sn vyas
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#जय श्री कृष्ण पद: देख सखी पवन पूरवैया ​देख सखी! पवन पूरवैया, ठौर-ठौर रुखन को हलबो। ​आछी नीकी कारी पीरी, घटाँ घुमड़ आई, ता मध कृष्ण-श्यामाजू को चलबो॥ ​दादुर, मोर, पपीहा बोले, चहुँ दिसि चमकत बिज्जु नभ में। शीतल मन्द सुगन्ध समीर बहत, हसि-हसि कण्ठ भुज भरि मिलबो॥ ​आनन्द-कन्द श्री नन्द-नन्दन, वृषभानु-लली संग रास रचे। 'श्री हरिदास' के स्वामी श्यामा-कुञ्जविहारी, छिन-छिन नव-अनुराग बढ़बो॥ ​भावार्थ (अर्थ): ​देख सखी! पवन पूरवैया, ठौर-ठौर रुखन को हलबो: गोपी अपनी सखी से कहती है—हे सखी! देख, पूरब की शीतल मंद हवा (पुरवैया) चल रही है और जगह-जगह वृक्ष (रुखन) खुशी में झूम और डोल रहे हैं। ​आछी नीकी कारी पीरी घटाँ घुमड़ आई... आकाश में बहुत ही सुंदर, काली और पीली घटाएँ उमड़-घुमड़ कर आ गई हैं। ऐसे सुहावने समय में उनके बीच श्री कृष्ण और श्यामाजू (श्री राधा जी) का एक-दूसरे का हाथ थामकर चलना कितना मनभावन लग रहा है! ​दादुर, मोर, पपीहा बोले... मेंढक (दादुर), मोर और पपीहे अपनी मधुर ध्वनि में कूक रहे हैं तथा चारों दिशाओं में बिजलियाँ चमक रही हैं। ​हसि-हसि कण्ठ भुज भरि मिलबो: इस सुगंधित और शीतल वातावरण में श्री प्रिया-प्रियतम एक-दूसरे के गले में बाँहें डालकर हँसते हुए आलिंगनबद्ध हो रहे हैं और असीम आनंद बढ़ा रहे हैं। .
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