sn vyas
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#🔱बम बम भोले🙏
जब भगवान शिव प्रसन्न होते हैं…
भगवान शिव केवल वरदानों के दाता ही नहीं, बल्कि वे भक्ति के परम आचार्य भी हैं। उनका हृदय अपने आराध्य भगवान श्रीराम के चरणों में निरंतर अनुरक्त रहता है। इसलिए जब वे किसी भक्त पर कृपा करते हैं, तो उसे केवल सांसारिक सुख-संपत्ति नहीं देते, बल्कि उससे कहीं अधिक दुर्लभ निधि—भगवद्भक्ति—प्रदान करते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में भगवान शिव के मुख से कहलवाया है—
सोइ मम इष्टदेव रघुवीरा।
सेवत जाहि सदा मुनिधीरा॥
वही श्रीरघुवीर मेरे आराध्य देव हैं, जिनकी सेवा महान ऋषि-मुनि निरंतर करते हैं।
इसी प्रकार वे स्पष्ट कहते हैं—
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि।
भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥
जो मनुष्य छल-कपट छोड़कर निष्काम भाव से भगवान शिव की सेवा करता है, भगवान शंकर उसे श्रीराम की भक्ति प्रदान करते हैं।
यही भगवान शिव की सबसे बड़ी कृपा है। वे जानते हैं कि संसार के समस्त वैभव, पद, प्रतिष्ठा और सिद्धियाँ क्षणभंगुर हैं; किन्तु श्रीराम के चरणों की भक्ति जीव को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर देती है। अतः शिव की प्रसन्नता का प्रथम और सर्वोत्तम फल है—श्रीराम-भक्ति।
परंतु जब भगवान आशुतोष किसी भक्त पर अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं, तब वे उसे और भी दुर्लभ, परम गोपनीय तथा दिव्य रत्न प्रदान करते हैं—परब्रह्म श्रीकृष्ण के चरणों की प्रेम-भक्ति।
श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान शिव स्वयं कहते हैं—
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्।
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम्॥
हे देवि! सभी प्रकार की आराधनाओं में भगवान विष्णु की आराधना सर्वोत्तम है, और उससे भी श्रेष्ठ उनके भक्तों की सेवा है।
श्रीकृष्ण स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं—
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
केवल भक्ति के द्वारा ही मुझे तत्त्व से जाना जा सकता है, और तब भक्त मेरे परम धाम को प्राप्त होता है।
श्रीमद्भागवत में भी भगवान की प्रेमभक्ति का सर्वोच्च महत्व बताया गया है—
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
मनुष्यों का परम धर्म वही है जिससे भगवान के प्रति निष्काम, निरंतर और अहैतुकी भक्ति उत्पन्न हो।
इस प्रकार भगवान शिव अपने भक्त को धीरे-धीरे उस सर्वोच्च आध्यात्मिक शिखर तक पहुँचाते हैं जहाँ केवल भगवान के प्रति निष्कलुष प्रेम ही शेष रह जाता है। वे स्वयं वैष्णवों में श्रेष्ठ हैं—
वैष्णवानां यथा शम्भुः
अर्थात् वैष्णवों में भगवान शम्भु सर्वोपरि हैं। अतः जो शिव की शरण में आता है, वह अंततः भगवान के चरणों तक ही पहुँचाया जाता है।
अतः कहा जा सकता है कि—
भगवान शिव जब प्रसन्न होते हैं, तब वे अपने भक्त को श्रीराम के चरणों की अमूल्य भक्ति प्रदान करते हैं; और जब वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं, तब वे उस भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम, निष्कलुष और परम प्रेममयी भक्ति का दिव्य दीप प्रज्वलित कर देते हैं।
यही शिव-कृपा का सर्वोच्च स्वरूप है—जहाँ भक्त की सारी कामनाएँ समाप्त होकर केवल एक ही अभिलाषा शेष रह जाती है—
"हे प्रभो! जन्म-जन्मांतर तक आपके चरणों में अचल प्रेम और अखंड भक्ति बनी रहे।"
~श्री कृष्ण ~ #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏
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