#संकट चतुर्थी #🙏🏻 संकट चतुर्थी स्पेशल 🙏🏻
विभुवन संकष्टी चतुर्थी 03 जून विशेष
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हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार अधिक मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी को विभुवन संकष्टी के रूप में मनाया जाता है। अधिक मास में आने के कारण विभुवन संकष्टी को अत्यन्त दुर्लभ माना जाता है क्योंकि यह प्रत्येक ढाई वर्ष के उपरान्त आती है। विभुवन संकष्टी किसी भी चन्द्र माह में पड़ सकती है अतः इसके लिये कोई निश्चित माह निर्धारित नहीं है। किन्तु माह के परिवर्तित होने से इसके नाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः किसी भी माह में अधिक मास पड़ने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विभुवन संकष्टी के रूप में ही मनाया जाता है।
इस दिन भगवान गणपति के विभुवन गणेश रूप की आराधना की जाती है। विभुवन का अर्थ 'तीनों लोकों में विद्यमान' अथवा 'तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले' होता है। अतः विभुवन गणेश कर अभिप्राय है, तीनों लोकों में विद्यमान रहने वाले भगवान गणेश।
विभुवन संकष्टी के दिन व्रत एवं पूजन का विधान अन्य संकष्टी व्रतों के समान ही है, किन्तु इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश को नारियल के लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। अधिक मास होने के कारण इस दिन किये गये जप, तप, पूजन तथा व्रत आदि का सामान्य संकष्टी के व्रत की तुलना में अनेक गुणा फल प्राप्त होता है। यह उत्तम व्रत सभी मनोरथ पूर्ण करने तथा समस्त कष्टों का निवारण करने वाला है।
षोडशोपचार पूजा विधि
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इस व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय काल से ही करनी चाहिए। सूर्यास्त से पहले ही गणेश विनायक चतुर्थी व्रत कथा-पूजा होती है। गणेश जी को दूर्वा तथा लड्डू अत्यंत प्रिय है अत: गणेश जी पूजा में दूर्वा और लड्डू जरूर चढ़ाना चाहिए साथ मे गुड़, गन्ने और मूली का उपयोग भी करना चाहिए। इस दिन मूली भूलकर भी नहीं खानी चाहिए कहा जाता है कि मूली खाने धन -धान्य की हानि होती है। इस व्रत में चंद्रोदय के समय चन्द्रमा को गुड़ आदि का अर्घ्य देना चाहिए। साथ ही संकटहारी गणेश एवं चतुर्थी माता को गुड़, मूली आदि से अर्घ्य देना चाहिए।
अर्घ्य देने के उपरांत ही व्रत समाप्त करना चाहिए। इस दिन निर्जला व्रत का भी विधान है माताएं निर्जला व्रत अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए अवश्य ही करती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए।
पूजन सामग्री👉 (वृहद् पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,दूध,दही,शहद,घी,चीनी,पंचामृत,वस्त्र,जनेऊ,मधुपर्क,सुगंध,लाल चन्दन,रोली,सिन्दूर,अक्षत(चावल),फूल,माला,बेलपत्र,दूब,शमीपत्र,गुलाल,आभूषण,सुगन्धित तेल,धूपबत्ती,दीपक,प्रसाद,फल,गंगाजल,पान,सुपारी,रूई,कपूर।
विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें -और आवाहन करें -
गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं |
उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम ||
आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव |
यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव ||
और अब प्रतिष्ठा (प्राण प्रतिष्ठा) करें -
अस्यैप्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च |
अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहती च कश्चन ||
आसन-रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यंकर शुभम |
आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः ||
पाद्य (पैर धुलना)
उष्णोदकं निर्मलं च सर्व सौगंध्य संयुत्तम |
पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगह्यताम ||
अर्घ्य(हाथ धुलना )-
अर्घ्य गृहाण देवेश गंध पुष्पाक्षतै :|
करुणाम कुरु में देव गृहणार्ध्य नमोस्तुते ||
आचमन
सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलं |
आचम्यताम मया दत्तं गृहीत्वा परमेश्वरः ||
स्नान
गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदाजलै:|
स्नापितोSसी मया देव तथा शांति कुरुश्वमे ||
दूध् से स्नान
कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम |
पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थं समर्पितं ||
दही से स्नान
पयस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शक्तिप्रभं |
दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यतां ||
घी से स्नान
नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकं |
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शहद से स्नान
तरु पुष्प समुदभूतं सुस्वादु मधुरं मधुः |
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शर्करा (चीनी) से स्नान
इक्षुसार समुदभूता शंकरा पुष्टिकार्कम |
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
पंचामृत से स्नान
पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतं |
पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शुध्दोदक (शुद्ध जल ) से स्नान
मंदाकिन्यास्त यध्दारि सर्वपापहरं शुभम |
तदिधं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
वस्त्र
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे |
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यतां ||
उपवस्त्र (कपडे का टुकड़ा )
सुजातो ज्योतिषा सह्शर्म वरुथमासदत्सव : |
वासोअस्तेविश्वरूपवं संव्ययस्वविभावसो ||
यज्ञोपवीत
नवभिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुण देवतामयम |
उपवीतं मया दत्तं गृहाणं परमेश्वर : ||
मधुपर्क
कस्य कन्स्येनपिहितो दधिमध्वा ज्यसन्युतः |
मधुपर्को मयानीतः पूजार्थ् प्रतिगृह्यतां ||
गन्ध
श्रीखण्डचन्दनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम |
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतां ||
रक्त(लाल )चन्दन
रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसमुदभवम |
मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुम ||
रोली
कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम |
कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वर्: ||
सिन्दूर
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ||
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यतां ||
अक्षत
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठं कुम्कुमाक्तः सुशोभितः |
माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः ||
पुष्प
पुष्पैर्नांनाविधेर्दिव्यै: कुमुदैरथ चम्पकै: |
पूजार्थ नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां ||
पुष्प माला
माल्यादीनि सुगन्धिनी मालत्यादीनि वै प्रभो |
मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर: ||
बेल का पत्र
त्रिशाखैर्विल्वपत्रैश्च अच्छिद्रै: कोमलै :शुभै : |
तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर : ||
दूर्वा
त्वं दूर्वेSमृतजन्मानि वन्दितासि सुरैरपि |
सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरो भव ||
दूर्वाकर
दूर्वाकुरान सुहरिता नमृतान मंगलप्रदाम |
आनीतांस्तव पूजार्थ गृहाण गणनायक:||
शमीपत्र
शमी शमय ये पापं शमी लाहित कष्टका |
धारिण्यर्जुनवाणानां रामस्य प्रियवादिनी ||
अबीर गुलाल
अबीरं च गुलालं च चोवा चन्दन्मेव च |
अबीरेणर्चितो देव क्षत: शान्ति प्रयच्छमे ||
आभूषण
अलंकारान्महा दव्यान्नानारत्न विनिर्मितान |
गृहाण देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर: ||
सुगंध तेल
चम्पकाशोक वकु ल मालती मीगरादिभि: |
वासितं स्निग्धता हेतु तेलं चारु प्रगृह्यतां ||
धूप
वनस्पतिरसोदभूतो गन्धढयो गंध उत्तम : |
आघ्रेय सर्वदेवानां धूपोSयं प्रतिगृह्यतां ||
दीप
आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिन्ना योजितं मया |
दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम ||
नैवेद्य
शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमम |
उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यतां ||
मध्येपानीय
अतितृप्तिकरं तोयं सुगन्धि च पिबेच्छ्या |
त्वयि तृप्ते जगतृप्तं नित्यतृप्ते महात्मनि ||
ऋतुफल
नारिकेलफलं जम्बूफलं नारंगमुत्तमम |
कुष्माण्डं पुरतो भक्त्या कल्पितं
प्रतिगृह्यतां ||
आचमन
गंगाजलं समानीतां सुवर्णकलशे स्थितन |
आचमम्यतां सुरश्रेष्ठ शुद्धमाचनीयकम ||
अखंड ऋतुफल
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव |
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ||
ताम्बूल पूंगीफलं
पूंगीफलम महद्दिश्यं नागवल्लीदलैर्युतम |
एलादि चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यतां ||
दक्षिणा(दान)
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो: |
अनन्तपुण्यफलदमत : शान्ति प्रयच्छ मे ||
आरती
चंद्रादित्यो च धरणी विद्युद्ग्निंस्तर्थव च |
त्वमेव सर्वज्योतीष आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम ||
पुष्पांजलि
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोदभवानि च |
पुष्पांजलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर: ||
प्रार्थना
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक:
भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात ||
अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम कहकर प्रणाम कर आरती के लिए खड़े हो जाये।
श्री गणेश जी की आरती
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जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा |
माता जाकी पारवती,पिता महादेवा ||
एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी |
मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय ...
अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया |
बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय ...
हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा |
लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय ...
दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी |
कामना को पूरा करो जग बलिहारी || जय ...
