sn vyas
#श्री हरि #श्री हरि विष्णु
🙏।।श्रीहरिः।।🙏
‼️भगवान् से अपनापन‼️
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👩❤️👩हम अपनी तरफ से भगवान् को अपना मानते नहीं, पर भगवान् अपनी तरफ से हमें अपना मानते हैं । मानते ही नहीं, जानते भी हैं । बच्चा माँ को अपनी माँ मानता है, पर कभी- कभी अड़ जाता है कि तू मेरा कहना नहीं मानती तो मैं तेरा बेटा नहीं बनूँगा । माँ हँसती है; क्योंकि वह जानती है कि बेटा तो मेरा ही है । बच्चा समझता है कि माँ को मेरी गरज है, बेटा बनना माँ को निहाल करना है, इसलिये कहता है कि तेरा बेटा नहीं बनूँगा, तेरी गोद में नहीं आऊँगा । परन्तु बेटा नहीं बनने से हानि किसकी होगी ? माँ का क्या बिगड़ जायगा ? माँ तो बच्चे के बिना वर्षो से जीती रही है, पर बच्चे का निर्वाह माँ के बिना कठीन हो जायगा । बच्चा उलटे माँ पर अहसान करता है । ऐसे ही हम भी भगवान् पर अहसान कर सकते है !👩❤️👩
भगवान् के एक बड़े प्यारे भक्त थे, प वे रात-दिन भगवद्भजन में तल्लीन रहते थे । किसी ने उनके लिये एक लंबी टोपी बनायी । उस टोपी को पहनकर वे मस्त होकर कीर्तन कर रहे थे । कीर्तन करते-करते वे प्रेम में इतने मग्न हो गये कि भगवान् स्वयं आकर उनके पास बैठ गये और बोले कि भगतजी ! आज तो आपने बड़ी ऊँची टोपी लगायी ! वे बोले कि किसी के बाप की थोड़े ही है, मेरी है । भगवान् ने कहा कि मिजाज करते हो ? तो बोले कि माँग कर थोड़े ही लाये हैं मिजाज ? भगवान् ने पूछा कि मेरे को जानते हो ? वे बोले कि अच्छी तरह से जानता हूँ । भगवान् बोले कि यह टोपी बिक्री करते हो क्या ? वे बोले कि तुम्हारे पास देने को है ही क्या जो आये हो खरीदने के लिये ? त्रिलोकी ही तो है तुम्हारे पास, और देने को क्या है ? भगवान् बोले कि इतना मिजाज ! तो वे बोले कि किसी का उधार लाये हैं क्या ? भगवान् ने कहा कि देखो, मैं दुनिया से कह दूँगा कि ये भगत- वगत कुछ नहीं हैं तो दुनिया तुम्हारे को मानेगी नहीं । वे बोले कि अच्छा, आप भी कह दो, हम भी कह देंगे कि भगवान् कुछ नहीं हैं । आपकी प्रसिद्धि तो हम लोगों ने की है, नहीं तो आपको कौन जानता है ?
भगवान् ने हार मान ली !
माँ के हृदय में जितना प्रेम होता है उतना प्रेम बच्चों के हृदय में नहीं होता । ऐसे ही भगवान् के हृदय में अपार स्नेह है । अपने स्नेह को, प्रेम को वे रोक नहीं सकते और हार जाते हैं ! ‘और सबसों गये जीत, भगत से हारियों।।
कितनी विलक्षण बात है ! ऐसे भगवान् के हो जाओ । दूसरों के साथ हमारा सम्बन्ध केवल उनकी सेवा करने के लिये है । उनको अपना नहीं मानना है । अपना केवल भगवान् को मानना है । भगवान् की भी सेवा करनी है,
पर उनसे लेना कुछ नहीं है ।
नारायण नारायण नारायण