sn vyas
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भक्ति में भगवान को पाना नहीं, स्वयं को खो देना होता है
मनुष्य सामान्यतः यह सोचता है कि भक्ति का उद्देश्य भगवान को प्राप्त करना है। परन्तु जब शास्त्रों और संतों की वाणी को ध्यान से पढ़ा जाता है, तब ज्ञात होता है कि भगवान कहीं दूर नहीं हैं जिन्हें जाकर प्राप्त करना पड़े। वे तो प्रत्येक जीव के हृदय में साक्षी रूप से सदैव विद्यमान हैं। बदलने की आवश्यकता भगवान को नहीं, हमारे अन्तःकरण को है।
समस्या यह नहीं कि भगवान हमसे दूर हैं; समस्या यह है कि हमारा मन अपने ही अहंकार, इच्छाओं और अपेक्षाओं के शोर में इतना उलझा हुआ है कि भगवान की मौन उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाता।
इसी कारण भक्ति का वास्तविक प्रयत्न भगवान को बुलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर की उन परतों को हटाना है जो उनके अनुभव में बाधा बनती हैं। जैसे धूल से ढका दर्पण चेहरा नहीं दिखा पाता, वैसे ही कामना, क्रोध, लोभ और अहंकार से ढका हृदय भगवान के सान्निध्य का अनुभव नहीं कर पाता।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो... (गीता 15.15)
अर्थात् "मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ।"
यदि भगवान पहले से ही हृदय में स्थित हैं, तो फिर भक्ति किसलिए?
उत्तर यह है कि भक्ति भगवान को हमारे पास नहीं लाती; भक्ति हमें भगवान के निकट ले आती है। दूरी स्थान की नहीं, चेतना की होती है।
गौड़ीय वैष्णव आचार्य कहते हैं कि शुद्ध भक्ति का अर्थ है—भगवान से कुछ लेने की इच्छा नहीं, बल्कि स्वयं को उनके चरणों में समर्पित कर देना। जब "मैं" और "मेरा" का आग्रह कम होने लगता है, तब "तुम" और "तुम्हारा" का अनुभव प्रकट होने लगता है। यही आत्मसमर्पण भक्ति का हृदय है।
जिस प्रकार नदी समुद्र तक पहुँचकर अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उसी में मिलकर अपनी पूर्णता पाती है, उसी प्रकार जीव भी भगवान में अपने प्रेमपूर्ण समर्पण द्वारा वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है। यह नष्ट होना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करना है।
भक्ति का चरम यही है कि जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं प्रेम प्रारम्भ होता है। और जहाँ प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट होता है, वहीं भगवान का अनुभव सहज, स्वाभाविक और शाश्वत बन जाता है।
#भक्ति #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #👉 लोगों के लिए सीख👈
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