sn vyas
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#जय श्री राम
पानी परात को हाथ छुयो नहिं।
नैनन के जल सो पग धोये।।
भावार्थ: जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो अपने बचपन के मित्र की यह दशा देखकर श्री कृष्ण इतने भावुक हो गए कि सुदामा के पैर धोने के लिए मंगाई गई परात के पानी को उन्होंने छुआ तक नहीं, बल्कि अपनी आँखों से बहते हुए आंसुओं से ही मित्र के पैर धो डाले।
भावार्थ: जब सुदामा जी द्वारका पहुँचे, तो श्री कृष्ण अपने परम मित्र की दीन-हीन दशा देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठे। वे सुदामा को सिंहासन पर बैठाकर उनके पैर धोने के लिए परात में पानी मंगवाते हैं। परंतु, सुदामा के पैरों में चुभे कांटे और उनकी दरिद्रता देखकर भगवान कृष्ण को इतना गहरा दुःख होता है कि उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगती है। कृष्ण ने पैर धोने के लिए परात में रखे पानी को हाथ तक नहीं लगाया, बल्कि अपने आंसुओं के जल से ही सुदामा के पैर धो दिए। यह पंक्ति निश्छल प्रेम और करुणा की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
ईश्वर का अपने भक्त के प्रति प्रेम भगवद-प्रेम समानता का भाव: भगवान कृष्ण द्वारकाधीश (राजा) हैं और सुदामा अत्यंत दरिद्र, लेकिन भगवान ने जाति, धन या वैभव का कोई भेद नहीं रखा। उन्होंने अपने सखा को अपने बराबर सिंहासन पर बैठाया।करुणा और संवेदनशीलता: भगवान केवल भाव के भूखे हैं। वे अपने भक्त के कष्ट को देखकर स्वयं रो पड़ते हैं। यह दिखाता है कि ईश्वर अपने भक्तों के दुख से कभी अछूते नहीं रहते।अहंकार का नाश: संसार के स्वामी होते हुए भी कृष्ण एक दीन-हीन ब्राह्मण के चरणों में बैठ जाते हैं। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति के आगे स्वयं भगवान भी झुक जाते हैं।
भक्ति संदेश निश्छल भक्ति सर्वोपरि है: सुदामा कृष्ण के पास कोई धन या लालच लेकर नहीं गए थे, वे केवल अपने मित्र के प्रेम के खिंचे चले आए थे। ईश्वर को केवल शुद्ध और निश्छल प्रेम ही रिझा सकता है।
धैर्य और संतोष: सुदामा ने जीवनभर घोर दरिद्रता झेली, लेकिन कभी भगवान से शिकायत नहीं की। यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
मित्रता की मिसाल: यह प्रसंग समाज को सिखाता है कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी की कोई दीवार नहीं होती।
🙏🌹🌻!!जय श्री कृष्ण!!🌻🌹🙏
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