sn vyas
1K views 10 days ago
#😇सोमवार भक्ति स्पेशल🌟 #🔱सावन का पहला सोमवार 🕉️ #🔱शिवपुराण कथा📖 #🔱बम बम भोले🙏 #🔱बम बम भोले🙏 हिमालय की बर्फ से ढकी दिव्य चोटियों के मध्य स्थित कैलाश पर्वत उस दिन भी सदैव की भांति शांत और अलौकिक दिखाई दे रहा था। चारों ओर फैली हिम की उज्ज्वल चादर, मंद-मंद बहती हिमानी वायु, भगवान शिव के डमरू की सूक्ष्म ध्वनि और उनकी जटाओं से प्रवाहित होती पवित्र भागीरथी की धारा पूरे कैलाश को दिव्यता से भर रही थी। गण अपनी सेवा में व्यस्त थे, नंदी द्वार पर अचल भक्ति के साथ पहरा दे रहे थे और देवगण दूर से कैलाश की ओर नमन कर रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो सम्पूर्ण सृष्टि पूर्ण संतुलन में है। परंतु नियति ने उस दिन एक ऐसी परीक्षा लिख रखी थी, जिसकी कल्पना स्वयं देवताओं ने भी नहीं की थी। भगवान शिव कई दिनों से अखंड समाधि में लीन थे। उनकी चेतना सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त थी। बाहर से वे पूर्णतः निश्चल दिखाई देते थे, किंतु भीतर वे सृष्टि के सूक्ष्म संतुलन को संभाले हुए थे। दूसरी ओर माता पार्वती दूर खड़ी अपने आराध्य को निहार रही थीं। उनकी आंखों में अथाह प्रेम था, पर उस प्रेम के पीछे एक गहरा अकेलापन भी छिपा हुआ था। अनेक दिनों से महादेव ने उनसे कोई संवाद नहीं किया था। न कैलाश की पवित्र घाटियों में साथ भ्रमण, न मधुर मुस्कान, न कोई स्नेहिल शब्द। अंततः माता के हृदय में एक प्रश्न जन्म लेने लगा—क्या अब मेरे स्वामी को मेरी आवश्यकता नहीं रही? उसी समय नंदी विनम्रता से उनके समीप आए। उन्होंने माता के चेहरे पर उदासी की छाया देखी और हाथ जोड़कर पूछा, "माते, क्या सब कुशल है?" माता ने हल्की मुस्कान का प्रयास किया, परंतु उनकी आंखों की नमी सब कुछ कह रही थी। उन्होंने केवल इतना कहा, "नंदी, कभी-कभी मौन सबसे अधिक पीड़ा देता है।" नंदी कुछ समझ नहीं सके। उन्हें लगा समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। किंतु उसी क्षण कैलाश के ऊपर उड़ते दिव्य हंस अचानक भयभीत होकर दूसरी दिशा में उड़ गए। बर्फीली हवाएं प्रचंड हो उठीं। डमरू की सूक्ष्म ध्वनि भी मानो स्वयं शांत हो गई। पूरा वातावरण किसी अदृश्य संकट की सूचना देने लगा। माता पार्वती अपने कक्ष में लौटीं। उन्होंने एक-एक करके अपने सभी आभूषण उतार दिए। स्वर्ण मुकुट, रत्नमय हार, कंगन और अलंकार सब वहीं छोड़ दिए। केवल एक साधारण वस्त्र धारण किया। उनकी सखी जया घबराकर बोली, "माते, आप यह क्या कर रही हैं?" माता ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "आज मुझे कैलाश छोड़ना होगा।" यह सुनते ही जया स्तब्ध रह गई। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि शक्ति स्वयं शिवधाम छोड़ने का निर्णय ले सकती हैं। जब माता कैलाश के मुख्य द्वार तक पहुंचीं, तभी आकाश में भीषण गर्जना हुई। दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और एक गंभीर स्वर गूंजा—"देवी, यदि आपने यह सीमा पार कर ली तो केवल कैलाश ही नहीं, तीनों लोकों का संतुलन भी बदल जाएगा।" माता ने चारों ओर देखा। तभी उस प्रकाश से देवर्षि नारद प्रकट हुए। उनके मुख पर पहले जैसी चंचल मुस्कान नहीं थी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "माते, मैं आपको रोकने नहीं आया, बल्कि एक ऐसा रहस्य बताने आया हूं जिसे युगों से देवताओं से भी छिपाकर रखा गया है।" नारद बोले, "महादेव आपसे विमुख नहीं हुए हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर आने वाले एक ऐसे संकट को अपनी समाधि के द्वारा रोक रहे हैं, जो यदि जाग गया तो सृष्टि का संतुलन समाप्त हो जाएगा।" माता पार्वती आश्चर्यचकित रह गईं। उनके मन में केवल एक प्रश्न था—"यदि ऐसा था तो उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं?" नारद मौन हो गए। उनके पास भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं था। उधर कैलाश पर नंदी बार-बार भगवान शिव की ओर देख रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि समाधि में बैठे महादेव की बंद आंखों से एक अश्रु की बूंद धीरे-धीरे उनके चरणों पर गिर पड़ी। उसी क्षण