sn vyas
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#विष्णु #🌹🌹जय श्रीहरि विष्णु 🌹🌹 #🌺श्रीहरि विष्णु🌺🙏
विष्णु भगवान का युद्ध और कालनेमि का वध :
पुलस्त्य जी बोले—हे कलहप्रिय (नारद जी)! दैत्य बलि को इसीलिए राजा बनाया गया था। प्रह्लाद उसके सलाह देने वाले मंत्री थे और शुक्राचार्य पुरोहित थे। विरोचन के बेटे बलि के राजा बनने की बात जानकर मय दानव के साथ सभी दैत्य उसे देखने की इच्छा से आए। वहाँ आए हुए अपने कुल के बड़े-बुजुर्गों को देखकर बलि ने बारी-बारी से उनकी पूजा-आदर किया और उनसे पूछा—"मेरे लिए क्या भला और कल्याणकारी है?उन सभी ने उससे कहा—हे देवमर्दन (देवताओं का दमन करने वाले)! तुम्हारे लिए जो कल्याणकारी है और हम सबके लिए हितकारी है, उस बात को सुनो—
तुम्हारे दादा हिरण्यकशिपु बहुत बलवान, वीर और दानव वंश का पालन करने वाले थे। वे तीनों लोकों के राजा यानी इंद्र बन गए थे। लेकिन सिंह का शरीर धारण करके देवताओं में श्रेष्ठ श्रीविष्णु ने उनके पास आकर बड़े-बड़े दानवों के सामने ही उन्हें अपने नाखूनों से चीर डाला। हे महाबाहु! त्रिशूल धारण करने वाले भगवान शंकर ने भी देवताओं के लिए महान बलशाली अंधक का राज्य छीन लिया था। और इंद्र ने तुम्हारे चाचा जम्भ को मार दिया, तथा विष्णु ने तुम्हारे सामने ही कुजम्भ को किसी पशु की तरह मार डाला॥
मैं तुमसे सच-सच बतला दे रहा हूँ कि महेंद्र (इन्द्र) ने शंभु, पाक, तुम्हारे भाई सुदर्शन और तुम्हारे पिता विरोचन को मार डाला है।पुलस्त्य जी कहते हैं कि हे ब्रह्मन्! इंद्र द्वारा किए गए अपने कुल के विनाश की बात सुनकर दानव बलि ने सभी बड़े-बड़े असुरों को युद्ध की तैयारी करने की प्रेरणा दी।
फिर क्या था, कुछ असुर रथों पर, कुछ हाथियों पर, कुछ घोड़ों पर और कुछ पैदल ही देवताओं से युद्ध करने के लिए चल पड़े। सेना के सबसे आगे भयंकर और महाबलशाली सेनापति मय चल रहा था। सेना के बीच में बलि, पीछे कालनेमि, बायीं ओर मशहूर पराक्रमी शाल्व और दाहिनी बगल में भयंकर तारक नाम का असुर पूरी कुशलता के साथ चल रहा था॥
हे कलह प्रिय (नारद जी)! हजारों, दस-दस लाखों ही नहीं, बल्कि दस-दस करोड़ों की संख्या में—असंख्य दैत्य देवताओं से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। असुरों की इस तरह की युद्ध की तैयारी को सुनकर देवताओं के राजा इंद्र ने देवताओं से कहा—हे देवताओ! हम सब देवगण भी अपनी पूरी सेना और बल के साथ आए हुए इन दैत्यों से लड़ने के लिए चलें।
ऐसी घोषणा करके बलवान देवपति इंद्र अपने सारथि मातलि द्वारा चलाए जा रहे घोड़ों वाले रथ पर सवार हो गए। इंद्र के रथ पर चढ़ते ही बाकी देवता भी अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर युद्ध की इच्छा से बाहर निकल पड़े॥
आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, विद्याधर, गुह्यक, यक्ष, राक्षस, नाग (पन्नग), राजर्षि, सिद्ध और कई तरह के भूत-गण एक जगह जमा हो गए। कुछ हाथियों पर, कुछ रथों पर और कुछ घोड़ों पर सवार हुए। नारद जी! कुछ देवगण पक्षियों द्वारा उड़ाए जाने वाले चमकीले विमानों पर चढ़कर वहाँ पहुँच गए, जहाँ दैत्यों की सेना पहले से जमी हुई थी। इसी समय बुद्धिमान गरुड़ जी आ गए। देवताओं में श्रेष्ठ भगवान विष्णु उन पर सवार होकर वहाँ पधारे॥
