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सुशील मेहता - Author on ShareChat
सुशील मेहता
556 views • 4 days ago
कलाम मंजूर आरफी #सूफी काव्य
QcIH" /1 मोरे ज्ञान गुनी मोरे पीत-पदम मोरे सीस ्मुकुट मोरे जान-ओ ्तनम मोरे साँचे बलम मोरे दीन ओनधरम तोरे हाथ है हमरी लाजन्शरम मोहे लाग है तुम से तुम से लगन मोरे सीस है साजन चरन तुमरे करूँ कोउ उपाय मैं कौन जतन वही तुर्फ़ा सितम वही तुर्फ़ा सितम मोरे गुन अवगुन कुछ चित न धरो मोरे खोट कलंक सजन बिसरो मोरे पीत किए की लाज रखो नित नित की ये पीडा हर लो बलम कहो मन की बिपत मैं का से कहूँ कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ तोरे चरनन लागूँ पाएँ परूँ तोरे द्वारे आन पड़ी प्रीतम (मंजूर आरफी) QcIH" /1 मोरे ज्ञान गुनी मोरे पीत-पदम मोरे सीस ्मुकुट मोरे जान-ओ ्तनम मोरे साँचे बलम मोरे दीन ओनधरम तोरे हाथ है हमरी लाजन्शरम मोहे लाग है तुम से तुम से लगन मोरे सीस है साजन चरन तुमरे करूँ कोउ उपाय मैं कौन जतन वही तुर्फ़ा सितम वही तुर्फ़ा सितम मोरे गुन अवगुन कुछ चित न धरो मोरे खोट कलंक सजन बिसरो मोरे पीत किए की लाज रखो नित नित की ये पीडा हर लो बलम कहो मन की बिपत मैं का से कहूँ कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ तोरे चरनन लागूँ पाएँ परूँ तोरे द्वारे आन पड़ी प्रीतम (मंजूर आरफी)
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  • momin moin - Author on ShareChat
    momin moin
    #ilovemadina #islam #naat #sufi #islamic jumma Mubarak ap sab ko ❤️
    ilovemadina, islam
    14
    28
  •  - Author on ShareChat
    💞🄶🄰🄽🄴🅂🄷💞
    #🕌# सुफी संगीत #🕌सुफी संगीत 🕌#🤲 इबादत#🤲 दुआएं
    सुफी संगीत, सुफी संगीत
    737
    1K
  • momin moin - Author on ShareChat
    momin moin
    islamicstatus #islam #♠NFAK💞Qwali ♠ #sufi #viral #शेयरचेटViral
    islamicstatus, islam
    13
    49
  • momin moin - Author on ShareChat
    momin moin
    Aasalam allykum jumma mubarak ❤️ #khawaja #♠NFAK💞Qwali ♠ #naat #sufi #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
    Aasalam allykum jumma mubarak, khawaja
    23
    82
  • Noori hassan - Author on ShareChat
    Noori hassan
    #qawali #qawali special #islamic qawali
    qawali, qawali special
    20
    29
  • सुशील मेहता - Author on ShareChat
    सुशील मेहता
    अनुवादित कलाम जलालुद्दीन रुमी #सूफी काव्य
    " जलालुद्दीन रुमी का कलाम अनुवादित" तुझ से कहा था मैं ने कल ऐ बे नज़ीर ए ख़ुश लिक़ा ऐ रश्क से तेरे फ़लक पर चाँद दोहरा हो गया इमरोज़ तू जो कुछ भी है हाजिब था तू सुल्ताँ বনাা तू यूसुफ़ ए॰कन' आँ' बना तू हुस्न ए नूरए मुस्तफ़ा इमशब सताइश मैं ने की कल होगी बरतर ऐ कल ये ज़मीन ओ आसमाँ ता'रीफ़ में होंगे 47 हूँ मैं चाकर तिरा इमशब ग़नीमत है मुझे नौकर होंगे फ़रिश्ते हम्द ख़्वाँ कल ' अर्श फाड़ेगा क़बा नागाह सरसर आएगी ये बाम होगा और न दर मिट जाएँगे सब बद नफ़स कीड़े मकोड़ों की 76 आँधी चलेगी जब तिरी ताबिंदा उस में होगा तू हर ज़र्रा हँसता पाएगा उस नूर में शमसुज़्ज़ुहा वो दिल रुबाई पाएँगे पहले न थी उन में कभी