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#Qur'an and Science #*આપણે વિચારીશું ખરા?* #points to ponder #सोचने वाली बात
Qur'an and Science - पुनरुत्थान (Resurrection) का अवधारणा पर बात पर कि मृत्यु लोगों को संदेह था, विशेषकर इस के बाद जब शरीर मिट्टी में मिल जाता है, तो उसे दोबारा कैसे जीवित किया जाएगा| क़ुरआन इस संदेह का उत्तर एक अत्यंत सूक्ष्म अंग - उंगलियों के पोर (Fingertips)-का उल्लेख करके देता है। क़ुरआन ७५:३-4 में अल्लाह फ़रमाता हैः इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों "ಖ1 को दोबारा इकट्ठा नहीं कर सकते? क्यों नहीं ! हम तो उसकी उंगलियों के पोर तक को पहले की तरह ठीकनठीक बना देने पर पूरी तरह सक्षम हैं।" (सूरह अल-क़ियामह ७५:३-४) ६१० ईस्वी में जब यह आयत नाज़िल हुई, उस समय किसी को भी उंगलियों के पोरों (Fingerprints) की वैज्ञानिक महत्ता का ज्ञान नहीं था। लेकिन १८९२ ईस्वी में , यानी लगभग १,२८२ वर्ष बाद, सर फ्रांसिस Re गैल्टन ने अपनी शोध के माध्यम से यह किया : # గౌ व्यक्ति के फिंगरप्रिंट (उंगलियों के इतिहास निशान) अद्वितीय (Unique) होते हैं।यहाँ तक कि एक जैसे डीएनए वाले (Identical Twins) जुड़वाँ के फिंगरप्रिंट भी एक समान नहीं होते। गर्भ में लगभग १०वें सप्ताह से फिंगरप्रिंट बनना शुरू हो जाते हैं और पूरी ज़िंदगी नहीं बदलते। फिंगरप्रिंट मानव पहचान का सबसे सटीक साधन माने जाते हैं और कई परिस्थितियों में डीएनए से भी अधिक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं ।इसलिए, शरीर के असंख्य अंगों में से उंगलियों के पोरों का विशेष रूप से उल्लेख करना -जो प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट पहचान का प्रतीक हैं - ऐसी बात है जिसका वैज्ञानिक ज्ञान उस समय उपलब्ध नहीं था। यही कारण है कि बहुत से लोग इसे क़ुरआन की उल्लेखनीय बातों में से एक मानते हैं। 09.46 01 पुनरुत्थान (Resurrection) का अवधारणा पर बात पर कि मृत्यु लोगों को संदेह था, विशेषकर इस के बाद जब शरीर मिट्टी में मिल जाता है, तो उसे दोबारा कैसे जीवित किया जाएगा| क़ुरआन इस संदेह का उत्तर एक अत्यंत सूक्ष्म अंग - उंगलियों के पोर (Fingertips)-का उल्लेख करके देता है। क़ुरआन ७५:३-4 में अल्लाह फ़रमाता हैः इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियों "ಖ1 को दोबारा इकट्ठा नहीं कर सकते? क्यों नहीं ! हम तो उसकी उंगलियों के पोर तक को पहले की तरह ठीकनठीक बना देने पर पूरी तरह सक्षम हैं।" (सूरह अल-क़ियामह ७५:३-४) ६१० ईस्वी में जब यह आयत नाज़िल हुई, उस समय किसी को भी उंगलियों के पोरों (Fingerprints) की वैज्ञानिक महत्ता का ज्ञान नहीं था। लेकिन १८९२ ईस्वी में , यानी लगभग १,२८२ वर्ष बाद, सर फ्रांसिस Re गैल्टन ने अपनी शोध के माध्यम से यह किया : # గౌ व्यक्ति के फिंगरप्रिंट (उंगलियों के इतिहास निशान) अद्वितीय (Unique) होते हैं।यहाँ तक कि एक जैसे डीएनए वाले (Identical Twins) जुड़वाँ के फिंगरप्रिंट भी एक समान नहीं होते। गर्भ में लगभग १०वें सप्ताह से फिंगरप्रिंट बनना शुरू हो जाते हैं और पूरी ज़िंदगी नहीं बदलते। फिंगरप्रिंट मानव पहचान का सबसे सटीक साधन माने जाते हैं और कई परिस्थितियों में डीएनए से भी अधिक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं ।इसलिए, शरीर के असंख्य अंगों में से उंगलियों के पोरों का विशेष रूप से उल्लेख करना -जो प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट पहचान का प्रतीक हैं - ऐसी बात है जिसका वैज्ञानिक ज्ञान उस समय उपलब्ध नहीं था। यही कारण है कि बहुत से लोग इसे क़ुरआन की उल्लेखनीय बातों में से एक मानते हैं। 09.46 01 - ShareChat