sn vyas
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#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕 🕉️गीता प्रसार नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ [श्रीमद्भगवद्गीता: यथार्थ गीता अध्याय ५, श्लोक १५] -: भावार्थ :- जिसे अभी प्रभु कहा, उसी को यहाँ विभु कहा गया है; क्योंकि वह सम्पूर्ण वैभव से संयुक्त है। प्रभुता एवं वैभव से संयुक्त वह परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न किसी के पुण्यकर्मों को ही ग्रहण करता है; फिर भी लोग कहते क्यों हैं? इसलिये कि अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है। उन्हें अभी SHUN साक्षात्कारसहित ज्ञान तो हुआ नहीं, वे अभी जन्तु हैं। मोहवश वे कुछ भी कह सकते हैं। ज्ञान से क्या होता है? इसे स्पष्ट करते हैं- -: व्याख्या:- इस श्लोक का अर्थ है कि परमात्मा न किसी के पाप को लेते हैं और न किसी के पुण्य को। वे सबके प्रति समान और निरपेक्ष हैं। लेकिन मनुष्य का ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ होता है, इसलिए वह भ्रम में पड़ जाता है और अपने कर्मों का कारण भगवान को मान लेता है। जब सच्चा ज्ञान प्रकट होता है, तब यह भ्रम दूर हो जाता है और मनुष्य सत्य को समझने लगता है।🙏🚩
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