विभुवन संकष्टी चतुर्थी की कथा
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एक बार भगवान् शिव तथा पार्वतीजी चौपड़ खेल रहे थे। पार्वती ने खेल ही खेल में भगवान् शिव की सारी वस्तुएँ जीत ली। शिवजी ने जीती हुई वस्तुओं में से केवल गजचर्म वापस माँगा, पर पार्वती ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।
क्रुद्ध होकर महादेवजी ने कहा “अब मैं उनतीस दिन तक तुमसे बोलूँगा नहीं।” यह कहकर महादेव अन्यत्र चले गये। पार्वतीजी भी उन्हें ढूँढ़ती-ढूँढ़ती एक घनघोर वन में जा पहुँची। उन्होंने वहाँ कुछ स्त्रियों को व्रत का पूजन करते देखा। वे स्त्रियाँ विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर रही थी। पार्वतीजी ने भी उन्हीं स्त्रियों के अनुसार वह व्रत करना आरम्भ किया। उन्होंने अभी एक ही दिन व्रत किया था कि शिवजी उसी स्थान पर प्रकट हो गये।
शिवजी ने पार्वतीजी से पूछा : ‘तुमने ऐसा क्या विलक्षण उपाय किया है जिससे मुझसे तुम्हारे प्रति उदासीन का निश्चय भंग हो गया।’ तब पार्वती ने विभुवन संकष्टी चतुर्थी का विधान शिवजी को बता दिया। पुनः शिवजी ने विष्णु, विष्णु ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने इंद्र को तथा इन्द्र ने राजा विक्रमादित्य को यह व्रत बताया। राजा विक्रमादित्य ने इसका वर्णन अपनी रानी से किया। रानी ने राजा की बात पर विश्वास तो किया नहीं, उलटे निंदा की। इस कारण उसे कोढ़ हो गया। राजा ने तत्काल रानी को कहीं अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया ताकि उनका राज्य इस भयंकर रोग से बच जाए।
रानी ने महल छोड़ दिया। वह ऋषियों के आश्रम में जाकर उनकी सेवा करने लगी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर मुनियों ने बताया कि तुमने गणेश जी का अपमान किया है, इसलिए जबतक तुम गणेशजी का पूजन-व्रत नहीं करोगी, स्वस्थ नहीं हो पाओगी। उसने गणेश पूजन व्रत आरम्भ किया। एक मास पूरा होते ही रानी स्वस्थ हो गयी। रानी वहीं आश्रम में रहने लगी।
एक बार पार्वती नंदी पर सवार होकर शिवजी के साथ उस वन से गुजरी। मार्ग में एक दुःखी ब्राह्मण को देखकर पार्वतीजी ने पूछा : ‘हे ब्राह्मण! तुम किसलिए इतना विलाप कर रहे हो।’ ब्राह्मण ने उत्तर दिया- ‘यह सब दरिद्रता की ही कृपा का फल है।’ दयालु पार्वती ने ब्राह्मण को भी विक्रमादित्य के राज्य में चले जाने का आदेश दिया। ‘वहाँ एक वैश्य से पूजन की सामग्री लेकर व्रत पूजन करो। तुम्हारी दरिद्रता नष्ट हो जाएगी और तुम राज्यमंत्री बन जाओगे।” ब्राह्मण ने वैसा ही किया। ब्राह्मण राजमंत्री बन गया।
एक दिन राजा विक्रमादित्य उस ऋषि आश्रम में आ पहुँचे, जहाँ उसकी रानी रहती थी। रानी को स्वस्थ तथा निरोग देखकर उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे रानी को लेकर महलों में चले गये। राजा और रानी जीवनभर सभी सुखों का भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को प्राप्त किया।
अन्य प्रचलित कथा
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प्राचीन काल में राजा चंद्रसेन एक प्रतापी राजा थे और उनकी पत्नी का नाम रत्नावली था। राजा सब प्रकार से सुखी थे, लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। इस दुख के निवारण के लिए वे अपनी पत्नी के साथ वन में तपस्या करने निकल गए।अनजाने में वे महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंच गए। उन्होंने महर्षि को प्रणाम करके अपनी व्यथा बताई। तब महर्षि मार्कण्डेय ने उन्हें बताया कि राजा अपने पूर्व जन्म में भी एक राजा थे। एक बार शिकार के दौरान, उन्होंने वन में नागकन्याओं को लाल वस्त्र पहनकर 'विभुवन संकष्टी चतुर्थी' (अधिक मास वाली चतुर्थी) का व्रत और पूजा करते देखा था。नागकन्याओं ने उन्हें बताया था कि इस व्रत के प्रभाव से समस्त कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं। राजा ने उस समय व्रत करने का संकल्प तो लिया, लेकिन विधि-विधान से इसे पूरा नहीं किया। उसी अधूरे कर्म और व्रत के प्रभाव के कारण राजा को इस जन्म में भी संतान सुख से वंचित होना पड़ा。तब महर्षि मार्कण्डेय की सलाह से राजा चंद्रसेन और रानी रत्नावली ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ अधिक मास में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई।
