sn vyas
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#राधे कृष्णा #राधे श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा एक मात स्वामी सखा हमारे हे नाथ नारायण वासुदेवा बंदी गृह के तुम अवतारी कही जन्मे कही पीला मुरारी किसी के जाए किसी के कहे है अद्भुत हर बात टिहरी गोकुल में चमके मथुरा के तारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा आधार में बंशी ह्रदय में राधे बात गए दोनों में आधे आधे हे राधा नगर हे भक्त वत्सल सदैव भक्तो के काम साढ़े वहीँ गए वहीँ गए जहा गए पुकारे हे नाथ नारायण वासुदेवा राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे राधे कृष्ण कृष्ण त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधू सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देवा श्रीकृष्ण का विदुर-गृह आगमन और भोजन लीला.... यह लीला केवल भगवान के भोजन करने की कथा नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भगवान को वैभव, धन और राजसी भोग नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम प्रिय है। जब महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे, तब दुर्योधन ने उनके स्वागत के लिए भव्य महलों, राजसी भोज और असीम ऐश्वर्य की व्यवस्था की। किन्तु भगवान जानते थे कि दुर्योधन के हृदय में प्रेम नहीं, अहंकार और स्वार्थ है। दूसरी ओर महात्मा विदुर का घर था—न कोई वैभव, न राजसी व्यवस्था, केवल निर्मल भक्ति और भगवान के प्रति निष्काम प्रेम। दुर्योधन का निमंत्रण.. जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया, तब भगवान ने उसे अस्वीकार कर दिया। महाभारत में भगवान कहते हैं— "नाहं कामान्न संरोधान्न द्वेषान्नार्थकारणात्। भुञ्जे भोजनमद्य त्वं न च मे त्वयि सौहृदम्॥" "मैं न किसी लोभ से, न भय से और न किसी स्वार्थ से भोजन ग्रहण करता हूँ। जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ मैं भोजन स्वीकार नहीं करता।" भगवान ने स्पष्ट कर दिया कि प्रेम के बिना दिया गया भोज केवल भोजन है, प्रसाद नहीं। विदुरजी के घर आगमन... दुर्योधन के महल को छोड़कर भगवान सीधे विदुरजी के घर पहुँचे। उस समय विदुरजी घर पर नहीं थे। विदुर-पत्नी (जिन्हें अनेक ग्रंथों में विदुराणी कहा गया है) भगवान को अपने द्वार पर देखकर प्रेम-विह्वल हो गईं। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि स्वयं द्वारकाधीश उनके छोटे से घर में पधारेंगे। भागवत का सिद्धांत है... "अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।" श्रीमद्भागवतम् : "मैं अपने भक्तों के प्रेम के अधीन रहता हूँ।" प्रेम में विस्मृत विदुराणी.. कथा प्रसिद्ध है कि विदुराणी भगवान को देखकर इतनी प्रेममग्न हो गईं कि केले छील-छीलकर भगवान को खिलाने लगीं, पर प्रेमावेश में फल फेंक देतीं और छिलके भगवान को खिला देतीं। श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्द से वे छिलके खाते रहे। जब विदुरजी लौटे तो यह दृश्य देखकर चकित रह गए। उन्होंने कहा— "देवि! आप क्या कर रही हैं? फल फेंक रही हैं और छिलके प्रभु को खिला रही हैं!" तब विदुराणी को होश आया और वे अत्यन्त लज्जित हुईं। किन्तु भगवान मुस्कुराकर बोले.. "विदुर! आज जो स्वाद इन छिलकों में मिला है, वह स्वर्ग के अमृत में भी नहीं।" यह घटना इस सत्य को प्रकट करती है... "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥" भगवद्गीता : "जो भक्त प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे प्रेम सहित स्वीकार करता हूँ।" विदुरजी का साग:: एक अन्य प्रसिद्ध परम्परा के अनुसार विदुरजी के घर अत्यन्त साधारण साग और मोटा भोजन था। न घी, न मिष्ठान्न, न राजभोग। भगवान ने उसी साग को बड़े प्रेम से ग्रहण किया। इसीलिए लोक में कहा जाता है.... "दुर्योधन के मेवा त्यागे, साग विदुर घर खायो।" अर्थात भगवान ने दुर्योधन के राजसी व्यंजन छोड़कर विदुर के घर का साधारण साग स्वीकार किया। भगवान वस्तु नहीं देखते, भाव देखते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं— "रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेहु जो जाननिहारा॥" अर्थात: भगवान को केवल प्रेम प्रिय है। जिस हृदय में प्रेम है, वहाँ भगवान स्वयं चले आते हैं। विदुर के पास धन नहीं था, किन्तु भक्ति थी। दुर्योधन के पास सम्पूर्ण वैभव था, किन्तु प्रेम नहीं था। इसलिए भगवान ने महलों को छोड़कर भक्त के झोपड़े को चुना। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं... "समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥" "मैं सबमें समान हूँ, किन्तु जो मुझे प्रेम और भक्ति से भजते हैं, मैं उनके हृदय में निवास करता हूँ और वे मेरे हृदय में।" इस प्रकार विदुर-गृह की यह लीला युगों-युगों से यह संदेश देती है कि भगवान को स्वर्ण के महल नहीं, प्रेम से भरा हृदय चाहिए। जहाँ निष्काम प्रेम है, वहीं वृन्दावन है, वहीं द्वारका है, और वहीं स्वयं श्रीकृष्ण का निवास है। ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ .
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