ता'लीम ज़र्रे पाएँगे ऐ आफ़्ताब ए ख़ुश लिक़ा Motivational Videos App Want " जलालुद्दीन रुमी का कलाम अनुवादित" तुझ से कहा था मैं ने कल ऐ बे नज़ीर ए ख़ुश लिक़ा ऐ रश्क से तेरे फ़लक पर चाँद दोहरा हो गया इमरोज़ तू जो कुछ भी है हाजिब था तू सुल्ताँ বনাা तू यूसुफ़ ए॰कन' आँ' बना तू हुस्न ए नूरए मुस्तफ़ा इमशब सताइश मैं ने की कल होगी बरतर ऐ कल ये ज़मीन ओ आसमाँ ता'रीफ़ में होंगे 47 हूँ मैं चाकर तिरा इमशब ग़नीमत है मुझे नौकर होंगे फ़रिश्ते हम्द ख़्वाँ कल ' अर्श फाड़ेगा क़बा नागाह सरसर आएगी ये बाम होगा और न दर मिट जाएँगे सब बद नफ़स कीड़े मकोड़ों की 76 आँधी चलेगी जब तिरी ताबिंदा उस में होगा तू हर ज़र्रा हँसता पाएगा उस नूर में शमसुज़्ज़ुहा वो दिल रुबाई पाएँगे पहले न थी उन में कभी ता'लीम ज़र्रे पाएँगे ऐ आफ़्ताब ए ख़ुश लिक़ा Motivational Videos App Want
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  • सुशील मेहता - Author on ShareChat
    सुशील मेहता
    कलाम अमीर ख़ुसरो #सूफी काव्य
    কলাম" ख़बरम रसीदः इमशब कि निगार ख़्वाही आमद सर-ए॰्मन फ़िदा ए राह कि सवार ख़्वाही आमद (ख़बर आई है कि आज की रात मेरा महबूब आएगा , मेरी जान उस राह में क़ुर्बान जिस राह से वो सवार आएगा |) हमः आहुवान ए सहरा सर॰ए ख़ुद निहादः बर ्कफ़ ब उम्मीद ए॰आँ कि रोज़े ब॰शिकार ख़्वाही आमद (जंगल के सारे हिरन अपनी हथेली पे सर रखे आएँगे , इस उम्मीद में कि तू उन के शिकार के लिए आएगा |) कशिशे कि 'इश्क़ दारद न गुज़ारदत ब॰दीं साँ ब-्जनाज़ः गर नऱ्याई बन्मज़ार ख़्वाही आमद (इश्क़ की कशिश है वो बे असर नहीं होगी , उम्मीद है कि तू जनाज़े में नहीं तो मज़ार पर ज़़रूर आएगा | जानम तू बिया कि ज़िंदः मानम 7-744<4: पस अज़ आँ कि मन नन्मानम ब-चे कार ख़्वाही आमद होंठों तक आ गई है, ज़रा आ जा कि मैं ज़िंदा रह जान सकूँ , मैं ज़िन्दा ही नहीं रहूँगा तो फिर तेरे आने से क्या होगा I) आमदन रुबूदी दिल ओ दीन ओ सब्र॰ए-ख़ुसरौ बन्यक चे शवद अगर बनदीं सा दो-सेह बार ख़्वाही आमद (तुम्हारे एक ही बार आने से ख़ुसरौ॰ का दिल ओ-जान जैसे उड़ गए। अब अगर इसी तरह दो॰तीन बार और आ जाओ तो क्या होगा?) (अमीर ख़ुसरो) কলাম" ख़बरम रसीदः इमशब कि निगार ख़्वाही आमद सर-ए॰्मन फ़िदा ए राह कि सवार ख़्वाही आमद (ख़बर आई है कि आज की रात मेरा महबूब आएगा , मेरी जान उस राह में क़ुर्बान जिस राह से वो सवार आएगा |) हमः आहुवान ए सहरा सर॰ए ख़ुद निहादः बर ्कफ़ ब उम्मीद ए॰आँ कि रोज़े ब॰शिकार ख़्वाही आमद (जंगल के सारे हिरन अपनी हथेली पे सर रखे आएँगे , इस उम्मीद में कि तू उन के शिकार के लिए आएगा |) कशिशे कि 'इश्क़ दारद न गुज़ारदत ब॰दीं साँ ब-्जनाज़ः गर नऱ्याई बन्मज़ार ख़्वाही आमद (इश्क़ की कशिश है वो बे असर नहीं होगी , उम्मीद है कि तू जनाज़े में नहीं तो मज़ार पर ज़़रूर आएगा | जानम तू बिया कि ज़िंदः मानम 7-744<4: पस अज़ आँ कि मन नन्मानम ब-चे कार ख़्वाही आमद होंठों तक आ गई है, ज़रा आ जा कि मैं ज़िंदा रह जान सकूँ , मैं ज़िन्दा ही नहीं रहूँगा तो फिर तेरे आने से क्या होगा I) आमदन रुबूदी दिल ओ दीन ओ सब्र॰ए-ख़ुसरौ बन्यक चे शवद अगर बनदीं सा दो-सेह बार ख़्वाही आमद (तुम्हारे एक ही बार आने से ख़ुसरौ॰ का दिल ओ-जान जैसे उड़ गए। अब अगर इसी तरह दो॰तीन बार और आ जाओ तो क्या होगा?) (अमीर ख़ुसरो)
