तत्परता से स्वयं को गढ़कर आशुतोष के सच्चे शिष्य कहलाएँ सतत भक्ति पथ पर बढ़ते निखरते जाएँ @0X00 'DJJSWORLD | WWWDJJS ORG अपनी स्वलिखित कविताओं को CC@DJJSORG पर SHARE करें। CC4499 ಖ
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    Charaiveti #संता वाषण९ons  जैसे कृपण व्यक्ति धन को सहेज कर रखता है, वैसे ही सद्गुरु के वचनों को हृदय में धारण करना चाहिए! संत सहजोबाई @ @X 0/DJSWORLD | WWwDJIS.ORG आप अपनी स्वलिखित कविताओं को CC@DJJSORG पर SHARE करें। CC-4497 Charaiveti #संता वाषण९ons  जैसे कृपण व्यक्ति धन को सहेज कर रखता है, वैसे ही सद्गुरु के वचनों को हृदय में धारण करना चाहिए! संत सहजोबाई @ @X 0/DJSWORLD | WWwDJIS.ORG आप अपनी स्वलिखित कविताओं को CC@DJJSORG पर SHARE करें। CC-4497
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    V গনুন্নুলি  {6083) w Tocus "समय नहीं , साधना करो " Enlightening ExperienCes  प्रकाशान तियि  07 08 2026  कई दिनों से मैं साधना में निरंतर गुरु महाराज जी के चरणों में प्रार्थना कर रहा था- दर्शन नहीं हुए हैं। आज कृपा करके महाराज जी ! बहुत दिन हो गए, आपके आप मुझे दर्शन दे दीजिए। अंतरात्मा आपका दर्शन पाने के लिए बहुत व्याकुल है। उसी रात मुझे एक दिव्य अनुभूति दिखाई दी। मैंने देखा कि गुरु महाराज जी मेरे सामने विराजमान हैं। उन्हें देखते ही मैंने जल्दी से आगे बढकर उनके श्रीचरणों में अपना प्रणाम अर्पित किया। उस समय मैंने बड़े प्रेम से अपने हाथों से गुरु महाराज जी के लिए एक सुंदर कढ़ाईदार  तैयार किया था। उसे महाराज जी कुर्ता- -पायजामा इसे मैँने अपने से आपके को अर्पित करते कहा- महाराज जी! हुए मैंने हाथों लिए बनाया है। मेरी यह कामना है कि आप इसे स्वीकार करें और धारण करें। महाराज जी ने अत्यंत स्नेह से उसे स्वीकार करते हुए कहा- ठीक है, मैं इसे अवश्य पहनूँगा।  उनके इन शब्दों से मेरा हृदय आनंद से भर गया। उसके बाद भी महाराज जी से   अनेक बातें हुईं, पर जागने के बाद वे सब याद नहीं रहीं। केवल एक बात जो आज भी अच्छे-से याद है। मैंने बड़ी व्याकुलता से पूछा- महाराज जी! आप समाधि  से बाहर कब आएँगे? जी कुछ क्षण मौन बने रहे। मैंने फिर विनती की- महाराज जी! अभी महाराज आपको समाधि में और कितना समय रहना है? संसार में लोग तरह - तरह करते हैं। कृपा करके कुछ तो बताइए।  ব্ধী নান अभी मैं इसके विषय तब महाराज जी ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में कहा में कुछ नहीं कह सकता हूँ। तुम लोग डटकर साधना - सुमिरन करो।  लेकिन मेरा मन संतुष्ट नहीं हुआ। मैंने फिर से आग्रह किया- महाराज जी! में कुछ संकेत ही दे दीजिए। इतना ही बता दीजिए कि समाधि के विषय कब आपका पुनः दर्शन होगा ? मैं कुछ जी ने पुनः वही उत्तर दिया- अभी नहीं कह सकता हूँ। तुम महाराज सभी साधक केवल साधना और सुमिरन से जुड़े रहो। कहा- मैं आऊँगा... अवश्य फिर उन्होंने अत्यंत आश्वस्त करते हुए मुझसे  आऊँगा. .. शीघ्र आऊँगा। ಗ೯ अमृतसर , पंजाब राजवंत ==~=--711 . 1ee7 ~1lrw - -1 09870314377 r | 1(  مم  V গনুন্নুলি  {6083) w Tocus "समय नहीं , साधना करो " Enlightening ExperienCes  प्रकाशान तियि  07 08 2026  कई दिनों से मैं साधना में निरंतर गुरु महाराज जी के चरणों में प्रार्थना कर रहा था- दर्शन नहीं हुए हैं। आज कृपा करके महाराज जी ! बहुत दिन हो गए, आपके आप मुझे दर्शन दे दीजिए। अंतरात्मा आपका दर्शन पाने के लिए बहुत व्याकुल है। उसी रात मुझे एक दिव्य अनुभूति दिखाई दी। मैंने देखा कि गुरु महाराज जी मेरे सामने विराजमान हैं। उन्हें देखते ही मैंने जल्दी से आगे बढकर उनके श्रीचरणों में अपना प्रणाम अर्पित किया। उस समय मैंने बड़े प्रेम से अपने हाथों से गुरु महाराज जी के लिए एक सुंदर कढ़ाईदार  तैयार किया था। उसे महाराज जी कुर्ता- -पायजामा इसे मैँने अपने से आपके को अर्पित करते कहा- महाराज जी! हुए मैंने हाथों लिए बनाया है। मेरी यह कामना है कि आप इसे स्वीकार करें और धारण करें। महाराज जी ने अत्यंत स्नेह से उसे स्वीकार करते हुए कहा- ठीक है, मैं इसे अवश्य पहनूँगा।  उनके इन शब्दों से मेरा हृदय आनंद से भर गया। उसके बाद भी महाराज जी से   अनेक बातें हुईं, पर जागने के बाद वे सब याद नहीं रहीं। केवल एक बात जो आज भी अच्छे-से याद है। मैंने बड़ी व्याकुलता से पूछा- महाराज जी! आप समाधि  से बाहर कब आएँगे? जी कुछ क्षण मौन बने रहे। मैंने फिर विनती की- महाराज जी! अभी महाराज आपको समाधि में और कितना समय रहना है? संसार में लोग तरह - तरह करते हैं। कृपा करके कुछ तो बताइए।  ব্ধী নান अभी मैं इसके विषय तब महाराज जी ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में कहा में कुछ नहीं कह सकता हूँ। तुम लोग डटकर साधना - सुमिरन करो।  लेकिन मेरा मन संतुष्ट नहीं हुआ। मैंने फिर से आग्रह किया- महाराज जी! में कुछ संकेत ही दे दीजिए। इतना ही बता दीजिए कि समाधि के विषय कब आपका पुनः दर्शन होगा ? मैं कुछ जी ने पुनः वही उत्तर दिया- अभी नहीं कह सकता हूँ। तुम महाराज सभी साधक केवल साधना और सुमिरन से जुड़े रहो। कहा- मैं आऊँगा... अवश्य फिर उन्होंने अत्यंत आश्वस्त करते हुए मुझसे  आऊँगा. .. शीघ्र आऊँगा। ಗ೯ अमृतसर , पंजाब राजवंत ==~=--711 . 1ee7 ~1lrw - -1 09870314377 r | 1(  مم
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