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#जय श्री कृष्ण
"अर्जुन के वह सारथी और सुदामा मित्र"
इन पंक्तियों के माध्यम से भगवान कृष्ण के दो अनन्य रूपों को दर्शाया गया है। जहाँ एक तरफ वे महाभारत के युद्ध में अर्जुन के 'सारथी' (मार्गदर्शक) बनकर धर्म की स्थापना करते हैं और गीता का दिव्य ज्ञान देते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे 'सुदामा' के ऐसे निश्छल मित्र हैं जो राजा होने के बाद भी मित्रता में अमीर-गरीब का भेद मिटा देते हैं। यह उनके कर्तव्यनिष्ठ और प्रेमपूर्ण स्वभाव को दिखाता है।
"द्रुपद सुता की लाज हैं राधा ह्रदय के चित्र"
'द्रुपद सुता' अर्थात द्रौपदी। जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने अनंत साड़ी बनकर उनकी लाज बचाई, जो उनके भक्त-वत्सल रूप को प्रकट करता है। इसके साथ ही, वे 'राधा के हृदय का चित्र' हैं, यानी राधा जी के मन में सदैव बसने वाले और निश्छल प्रेम के प्रतीक हैं।
"रूप अनेकन धार के रमे सभी के पास"
भगवान श्री कृष्ण ने सृष्टि के कल्याण के लिए और अपने भक्तों की पुकार सुनकर समय-समय पर अनेक रूप धारण किए हैं (जैसे बाल कृष्ण, माखनचोर, द्वारकाधीश, विष्णु रूप)। वे किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हर जीव के भीतर आत्मा के रूप में रमे (बसे) हुए हैं।
"एक कृष्ण ही पूर्ण हैं, कण कण करें निवास"
शास्त्रों में श्री कृष्ण को 'पूर्ण अवतार' माना गया है। वे स्वयं नारायण हैं जो प्रकृति के 'कण-कण' में, हर जीव और निर्जीव में वास करते हैं। उनके बिना इस सृष्टि के किसी भी अंश की कल्पना असंभव है।