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  • सुशील मेहता - Author on ShareChat
    सुशील मेहता
    कलाम का फरीदुद्दीन् अत्तार #सूफी काव्य
    कलाम गर जुम्लः तुई हमः जहाँ चीस्त वर हेच नयम मन ईं फ़ुग़ाँ चीस्त तू ही सब कुछ है तो फिर ये दुनिया क्या है (3nR अगर मैं कुछ नहीं हूँ तो फिर ये आहें और रोना क्या है) ৪স তুদ্ল: নুৎ-স্ী-৪স ৪স: নু आँ चीज़ कि ग़ैर एन्तुस्त आँ चीस्त (तू ही सब कुछ है और तू ही सब है फिर तेरे अ॰लावा जो चीज़ें हैं वो क्या हैj चुँ हस्त यक़ीं कि नीस्त जुज़ तू आवाज़ः ए॰ईं हमः गुमाँ चीस्त (जब ये सच है कि तेरे अ॰लावा कुछ और नहीं है तो फिर ये तमाम आवाज़ें कैसी हैj बर मा चू वजूद नीस्त मा रा चन्दीं तग ओनपौए दर जहाँ चीस्त (जब हमारे अस्तित्व के अ॰लावा हमारा कुछ नहीं है तो फिर दुनिया में ये दौड़ धूप किस लिए है) जॉं दर तू ज़े ख़्वेश्तन फ़ना शुद ज़ाँ बे ख़बरस्त कि ईं जहाँ चीस्त मुझसे निकल कर तुझमें फ़ना हो गई I ये इस से बे॰खबर है कि ये दुनिया क्या है) 'अ'त्तार-ए॰ज़ई॰फ़ रा अज़ ईं सिर जुज़ गुफ़्त मियाँ ्तही निशाँ चीस्त (ज़ईफ़  अत्तार की ये बातें महज़ खोखली हैं अंदर कुछ नहीं है) फ़रीदुद्दीन अत्तार कलाम गर जुम्लः तुई हमः जहाँ चीस्त वर हेच नयम मन ईं फ़ुग़ाँ चीस्त तू ही सब कुछ है तो फिर ये दुनिया क्या है (3nR अगर मैं कुछ नहीं हूँ तो फिर ये आहें और रोना क्या है) ৪স তুদ্ল: নুৎ-স্ী-৪স ৪স: নু आँ चीज़ कि ग़ैर एन्तुस्त आँ चीस्त (तू ही सब कुछ है और तू ही सब है फिर तेरे अ॰लावा जो चीज़ें हैं वो क्या हैj चुँ हस्त यक़ीं कि नीस्त जुज़ तू आवाज़ः ए॰ईं हमः गुमाँ चीस्त (जब ये सच है कि तेरे अ॰लावा कुछ और नहीं है तो फिर ये तमाम आवाज़ें कैसी हैj बर मा चू वजूद नीस्त मा रा चन्दीं तग ओनपौए दर जहाँ चीस्त (जब हमारे अस्तित्व के अ॰लावा हमारा कुछ नहीं है तो फिर दुनिया में ये दौड़ धूप किस लिए है) जॉं दर तू ज़े ख़्वेश्तन फ़ना शुद ज़ाँ बे ख़बरस्त कि ईं जहाँ चीस्त मुझसे निकल कर तुझमें फ़ना हो गई I ये इस से बे॰खबर है कि ये दुनिया क्या है) 'अ'त्तार-ए॰ज़ई॰फ़ रा अज़ ईं सिर जुज़ गुफ़्त मियाँ ्तही निशाँ चीस्त (ज़ईफ़  अत्तार की ये बातें महज़ खोखली हैं अंदर कुछ नहीं है) फ़रीदुद्दीन अत्तार
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  • सुशील मेहता - Author on ShareChat
    सुशील मेहता
    रुबाई सरमद #सूफी काव्य
    ७k७७k@७k "705"' बा-नफ़्स ए-सितमगार ब-्जंगम हर दम दर बहर एन्वुजूद ए ख़ुद नहंगम हर दम रूबाह बुवद हिर्स-ओ हवा दर नज़रम दर बेशः-ए-अंदेशः पलंगम हर दम दिन रात रही नफ़्स ए सितमगार से जंग हूँ अपनी ही हस्ती के समंदर में नहंग हैं हिर्स ओऱ्हवा मेरी नज़र में रूबाह मैं दश्त ए ख़यालात में हूँ एक पलंग (सरमद ७k७७k@७k "705"' बा-नफ़्स ए-सितमगार ब-्जंगम हर दम दर बहर एन्वुजूद ए ख़ुद नहंगम हर दम रूबाह बुवद हिर्स-ओ हवा दर नज़रम दर बेशः-ए-अंदेशः पलंगम हर दम दिन रात रही नफ़्स ए सितमगार से जंग हूँ अपनी ही हस्ती के समंदर में नहंग हैं हिर्स ओऱ्हवा मेरी नज़र में रूबाह मैं दश्त ए ख़यालात में हूँ एक पलंग (सरमद
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