फिर तो हजार आँखों वाले इंद्र ने सभी देवताओं के साथ सिर झुकाकर वहाँ आए हुए तीनों लोकों के स्वामी, अविनाशी भगवान विष्णु की वंदना की। इसके बाद कार्तिकेय देवसेना के आगे के हिस्से की, गदाधारी श्रीविष्णु सेना के पीछे के हिस्से की और सहस्रलोचन इंद्र बीच के हिस्से की रक्षा करते हुए चलने लगे। हे नारद मुनि! जयंत बायीं ओर की सेना को संभाल कर चले और बलवान वरुण दाहिनी बगल की सेना को समेट कर चले। इसके बाद तरह-तरह के अस्त्र- शस्त्र धारण करने वाले योद्धाओं से बनी और स्कंद (कार्तिकेय), विष्णु, वरुण तथा सूर्य द्वारा सुरक्षित देवताओं की यशस्वी सेना दुश्मनों की सेना के पास बने पहाड़ पर पहुँच गई।
उदयाचल पर्वत के पेड़ों और पक्षियों से रहित, एक सुंदर और समतल पथरीले मैदान में देवताओं और दैत्यों का भारी युद्ध हुआ। हे मुनि नारद जी! पुराने ज़माने में जैसा युद्ध बंदरों और हाथियों के बीच हुआ था, वैसा ही घमासान संग्राम उन दोनों सेनाओं के बीच हुआ।
हे सुरतापस! रथों के चलने से उड़ी हुई युद्ध की पीले-लाल रंग की धूल युद्ध की जमीन के ऊपर आसमान में शाम के समय के लाल बादल की तरह लग रही थी। उस समय चल रहे भयंकर युद्ध में कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। चारों ओर लगातार '(काटकर) टुकड़े- टुकड़े कर दो', 'फाड़ डालो' की आवाज़ें ही सुनाई दे रही थीं॥
उसके बाद देवताओं और दैत्यों की भयंकर मार-काट से खून की नदियाँ बह निकलीं, जिससे हवा में उड़ती धूल शांत हो गई और खून-धूल मिलकर कीचड़ बन गया। धूल के शांत होते ही देवता आदि बुद्धिमान कार्तिकेय के साथ बड़े दानव- दल पर टूट पड़े।
फिर क्या हुआ ...
विष्णु भगवान का युद्ध और कालनेमी का वध ।
स्वामी कार्तिकेय की बाहुबल की छत्र छाया में सुरक्षित देवताओं ने दैत्यों का संहार किया और मय दानव की सुरक्षा में दैत्यों ने हमला करते हुए देवताओं को मारा। लेकिन नारद जी! इसके बाद अमृत न पीने के कारण कार्तिकेय सहित श्रेष्ठ देवता युद्ध में दैत्यों से हार गए।
देवताओं को हारता हुआ देखकर शत्रुओं का दमन करने वाले गरुड़ध्वज विष्णु अपने शार्ङ्ग धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर चारों ओर बाणों की बौछार करने लगे। श्री विष्णु के लोहे की नोक वाले बाणों से पिट रहे दैत्य कालनेमि नाम के महान असुर की शरण में पहुँचे।
हे ब्रह्मन्! उन दैत्यों को अभय दान देकर और माधव (विष्णु) को अजेय (जिसे जीता न जा सके) जानते हुए भी, वह कालनेमि किसी उपेक्षित बीमारी की तरह (घमंड में) फूलने लगा। बलवान कालनेमि जिस भी देवता, यक्ष या किन्नर को हाथ से पकड़ लेता था, उसे उठाकर अपने फैले हुए मुँह में ढकेल देता था॥
वह दैत्यराज कालनेमि बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के था फिर भी दानवों के साथ मिलकर गुस्से में हाथ, पैर और नाखूनों के प्रहार से ही इंद्र, सूर्य और चंद्रमा के साथ देवसेना को तेज़ी से मारने लगा। वह आग के समान चक्रों से आकाश और पृथ्वी पर नीचे-ऊपर चारों ओर हमले करने लगा। उस समय उसका रूप प्रलय काल में पूरे जगत् को जलाकर भस्म करने वाली प्रलयाग्नि के जैसा था।