गणेश जी से जुड़े पौराणिक तथ्य
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1👉 किसी भी देव की आराधना के आरम्भ में किसी भी सत्कर्म व अनुष्ठान में, उत्तम-से-उत्तम और साधारण-से-साधारण कार्य में भी भगवान गणपति का स्मरण, उनका विधिवत पूजन किया जाता है। इनकी पूजा के बिना कोई भी मांगलिक कार्य को शुरु नहीं किया जाता है। यहाँ तक की किसी भी कार्यारम्भ के लिए ‘श्री गणेश’ एक मुहावरा बन गया है। शास्त्रों में इनकी पूजा सबसे पहले करने का स्पष्ट आदेश है।
2👉 गणेश जी की पूजा वैदिक और अति प्राचीन काल से की जाती रही है। गणेश जी वैदिक देवता हैं क्योंकि ऋग्वेद-यजुर्वेद आदि में गणपति जी के मन्त्रों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
3👉 शिवजी, विष्णुजी, दुर्गाजी, सूर्यदेव के साथ-साथ गणेश जी का नाम हिन्दू धर्म के पाँच प्रमुख देवों (पंच-देव) में शामिल है। जिससे गणपति जी की महत्ता साफ़ पता चलती है।
4👉 ‘गण’ का अर्थ है - वर्ग, समूह, समुदाय और ‘ईश’ का अर्थ है - स्वामी। शिवगणों और देवगणों के स्वामी होने के कारण इन्हें ‘गणेश’ कहते हैं।
5👉 शिवजी को गणेश जी का पिता, पार्वती जी को माता, कार्तिकेय (षडानन) को भ्राता, ऋद्धि-सिद्धि (प्रजापति विश्वकर्मा की कन्याएँ) को पत्नियाँ, क्षेम व लाभ को गणेश जी का पुत्र माना गया है।
6👉 श्री गणेश जी के बारह प्रसिद्ध नाम शास्त्रों में बताए गए हैं; जो इस प्रकार हैं: 1. सुमुख, 2. एकदंत, 3. कपिल, 4. गजकर्ण, 5. लम्बोदर, 6. विकट, 7. विघ्नविनाशन, 8. विनायक, 9. धूम्रकेतु, 10. गणाध्यक्ष, 11. भालचंद्र, 12. गजानन।
7👉 गणेश जी ने महाभारत का लेखन-कार्य भी किया था। भगवान वेदव्यास जब महाभारत की रचना का विचार कर चुके तो उन्हें उसे लिखवाने की चिंता हुई। ब्रह्माजी ने उनसे कहा था कि यह कार्य गणेश जी से करवाया जाए।
8👉 पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘ॐ’ को साक्षात गणेश जी का स्वरुप माना गया है। जिस प्रकार प्रत्येक मंगल कार्य से पहले गणेश-पूजन होता है, उसी प्रकार प्रत्येक मन्त्र से पहले ‘ॐ’ लगाने से उस मन्त्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
वरदा चतुर्थी पूजा की विधि
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वरदा चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें.
इसके बाद पूजा स्थान को शुद्ध करके चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.
पूजा के दौरान गणपति बप्पा को सिंदूर का तिलक अर्पित करें, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है.
गणेश जी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है. पूजा करते समय “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए 21 दूर्वा दल अर्पित करें.
इसके बाद भगवान गणेश को मोदक या उनके प्रिय मिठाई का भोग लगाएं.
विधि-विधान से विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करें और अंत में आरती उतारें.
मान्यता है कि वरदा चतुर्थी का व्रत करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है.
इस दिन गणेश पूजन के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना और अपनी क्षमता अनुसार दान देना शुभ माना जाता है.
धार्मिक विश्वास के अनुसार “ॐ गणेशाय नमः” मंत्र का जाप करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और स्वास्थ्य संबंधी कष्टों में भी राहत मिलती है.
अधिकमास विभुवन चतुर्थी मुहूर्त
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चतुर्थी तिथि प्रारम्भ 👉 03 जून 2026 को रात्रि 21:21 बजे से
चतुर्थी तिथि समाप्त 👉 जून 04 को रात्रि 23:30 बजे तक
संकष्टी के दिन चन्द्रोदय 👉 रात्रि 22:04 से 22:43 तक।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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