भगवान के अधरों से बिना नेत्र खोले एक वाक्य निकला—"प्रेम को बंधन से नहीं, विश्वास से जीता जाता है।" इधर माता पार्वती कैलाश की सीमा पार कर चुकी थीं। उसी क्षण आकाश में एक विशाल काला भंवर उत्पन्न हुआ। उसकी गर्जना से दिशाएं कांप उठीं। माता ने अपनी दिव्य शक्ति से उसे रोकने का प्रयास किया, किंतु उनकी शक्ति उस भंवर को छूते ही विलीन हो गई। वे पहली बार चौंक उठीं। तभी नारद बोले, "माते, यह कोई साधारण शक्ति नहीं। यह वही आद्य अंधकार है जो तब जागता है जब शिव और शक्ति अलग हो जाते हैं।" काला भंवर धीरे-धीरे एक विशाल छाया का रूप लेने लगा। उसकी आंखें अग्नि के समान लाल थीं। उसने अट्टहास करते हुए कहा, "युगों से मैं इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था। जब शिव और शक्ति अलग होंगे, तब मुझे कोई नहीं रोक पाएगा।" देवलोक में भय फैल गया। इंद्र का वज्र कांप उठा। वरुण का पाश निष्प्रभ हो गया। यमराज का दंड भी कंपन करने लगा। स्वयं ब्रह्मा जी ने अपनी आंखें खोलीं और गंभीर स्वर में कहा, "यदि शिव और शक्ति का पुनर्मिलन नहीं हुआ तो यह अंधकार सम्पूर्ण सृष्टि को निगल जाएगा।" उधर भगवान शिव ने धीरे-धीरे अपनी समाधि खोली। उन्होंने युद्ध की तैयारी नहीं की। उन्होंने केवल अपनी आंखें बंद कर माता पार्वती का स्मरण किया। उनके अधरों से एक ही शब्द निकला—"पार्वती..." वह पुकार हजारों योजन दूर माता के हृदय तक पहुंची। उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि महादेव का मौन उपेक्षा नहीं, बल्कि त्याग था। वे स्वयं अपने प्रेम को छिपाकर सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा कर रहे थे। लेकिन उसी क्षण वह अंधकारमय शक्ति क्रोधित होकर गरजी और उसने एक प्रचंड अग्निगोला माता पार्वती की ओर फेंक दिया। सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्तब्ध रह गया। तभी आकाश में दिव्य मंत्र गूंजा—"ॐ नमः शिवाय..." करोड़ों प्रकाश किरणों के मध्य स्वयं भगवान शिव माता पार्वती के सामने प्रकट हो गए। उन्होंने अपना त्रिशूल आगे बढ़ाया। अग्निगोला उससे टकराते ही असंख्य दिव्य कमलों में बदल गया। सम्पूर्ण आकाश पुष्पवर्षा से भर उठा। माता पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले। वे धीरे-धीरे महादेव के समीप आईं और बोलीं, "स्वामी, मैंने आपके मौन को आपके प्रेम की कमी समझ लिया।" महादेव मुस्कुराए। उन्होंने माता का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, "पार्वती, जहां विश्वास जीवित हो, वहां क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं होती।" जैसे ही शिव और शक्ति का स्पर्श हुआ, सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिव्य प्रकाश से भर उठा। उनके संयुक्त तेज ने उस अंधकारमय शक्ति को चारों ओर से घेर लिया। वह छाया पीड़ा से चीत्कार करने लगी। कुछ ही क्षणों में उसका अस्तित्व प्रकाश में विलीन हो गया। आकाश निर्मल हो गया। नदियां पुनः शांत बहने लगीं। हिमालय की चोटियां पहले से अधिक उज्ज्वल हो उठीं। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। गणों ने हर-हर महादेव का जयघोष किया। तब भगवान शिव ने समस्त लोकों की ओर देखते हुए कहा, "संसार का सबसे बड़ा शत्रु क्रोध नहीं, बल्कि गलतफहमी है। और सबसे बड़ी शक्ति केवल बल नहीं, बल्कि विश्वास है। जहां विश्वास जीवित रहता है, वहां कोई भी अंधकार अधिक समय तक नहीं टिक सकता।" माता पार्वती ने मुस्कुराकर कहा, "और जहां प्रेम में संवाद बना रहता है, वहां दूरी कभी स्थायी नहीं होती।" उस दिन के बाद देवताओं ने भी यह संकल्प लिया कि किसी भी संबंध में मौन को कभी गलतफहमी बनने नहीं देंगे। कहा जाता है कि जब भी कोई भक्त सच्चे हृदय से "ॐ नमः शिवाय" का जप करता है, तब कैलाश में विराजमान भगवान शिव और माता पार्वती उसी प्रेम, विश्वास और एकता का आशीर्वाद उसे प्रदान करते हैं। यही इस कथा का संदेश है—सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, विश्वास कभी टूटना नहीं चाहिए और शिव-शक्ति का मिलन ही सम्पूर्ण सृष्टि के संतुलन का आधार है। हर हर महादेव 🙏🏻
29 likes
19 shares

More like this