sn vyas
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गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर समस्त गुरुजनों एवं अपने पूज्य सद्गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
सनातन संस्कृति में यदि किसी संबंध को ईश्वर से भी अधिक गौरव प्राप्त है, तो वह है गुरु और शिष्य का संबंध। माता हमें जन्म देती हैं, पिता हमारा पालन-पोषण करते हैं, किन्तु गुरु हमें दूसरा जन्म देते हैं—ज्ञान का जन्म, विवेक का जन्म और आत्मबोध का जन्म। इसलिए हमारे ऋषियों ने गुरु को केवल ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान ही नहीं माना, बल्कि साक्षात् परब्रह्म की उपाधि प्रदान की है।
शास्त्र उद्घोष करते हैं-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा हैं, जो ज्ञान की सृष्टि करते हैं; गुरु ही विष्णु हैं, जो उस ज्ञान का पालन और पोषण करते हैं; गुरु ही महेश्वर हैं, जो अज्ञान, अहंकार और मोह का संहार करते हैं; और गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, जो जीव को परमात्मा का साक्षात्कार कराते हैं। ऐसे श्रीगुरुदेव को बार-बार प्रणाम है।
यह केवल श्रद्धा का भाव नहीं, बल्कि गहन व्याकरणिक और दार्शनिक सत्य भी है। पाणिनीय व्याकरण में 'गुरु' शब्द की व्युत्पत्ति 'गृ' धातु से मानी गई है, जिसके विविध अर्थ गुरु के दिव्य स्वरूप का रहस्य उद्घाटित करते हैं।
'गृ शब्दे' धातु के अनुसार गुरु वह हैं जो धर्म, ज्ञान और सत्य का उपदेश देकर शिष्य के भीतर ज्ञान की सृष्टि करते हैं। जिस प्रकार ब्रह्माजी ने इस सृष्टि की रचना की, उसी प्रकार गुरु हमारे भीतर विवेक, संस्कार और सद्बुद्धि का निर्माण करते हैं। इसलिए गुरु ब्रह्मा स्वरूप हैं।
'गृ सेचने' धातु बताती है कि गुरु ज्ञानरूपी अमृत से शिष्य के हृदय को सींचते हैं। बीज में वृक्ष बनने की क्षमता तो होती है, परंतु जल के बिना वह अंकुरित नहीं हो सकता। उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता का बीज विद्यमान है, किन्तु गुरु की कृपा और उपदेश के बिना वह विकसित नहीं हो सकता। इसलिए गुरु विष्णु स्वरूप हैं, जो जीवन का पालन करते हैं।
'गृ निगरणे' धातु के अनुसार गुरु हमारे भीतर के अज्ञान, अहंकार, मोह और कुसंस्कारों का नाश करते हैं। भगवान शिव जिस प्रकार संहार करके सृष्टि का कल्याण करते हैं, उसी प्रकार गुरु हमारे दोषों का संहार करके आत्मा को निर्मल बनाते हैं। इसलिए गुरु महेश्वर स्वरूप हैं।
'गृ विज्ञाने' धातु के अनुसार गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराते हैं। वे बताते हैं कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि परमात्मा के अंश हैं। यही ब्रह्मज्ञान है। इसलिए गुरु साक्षात् परब्रह्म कहे गए हैं।
'गुर् उद्यमने' धातु के अनुसार गुरु वह हैं जो शिष्य को सत्पथ पर अग्रसर करते हैं। जब जीवन में मोह, भ्रम, निराशा और असमंजस छा जाता है, तब गुरु ही दीपक बनकर मार्ग प्रकाशित करते हैं।
सनातन धर्म का प्रत्येक महापुरुष गुरु की महिमा का जीवंत प्रमाण है। भगवान श्रीराम स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी गुरु वशिष्ठ के सान्निध्य में शिक्षित हुए और महर्षि विश्वामित्र के साथ वनगमन कर शस्त्र एवं शास्त्र दोनों की दिव्य शिक्षा प्राप्त की। यदि भगवान श्रीराम भी गुरु के बिना पूर्ण नहीं हुए, तो हम सामान्य मनुष्यों के लिए गुरु की आवश्यकता कितनी अधिक है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के प्रारंभ में ही गुरु वंदना करते हुए लिखते हैं-
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर॥
अर्थात् मैं उन गुरु के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के सागर हैं और मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हैं। उनके वचन सूर्य की किरणों के समान हैं, जो मोह रूपी अंधकार का नाश कर देते हैं।
संत कबीरदास जी भी गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं-
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो मिलाय॥
अर्थात् यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु की कृपा से ही भगवान का साक्षात्कार संभव होता है।
आज का युग सूचना का है, किन्तु ज्ञान का नहीं। हमारे हाथों में मोबाइल है, परंतु मन अशांत है। हमारे पास साधन हैं, परंतु सही साध्य का ज्ञान नहीं। ऐसे समय में गुरु की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। गुरु केवल पुस्तकें नहीं पढ़ाते, वे जीवन पढ़ना सिखाते हैं। वे केवल सफलता नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करते हैं। वे केवल बुद्धि को नहीं, आत्मा को जागृत करते हैं।
गुरु पूर्णिमा केवल पुष्प अर्पित करने का पर्व नहीं है। यह आत्ममंथन का दिवस है। आज हमें स्वयं से पूछना चाहिए-क्या हम अपने गुरु के बताए मार्ग पर चल रहे हैं? क्या हमने उनके उपदेशों को केवल सुना है या जीवन में उतारा भी है? सच्ची गुरु-दक्षिणा धन, वस्त्र या उपहार नहीं है; सच्ची गुरु-दक्षिणा है-गुरु के वचनों को अपने जीवन का आचरण बना लेना।
आइए, इस पावन गुरु पूर्णिमा पर हम अपने माता-पिता, शिक्षकों, आध्यात्मिक गुरुजनों तथा उन सभी महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को दिशा दी। गुरु के प्रति श्रद्धा ही ज्ञान का द्वार खोलती है और ज्ञान ही मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि सद्गुरु की कृपा हम सभी पर बनी रहे, हमारे जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर हो, विवेक का प्रकाश फैले और हम धर्म, सत्य एवं मर्यादा के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहें।
समस्त सनातन धर्मावलंबियों को गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
🚩 श्री गुरुदेव के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।
🚩 जय श्रीराम। 🚩
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🌞🚩🚩 ll जय श्री राम ll 🚩🚩🌞
🌞🚩🚩 ll जय बजरंग बली ll 🚩🚩🌞
🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀
#🙏गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं 🌺🪔 #🪔आषाढ़ पूर्णिमा 🌺⭐ #व्यास पूर्णिमा #🙏गुरु महिमा😇 #🙏आध्यात्मिक गुरु🙏
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