sn vyas
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#🪔अपरा एकादशी🌺🌟
क्या आपने कभी सुना है कि पूरी में एकादशी देवी को उल्टा लटकाया गया है? क्या भगवान के धाम में भी किसी देवी को दंड मिल सकता है? और अगर मिला तो आखिर ऐसी कौन सी भूल हुई जिसके कारण स्वयं जगन्नाथ जी को हस्तक्षेप करना पड़ा। आज की यह कहानी सिर्फ एक कथा नहीं बल्कि भक्ति और नियम के बीच छिपे एक गहरे रहस्य की सच्चाई है।
समुद्र की लहरों से घिरा, शंख और घंटियों की गूंज से भरा वो पवित्र धाम जहां हर सांस में भगवान बसते हैं। वहीं है पूरी और यहीं विराजमान हैं जगत के नाथ, जगन्नाथ जी। यहां की परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। हर नियम, हर विधि गहरे विश्वास से जुड़ी हुई है। लेकिन एक बात इस धाम को पूरे संसार से अलग बनाती है। यहां महाप्रसाद को कभी रोका नहीं जाता। यहां भोजन सिर्फ अन्न नहीं, स्वयं भगवान का स्वरूप माना जाता है। चाहे कोई भी दिन हो, कोई भी व्रत हो, पूरी में भक्त महाप्रसाद ग्रहण करना नहीं छोड़ते।
दूसरी ओर पूरे संसार में एक दिन ऐसा माना जाता है जिसका महत्व सबसे अलग है। वो दिन है एकादशी। इस दिन भक्त अन्न त्याग कर पूरे मन से भगवान का स्मरण करते हैं और इस व्रत की अधिष्ठात्री हैं एकादशी देवी। कहा जाता है जो भी सच्चे मन से एकादशी का व्रत करता है उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
एक दिन एकादशी देवी के मन में एक विचार उठा। पूरे संसार में लोग मेरा व्रत रखते हैं, मेरे नियमों का पालन करते हैं। लेकिन क्या पूरी में भी ऐसा ही होता है? उनकी जिज्ञासा बढ़ती गई और धीरे-धीरे उसमें अहंकार भी घुलने लगा। “मैं स्वयं जाकर देखती हूं कौन सच्चा भक्त है।”
उन्होंने तुरंत एक निर्णय लिया और अगले ही क्षण अपना दिव्य स्वरूप त्याग दिया। अब वो एक साधारण वृद्धा थी। ना कोई तेज, ना कोई पहचान, बस एक थकी हुई यात्री जिसे कोई भी सामान्य समझे।
रात का समय था। चांदनी समुद्र की लहरों पर चमक रही थी। धीरे-धीरे वो वृद्धा पूरी की गलियों में प्रवेश करती है। हर तरफ भजन की ध्वनि, हर घर में दीपक जल रहे थे। लेकिन कुछ अलग था। कुछ ऐसा जिसने उनके मन को बेचैन कर दिया। उन्होंने देखा कई घरों में लोग भोजन कर रहे थे। वो ठिठक गई। “आज तो एकादशी है, फिर ये लोग अन्न कैसे खा रहे हैं?”
उनके मन में सवाल उठने लगे। वो एक घर के पास गई। दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई, “कौन है?” वृद्धा बोली, “बेटा मैं एक यात्री हूं, भूखी हूं। कुछ खाने को मिल जाएगा?”
दरवाजा खुला। घर के लोग तुरंत बाहर आए। “अरे माता जी आइए, आइए।” उन्हें बड़े आदर से अंदर बैठाया गया और कुछ ही देर में उनके सामने महाप्रसाद परोस दिया गया।
वृद्धा ने थाली को देखा। फिर धीरे से पूछा, “आज एकादशी है। क्या तुम व्रत नहीं रखते?”
घर के मुखिया मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “माता जी, हम व्रत का सम्मान करते हैं। लेकिन यहां एक और नियम है। पूरी में महाप्रसाद स्वयं भगवान का रूप है और भगवान को कभी ठुकराया नहीं जाता।”
वृद्धा चुप हो गई। उनके मन में एक अजीब द्वंद शुरू हो गया। “यह कैसी भक्ति है जहां नियमों का पालन नहीं हो रहा?” उन्होंने सोचा शायद यह एक घर की बात हो। लेकिन जब वो दूसरे घर गई, वहां भी वही उत्तर मिला। तीसरे घर, चौथे घर, हर जगह लोग एक ही बात कह रहे थे। “महाप्रसाद को मना नहीं करते।”
अब उनका संदेह धीरे-धीरे क्रोध में बदलने लगा। उनकी आंखों में तेज बढ़ने लगा। “यह लोग मेरे व्रत का अनादर कर रहे हैं। इनको इसका परिणाम भुगतना होगा।”
वो पूरी की गलियों में खड़ी थी। चारों ओर भक्ति का वातावरण था लेकिन उनके भीतर अहंकार की आग जलने लगी थी। उनके मन में एक ही विचार गूंज रहा था — “अब इनको दंड मिलेगा।”
तभी मंदिर की दिशा से एक अद्भुत प्रकाश फैलने लगा और अगले ही क्षण वहां प्रकट हुए स्वयं जगन्नाथ जी। उनके चेहरे पर मुस्कान थी पर आंखों में गहराई। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “देवी, यह क्या करने जा रही हो?”
