sn vyas
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*भगवान श्रीराधाकृष्ण की बिछुआ लीला !!!!* #राधा कृष्ण भगवान श्रीकृष्ण आनंदकंद हैं और उनकी शक्ति श्रीराधा आह्लादिनी, आनंददायिनी हैं; इसलिए इनकी लीलाएं भी पढ़ने वाले के मन को शोक-विषाद से मुक्त कर आनंद से भर देती हैं। ऐसी ही भगवान श्रीराधाकृष्ण की एक मन को मोहने वाली लीला है ‘बिछुआ लीला।’ इसी लीला के कारण भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन में परिक्रमा मार्ग के पास एक मंदिर में ‘श्रीबिछुआ बिहारी’ के नाम से विराजमान हैं और लीला से सम्बन्धित कुण्ड ‘बिलछू कुण्ड’ या ‘‘बिछुआ कुण्ड’ के नाम से जाना जाता है। भगवान श्रीराधाकृष्ण की बिछुआ लीला बिलछू कुण्ड श्रीराधाकृष्ण की खेलन भूमि के रूप में जानी जाती है। एक बार श्रीकृष्ण श्रीराधा और सखियों के साथ आंखमिचौनी खेल रहे थे। खेलते समय श्रीराधा के एक पैर का बिछुआ कहीं गिर गया। सभी सखियों ने बिछुआ ढूंढ़ने के लिए भरसक प्रयास किया; परंतु बिछुआ नहीं मिला। बिछुआ खो जाने से श्रीराधा उदास हो गईं। यह देख कर लीलाबिहारी श्रीकृष्ण पास ही स्थित एक कुण्ड पर गए और एक ही तरह के कई बिछुए लाकर श्रीराधा को देते हुए बोले, "हे प्रिये ! इनमें जो आपकौ होय, धारण करि लेओ। (ब्रज भाषा) हे प्रिये ! इनमें से जो बिछुआ आप का हो, उसे धारण कर लो।" भगवान श्रीकृष्ण की लीला से श्रीराधा भ्रम में पड़ गईं कि कौन-सा बिछुआ लें; क्योंकि सभी बिछुए बिल्कुल एक-समान थे। श्रीराधा के सामने भगवान की माया काम नहीं करती हैं। उन्होंने भी श्रीकृष्ण से कह दिया, ‘प्यारे ! आपहुं तो इन्हें भली प्रकार चीन्हो, फिर पहराय च्यों नॉय देओ ?’ (ब्रज भाषा) ‘'प्यारे ! आप तो इन बिछुओं को अच्छी तरीके से पहचानते हो, फिर पहना क्यों नहीं देते ?'’ श्रीकृष्ण तो प्रिया जी के चरणों को स्पर्श करने के लिए तैयार बैठे थे। श्रीराधा के चरण पलोटने का तो उनका स्वभाव ही है। श्रीकृष्ण याचक बन श्रीराधा के जावक (महावर) लगे चरणों का स्पर्श कर रहे हैं और नयनों से कह रहे है: *कृपा अवलोकन दान दै री,* *महा वृषभानु कुमारी दानि दै।* *त्रिषित (प्यासे) लोचन चकोर मेरे,* *तुव वदन इन्दु किरन पान दै री ।।* प्रिजाजू वृषभानु कुमारी ! आप मुझे अपनी कृपा का दान दें। मेरे चकोर की भांति प्यासे नैन आपके चंद्रकिरण रूपी चरणकमलों का पान (दर्शन) करना चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिया श्रीराधा का चरण-स्पर्श किया। यह देख कर श्रीराधा की सभी सखियां ‘बलिहारी है बलिहार की’ इस तरह का उद् घोष करने लगीं। सारा वातावरण सखियों के परिहास से रसमय हो गया। श्रीकृष्ण ने भी लजाते हुए श्रीराधा के पैर की अंगुली में बिछुआ धारण करा दिया। *नजर ने नजर से मुलाकात कर ली।* *दोनों ही खामोश मगर बात कर ली।।* भगवान श्रीराधाकृष्ण की बिछुआ लीला के कारण यह स्थान ‘बिछुआ कुण्ड’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। *नहीं ब्रह्म सों काम कछू हमकौ* *बैकुण्ठ की राह न जाननी है।* *ब्रज की रज में रज ह्वै कैं मिलूँ* *यही प्रीति की रीति निभानिनी है।।* साभार~ पं देव शर्मा🔥
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