Mahendra Narayan
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मिले हार भी अपनों से तो अच्छी लगती है ।
मिले जीत जो अपने हारें कच्ची लगती है ॥
प्रीत का भूखा सबका मन होता है ऐसे ,
मिले प्रीत ग़र झूठी भी हो सच्ची लगती है ॥
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