sn vyas
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#भक्ति
सच्ची भक्ति स्थायी होती है: सांसारिक सुख थोड़े समय के लिए होते हैं, लेकिन ईश्वर की भक्ति का आनंद कभी खत्म नहीं होता।
जो जन भीगे राम रस, विगत कबहूँ ना होय।
अनुभव भाव न दरसते, ना दुःख ना सुख कोय॥
अर्थ: जो व्यक्ति ईश्वर (राम) की भक्ति के रस में पूरी तरह भीग जाता है, वह उस आनंद से फिर कभी अलग या दूर (विगत/विलग) नहीं होता। आत्म-अनुभव की उस परम अवस्था में पहुँचने के बाद व्यक्ति सांसारिक मोह-माया, सुख और दुःख जैसी भावनाओं से ऊपर उठ जाता है। उसे न तो संसार का सुख विचलित करता है और न ही दुःख परेशान करता है।
भाव: भक्ति की पराकाष्ठा: 'राम रस' में भीगने का मतलब केवल पूजा-पाठ करना नहीं है। इसका अर्थ है ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह लीन हो जाना। जैसे पानी में नमक घुलने के बाद उसे अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही सच्चा भक्त ईश्वर से कभी अलग नहीं होता।
द्वंद्व से मुक्ति: संसार का नियम है कि यहाँ सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता रहता है। आम इंसान इसी चक्र में फंसा रहता है। लेकिन जब व्यक्ति को आत्मज्ञान (अनुभव भाव) होता है, तो वह समझ जाता है कि सुख और दुःख दोनों ही परछाई की तरह झूठे और अस्थायी हैं। वह इन दोनों स्थितियों में एक समान (शांत) रहना सीख जाता है।
सच्ची भक्ति स्थायी होती है: सांसारिक सुख थोड़े समय के लिए होते हैं, लेकिन ईश्वर की भक्ति का आनंद कभी खत्म नहीं होता।
🙏🌹🌻!!जय श्री राम!!🌻🌹🙏
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