एकादशी देवी चौंक गई। “प्रभु, आपने देखा नहीं? यह लोग आपके नाम पर मेरे व्रत का अपमान कर रहे हैं। आज एकादशी है और यह सब अन्न खा रहे हैं।”
जगन्नाथ जी मुस्कुराए। “देवी, यहां नियम थोड़ा अलग है।”
देवी ने तीखे स्वर में कहा, “नियम तो नियम होता है प्रभु। जो उसका पालन ना करे उसे दंड मिलना ही चाहिए।”
कुछ क्षण के लिए चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर जगन्नाथ जी धीरे से बोले, “तुम व्रत को देख रही हो लेकिन मैं भाव को देख रहा हूं।”
देवी ने कहा, “भाव प्रभु? नियम से बड़ा भाव कैसे हो सकता है?”
तभी जगन्नाथ जी ने हाथ उठाया और अगले ही क्षण एक दृश्य उनके सामने प्रकट हुआ। उन्होंने देखा पूरी के वही लोग जो महाप्रसाद खा रहे थे, लेकिन अब उनके चेहरे पर आंसू थे। हर कौर के साथ वो भगवान का नाम ले रहे थे। “जय जगन्नाथ जी। प्रभु यह आपका प्रसाद है।”
कुछ लोग पहले प्रसाद को माथे से लगाते, फिर आंखों से और फिर आदर से ग्रहण करते।
जगन्नाथ जी बोले, “देवी, यह अन्न नहीं खा रहे। यह मुझे ग्रहण कर रहे हैं।”
एकादशी देवी कुछ क्षण के लिए शांत हो गई लेकिन फिर भी उनका अहंकार पूरी तरह टूटा नहीं था। उन्होंने कहा, “प्रभु, फिर भी नियम तो तोड़ा गया है। अगर नियम ही नहीं रहेगा तो धर्म कैसे बचेगा?”
अब जगन्नाथ जी के स्वर में थोड़ी कठोरता आई। “और अगर प्रेम ही नहीं रहेगा तो धर्म का क्या मूल्य?”
यह सुनकर देवी कुछ पल के लिए चुप हो गई। लेकिन उनका मन अब भी अशांत था। उन्होंने अंतिम बार कहा, “प्रभु, मैं इस अन्याय को नहीं सह सकती। इन सबको दंड मिलना ही चाहिए।”
जगन्नाथ जी ने गहरी सांस ली और बोले, “देवी, तुमने भक्ति को नियम में बांध दिया है और जहां भक्ति बंध जाती है वहां अहंकार जन्म लेता है।”
जैसे ही यह शब्द गूंजे वातावरण पूरी तरह बदल गया। अचानक आकाश में गर्जना हुई। हवा और तेज हो गई। जगन्नाथ जी ने अपना हाथ उठाया और बोले, “अब समय आ गया है तुम्हें सत्य दिखाने का।”
अगले ही क्षण कुछ ऐसा हुआ जिसे देखकर पूरी स्तब्ध रह गई। आकाश में तेज प्रकाश फैल गया। हवा मानो रुक सी गई और उसी क्षण जगन्नाथ जी ने अपना दिव्य स्वरूप धारण कर लिया।
उनकी आवाज गूंज उठी। “देवी, तुमने भक्ति को समझे बिना ही निर्णय ले लिया। तुमने नियम को सबसे ऊपर रखा लेकिन प्रेम को नहीं समझा।”
एकादशी देवी अब शांत थी लेकिन भीतर अभी भी एक हल्की जिद बाकी थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “प्रभु, मैं तो धर्म की रक्षा कर रही थी।”
जगन्नाथ जी ने उत्तर दिया, “धर्म नियमों से नहीं, भाव से चलता है और यहां मेरे भक्त मुझे भूखा नहीं छोड़ सकते।”
जैसे ही यह शब्द समाप्त हुए अचानक एक तेज ऊर्जा प्रकट हुई और अगले ही क्षण एकादशी देवी का स्वरूप ऊपर उठने लगा। वो समझ भी नहीं पाई कि क्या हो रहा है। धीरे-धीरे उनका शरीर उल्टा होने लगा। सिर नीचे, पैर ऊपर और वो हवा में उलटी लटक गई।
पूरा वातावरण शांत हो गया। पूरी के लोग जो यह दृश्य देख रहे थे आश्चर्य में पड़ गए।
एकादशी देवी की आवाज कांप उठी। “प्रभु, यह क्या हो रहा है?”
जगन्नाथ जी ने गंभीर स्वर में कहा, “यह दंड नहीं है देवी। यह स्मरण है। स्मरण इस बात का कि जहां प्रेम नहीं समझा जाता, वहां दृष्टि उलटी हो जाती है।”
उनकी आवाज और गहरी हो गई। “तुमने मेरे भक्तों को गलत समझा। इसलिए आज तुम्हें उसी उलटी दृष्टि का अनुभव करना होगा।”
अब एकादशी देवी का अहंकार पूरी तरह टूट चुका था। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने विनम्र होकर कहा, “प्रभु, मुझसे भूल हो गई। मैंने आपके भक्तों की भक्ति को नहीं समझा। मुझे क्षमा कर दीजिए।”
कुछ क्षण के लिए पूरा वातावरण शांत हो गया। फिर धीरे-धीरे जगन्नाथ जी का स्वर नरम हुआ। “जब तक संसार रहेगा, तुम्हारा यह रूप लोगों को याद दिलाएगा कि व्रत से बड़ा प्रेम होता है।”
धीरे-धीरे एकादशी देवी का स्वरूप शांत हो गया और उसी अवस्था में वह वहीं स्थापित हो गई। कहा जाता है आज भी पूरी में एक स्थान ऐसा है जहां एकादशी का स्वरूप उल्टा दर्शाया जाता है ताकि हर भक्त यह याद रखें — भगवान को नियमों में नहीं, प्रेम में पाया जाता है।
प्यार से लिखिए जय जगन्नाथ जी 🙏🏻
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