sn vyas
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#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #प्रदिप मिश्रा शिव पुराण कथा 🙏 #शिव पुराण 🌺 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱बम बम भोले🙏 1. अवंतिका (उज्जैन) और दुःशासन का अत्याचार शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार, अवंतिकापुरी (आधुनिक उज्जैन) में एक परम ज्ञानी और शिवभक्त वेदप्रिय नाम के ब्राह्मण अपने चार पुत्रों—देवप्रिय, प्रियमेध, संस्कृत और सुव्रत के साथ रहते थे। वे सभी परिवार सहित नित्य पार्थिव शिव लिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना करते थे। उसी काल में दुःशासन नाम का एक उग्र और अत्याचारी दैत्य था। ब्रह्मा जी से वरदान पाकर वह अत्यंत अहंकार से भर गया। उसने धार्मिक अनुष्ठानों को बंद करवा दिया और अंत में अवंतिकापुरी पर आक्रमण कर दिया। 2. ब्राह्मणों की भक्ति और दुःशासन का अंत दुःशासन अपने राक्षसों के साथ वेदप्रिय ब्राह्मण के घर में घुसा और चिल्लाया—"शिव पूजन बंद करो और मेरी पूजा करो, अन्यथा मैं तुम्हारा वध कर दूंगा!" ब्राह्मण पुत्रों ने बिना किसी भय के अपनी आंखें बंद कर लीं और शिवजी के ध्यान में लीन रहकर "ॐ नमः शिवाय" का जाप जारी रखा। जब दुःशासन ने तलवार उठाकर ब्राह्मणों पर वार करना चाहा, तभी पार्थिव शिवलिंग के स्थान पर एक भयंकर गड्ढा (कुंड) बन गया और उसमें से स्वयं भगवान शिव 'महाकाल' रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने केवल अपनी 'हुंकार' (एक गर्जना) से दुःशासन और उसकी राक्षसी सेना को क्षण भर में भस्म कर दिया। 3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना ब्राह्मणों और नगरवासियों की प्रार्थना पर भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा-सदा के लिए वहीं निवास करने लगे। वही पावन स्थल आज उज्जैन का प्रसिद्ध 'महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग' कहलाता है। 🚩 ऋषि वेदधर्म और उनके शिष्य प्रियमेध (गुरुभक्ति परीक्षा) 1. वेदधर्म की उग्र परीक्षा शिव पुराण के उमा संहिता / शतरुद्र संहिता के अंतर्गत गुरु-भक्ति की एक अद्भुत कथा आती है। ऋषि वेदधर्म (जिन्हें कई संदर्भों में वेदधर्म/वेदप्रिया भी कहा गया है) अपने शिष्यों की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा: "मैंने अपने पूर्वजन्मों के पाप कर्मों के कारण शरीर में भयानक कुष्ठ रोग और दरिद्रता का फल भोगने का निश्चय किया है। जो शिष्य 10 वर्षों तक मेरी इस अवस्था में निःस्वार्थ सेवा करेगा, वही मेरी विद्या का सच्चा अधिकारी होगा।" अधिकांश शिष्य कठिन परीक्षा के डर से चले गए, परंतु प्रियमेध नाम के शिष्य (जिन्हें कुछ कथाओं में मुंज या सत्यरथ भी कहा गया है) ने अपने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाया और कहा कि वे जीवन भर उनकी सेवा करेंगे। 2. प्रियमेध की कठिन गुरु-सेवा ऋषि वेदधर्म काशी चले गए। वहाँ प्रियमेध ने अपने गुरु की हर संभव सेवा की: गुरुदेव का शरीर गल रहा था, तीव्र दुर्गंध आती थी और उनका स्वभाव अत्यधिक क्रोधी व चिड़चिड़ा हो गया था। गुरुदेव प्रियमेध पर कारण ही क्रोध करते, उन्हें मारते-पीटते और भोजन भी न देते। इसके बावजूद प्रियमेध नित्य मांगकर (भिक्षा से) गुरु के लिए भोजन लाते, उनके घावों को धोते और दिन-रात पैर दबाते रहते। 3. भगवान शिव का प्रकट होना और फल प्रियमेध की इस अलौकिक गुरु-भक्ति को देखकर स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। शिवजी ने प्रियमेध को प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा—"हे वत्स! तुम्हारी गुरु-भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें मनचाहा वरदान देने आया हूँ।" प्रियमेध ने हाथ जोड़कर कहा: "हे महादेव! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे गुरुदेव का यह कुष्ठ रोग दूर कर दीजिए और उन्हें संपूर्ण आरोग्य प्रदान कीजिए।" तभी ऋषि वेदधर्म हँस पड़े और अपने दिव्य स्वरूप में आ गए। उन्होंने प्रियमेध को गले लगाया और कहा कि वे बीमार नहीं थे, बल्कि यह केवल उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा थी। भगवान शिव के आशीर्वाद से प्रियमेध को संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान और परम पद प्राप्त हुआ। 📖 शिव पुराण संदर्भ दुःशासन वध प्रसंग: शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय 16-17)। वेदधर्म-प्रियमेध प्रसंग: शिव पुराण की उमा संहिता / शतरुद्र संहिता (गुरु-भक्ति माहात्म्य)।
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