sn vyas
630 views 1 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा सतयुग में एक महापराक्रमी राजा हुए, जिनका पृथ्वी के सातो द्वीपों पर एकछत्र राज्य था। उनका नाम था अम्बरीष। राजा अम्बरीष प्रजावत्सल तो थे ही, भगवान विष्णु के परम भक्त भी थे। भागवत पुराण में राजा अम्बरीष की निर्मल भक्ति का बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। एक बार राजा अम्बरीष ने सपत्नीक एकादशी का ब्रत रखा। द्वादशी लगने पर वह व्रत का पारण करने जा ही रहे थे कि ठीक उसी समय वहां ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ। अब ब्राह्मण अतिथि सामने हो तो उसे भोजन को पूछे बिना पारण करना उचित नहीं माना जाता। सो राजा ने भी ऋषि दुर्वासा से भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ने कहा ठीक है, पर मैं अभी यमुना स्नान करके आता हूं। उस दिन द्वादशी थी, अर्थात एकादशी का पारण और समस्या ऐसी थी कि इंतजार में थोड़ी ही देर में अर्थात जल्द ही त्रयोदशी लगने को हो आयी। पारण द्वादशी में ही करना होता है प्रदोष लगने से पहले। दुर्वासा ऋषि फिर भी लेट हो रहे थे। अब अम्बरीष जी ने अपने पुरोहित जी से पूछा कि, प्रभु ये बताएं कि दरवाजे पर कोई अतिथि आया हो, तो हम बिना उन्हें भोजन करवाए स्वयं पारण कैसे कर सकते हैं। और ना करें, तो मुहूर्त निकला जा रहा है, ऐसे में हम करें तो क्या करें। पुरोहित जी ने कहा, राजन! अगर आप ठाकुर जी का चरणोदक ग्रहण कर लेंगे, तो आतिथ्य का अपमान भी नहीं होगा और आपकी पारण की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी। राजा अम्बरीष ने वैसा ही किया, लेकिन दुर्वासा जी जब आए तो भड़क गए और गुस्से से जलते हुए कहा कि, राजन तुझे इसका दण्ड मिलेगा, और अपनी जटाओं से एक बाल उखाड़कर पृथ्वी पर पटक दिया। उससे एक भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और अग्नि कि ज्वाला के सामान धधकती हुई, जलाकर भस्म कर देने के लिए राजा अम्बरीष की ओर बढ़ी। लेकिन अम्बरीष इतने बड़े भगवान के भक्त थे, कि उनकी रक्षा के लिए भगवान ने स्वयं अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। अब कृत्या जैसे ही आगे बढ़ी, राजा घबराए नहीं, अपने स्थान पर खड़े रहे। लेकिन सुदर्शन महाराज ने काम करना शुरू किया और कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया। कृत्या को जलाने के बाद चक्र महाराज चुप नहीं बैठे, दुर्वासा जी की ओर लपके। अब दुर्वासा घबराए, लगे भागने। आगे आगे दुर्वासा जी, पीछे पीछे सुदर्शन चक्र। दुर्वासा इन्द्रादि सभी समर्थ यजमानों के पास गए, लेकिन सबने कहा, महाराज यहाँ से आप जाइए, वरना ये सुदर्शन महाराज हमें भी नहीं छोड़ेंगे। फिर शिव जी और ब्रह्मा जी के पास गये, सबने हाथ खड़े कर दिए। उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। अंत में भगवान नारायण की शरण में पहुंचे दुर्वासा जी और अपने बचाव की गुहार लगाई। भगवान ने कहा, दुर्वासा मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है। अब तुम्हें तो अम्बरीष ही बचा सकते हैं, उन्हीं के पास जाओ। अंत में दुर्वासा अम्बरीष के पास पहुचे और क्षमा याचना की। दयालु अम्बरीष ने सुदर्शन की स्तुति की तब वह शांत हुए। दुर्वासा की जान बची। 🙏🙏
15 shares

More like this