sn vyas
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#नागेश्वर ज्योतिर्लिंग 🙏🌹 #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 यह कथा शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में आती है, जो नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना, दारुका राक्षसी के अत्याचार और दारुक वन के ऋषियों के अहंकार-भंग से जुड़ी हुई है। 1. दारुका का वरदान और राक्षसों का अत्याचार प्राचीन काल में 'दारुका' नाम की एक राक्षसी थी, जो देवी पार्वती की परम भक्त थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसे एक दिव्य वन (दारुका वन) वरदान में दिया था और उसे यह शक्ति दी थी कि वह इस वन को जहाँ चाहे ले जा सकती है। दारुका का पति 'दारुक' एक क्रूर राक्षस था। दारुका और दारुक ने उस वन का उपयोग करके धार्मिक लोगों, ऋषियों और शिव-भक्तों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। वे ऋषियों को बंदी बनाकर उस वन में कैद कर लेते थे। 2. ऋषियों का अहंकार और भगवान शिव की लीला इसी वन के निकट कई ज्ञानी ऋषि-मुनि भी रहते थे। समय के साथ उन ऋषियों को अपने ज्ञान, तपस्या और कर्मकांडों पर अहंकार हो गया था। वे सोचने लगे थे कि उनके तपोबल के आगे ईश्वर की भक्ति भी गौण है। उनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान शिव ने 'भिक्षुक' (अवधूत) रूप धारण किया और दारुका वन में पहुँचे। भगवान शिव का वह दिव्य और अलौकिक रूप देखकर ऋषियों की पत्नियाँ मोहित हो गईं और ऋषियों का ध्यान भंग हो गया। क्रोधित होकर ऋषियों ने शिवजी को पहचाने बिना उन्हें श्राप दे दिया कि उनका लिंग भूमि पर गिर जाए। जैसे ही वह लिंग भूमि पर गिरा, उसमें से संपूर्ण ब्रह्मांड को दग्ध कर देने वाली अग्नि उत्पन्न हो गई। तीनों लोक तपने लगे। तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने ऋषियों को उनकी भूल का अहसास कराया: "तुम्हारे अहंकार ने तुम्हें अंधा कर दिया था। जिन्हें तुमने साधारण भिक्षुक समझा, वे स्वयं देवाधिदेव महादेव थे।" ऋषियों को अपनी भूल पर भारी पश्चाताप हुआ। उन्होंने माता पार्वती और शिवजी की स्तुति की, जिसके बाद माता पार्वती ने उस लिंग को धारण किया और संसार की रक्षा हुई। 3. शिव-भक्त सुपार्श्व की रक्षा उधर, दारुक और दारुका राक्षसों ने सुपार्श्व (कुछ ग्रंथों में 'सुप्रिय') नाम के एक परम शिव-भक्त वैश्य को अपने अन्य साथियों के साथ दारुका वन के कारागार में बंदी बना रखा था। सुपार्श्व कारागार में भी भयभीत नहीं हुआ। उसने मिट्टी का एक पार्थिव शिवलिंग बनाया और 'ॐ नमः शिवाय' का निरंतर जाप करने लगा। उसके प्रभाव से अन्य बंदी भी शिव-भक्ति में लीन हो गए। जब दारुक राक्षस को यह पता चला, तो वह क्रोधित होकर सुपार्श्व का वध करने दौड़ा। सुपार्श्व ने सच्चे हृदय से भगवान शिव को पुकारा: "हे नागेश्वर! हे सर्वेश्वर! इस अधर्मी राक्षस से हमारी रक्षा करें!" 4. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य भक्त की करुण पुकार सुनते ही कारागार के भीतर भूमि फटी और स्वयं भगवान शिव एक दिव्य रत्नजटित सिंहासन पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए। भगवान शिव ने अपने पाशुपतास्त्र से दारुक और उसकी पूरी राक्षस सेना का संहार कर दिया। माता पार्वती के वरदान के कारण दारुका राक्षसी की रक्षा तो हो गई, लेकिन उसने अपना अधर्म का मार्ग त्याग दिया। 5. ज्योतिर्लिंग की स्थापना भगवान शिव ने सुपार्श्व और सभी ऋषियों को अभय दान दिया। ऋषियों का अहंकार पूरी तरह नष्ट हो चुका था और उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे समस्त संसार के कल्याण के लिए सदैव उसी स्थान पर विराजमान रहें। तभी से भगवान शिव वहाँ 'नागेश्वर' (नागों के ईश्वर) के नाम से ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हुए और वह पावन क्षेत्र नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहलाया। कथा का संदेश: कितना भी ज्ञान या तपोबल प्राप्त हो जाए, अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है। भगवान शिव केवल अपने भक्त की सच्ची और निष्काम भक्ति देखते हैं, ज्ञान का अहंकार नहीं।
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