sn vyas
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#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
*l l श्रीहरिः l l*
*“गीता जी की अलौकिक शिक्षायें”
⭐ *'मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा’—का भाव* (अध्याय 18/66)
*'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:’*—
* यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं, *उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान् ने दिया है।*
* परन्तु *यह मान्यता युक्तिसंगत नहीं है;* क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान् के शरण हो गये हैं, *तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं ३ और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये प्रलोभन देना बनता ही नहीं।*
* हाँ, पापोंसे मुक्त करनेका *प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है, शरणागत होनेके बाद नहीं।*
* 'मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा’— *इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों, वृत्तियों, आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ; भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता, अनधिकारिता, निर्बलता आदि मालूम होती है, तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो।*
* कारण कि जब तुम *मेरी अनन्य-शरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही? उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा? वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना, उसका सुधार करना मेरा काम रहा।*
* तुम्हारा तो बस, *एक ही काम है; वह काम है—निर्भय, नि:शोक, निश्चिन्त और नि:शंक होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना ४!*
* परन्तु अगर *तेरेमें भय, चिन्ता, वहम आदि दोष आ जायँगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायँगे और सब भार तेरेपर आ जायगा।*
* *शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलंक है।*
३ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।। (मानस ५।४४।१)
४ काहू के बल भजन की, काहू के आचार । 'व्यास' भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार ।।
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