उस ताकतवर दुश्मन को बढ़ता देखकर देवता, गंधर्व, सिद्ध, साध्य, अश्विनीकुमार वगैरह डर के मारे घबराकर इधर-उधर भागने लगे। उछलते-कूदते हुए दैत्य बड़े घमंड के साथ देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले सुंदर मुकुटधारी भगवान विष्णु के सामने पहुँच गए और तरह-तरह के अस्त्र- शस्त्रों के वार से उनके यश को खत्म करने की कोशिश करने लगे—यानी विष्णु की हार मानने लगे।
इस तरह हमला कर रहे मय, बलि और कालनेमि आदि दैत्यों को देखकर विष्णु की आँखें गुस्से से लाल हो गईं। फिर तो उन्होंने अपनी एक नज़र से ही उनके रथों, हाथियों और घोड़ों को शक्तिहीन और बलहीन कर दिया। साथ ही, सुंदर पंखों वाले लोहे के बने आधे चाँद जैसे 'नाराच' बाणों से पहाड़ को इस तरह ढक दिया, जैसे काले बादल पहाड़ को ढक लेते हैं।विष्णु के हाथों से छूटे हुए कालदंड के समान अर्धचंद्राकार लोहे के बाणों से घिरे हुए बलि और मय आदि दैत्यों ने डरकर तुरंत सबसे पहले दैत्यपति सौ सिरों वाले कालनेमि को आगे भेजा। वह बेहद शक्तिशाली दानव सेनापति लोकनाथ केशव के सामने आ खड़ा हुआ।
हाथ में गदा उठाए हुए सौ सिर वाले पहाड़ की चोटी जैसे कालनेमि को देख कर विष्णु ने अपने शार्ङ्ग धनुष को छोड़ कर तुरंत हाथ में चक्र ले लिया। भगवान विष्णु को देखकर बहुत देर तक जोर-जोर से हँसते हुए, बिजली की कड़क जैसी आवाज़ में बोलने वाले उस कालनेमि दानव ने दैत्यरूपी पेड़ों को काटने वाले, सुख-दुख से बेपरवाह और दृढ़ मन वाले हरि से कहा—यही दानव सेना को डराने वाला दुश्मन, महाक्रोधी, मधु दैत्य का वध करने वाला, हिरण्याक्ष को मारने वाला और फूलों की पूजा से खुश होने वाला है! यह दुष्ट मेरी आँखों के सामने आकर अब कहाँ बचकर जा सकता है? यह कमलनयन अगर इस समय मेरे साथ युद्ध करेगा, तो अपने घर वापस नहीं लौट पाएगा। और तब देवता लोग मेरी मुट्ठी में पिसकर ढीले पड़े हुए अंगों वाले इस विष्णु को डर से कांपती आँखों से धूल में मिला हुआ देखेंगे।
मधुसूदन भगवान विष्णु से ऐसा कहकर गुस्से से अपने होंठ फड़काते हुए कालनेमि ने गरुड़ पर अपनी गदा इस तरह फेंकी, जैसे इंद्र पहाड़ पर वज्र फेंकते हैं। भगवान विष्णु ने दानव के हाथ से छूटी हुई उस भयंकर गदा को अपनी ओर आते देखा और चक्र से उसे वैसे ही काटकर नष्ट कर दिया, जैसे पुराने बुरे कर्म किसी अभागे इंसान के सपनों को तोड़ देते हैं।
गदा के टुकड़े करने के बाद भगवान विष्णु दानव के बिल्कुल करीब पहुँच गए और उन्होंने पलक झपकते ही उसकी मोटी-मोटी बाहुओं (भुजाओं) को काट दिया। भुजाएँ कट जाने पर कालनेमि जलकर कोयला हुए दूसरे पहाड़ जैसा दिखने लगा। इसके बाद लक्ष्मीपति माधव ने गुस्से में आकर चक्र से उसका सिर काटकर पके हुए ताड़ के फल की तरह ज़मीन पर गिरा दिया।
जंगल में बिना टहनियों और पत्तों के सूखे ताड़ के पेड़ जैसा, बिना हाथों और सिर वाला उसका धड़ (कबंध) अचल मेरु पर्वत की तरह खड़ा रहा। हे से मुने! जैसे महेंद्र ने वज्र से बिना हाथ और सिर वाले 'बल' नाम के असुर को ज़मीन पर पटक दिया था, ठीक उसी तरह पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड़ ने अपनी छाती से धक्का देकर उस धड़ को ज़मीन पर गिरा दिया।उस दानव सेनापति (कालनेमि) के मारे जाते ही बाणासुर के अलावा देवताओं से बुरी तरह पिटे हुए बाकी सभी दैत्य अपने हथियार, ढाल, पट्टा और कपड़े तक छोड़कर मैदान से भाग खड़े हुए॥
🙏🥺जय विष्णु भगवान की 🙏🥺
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