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2122 1122 1122 22/112 नींद आँखों की हम अपने उड़ा ले आये इक सितमगर को दिल में बसा ले आये पाई है हमने सजा जुर्मे मोहब्बत की जो साथ हम अपने उसी की सजा ले आये दाग दामन पे मुहब्बत का लगा के अपने सर पे इल्जाम दगाओं का बड़ा ले आये आरजू राह गई अधूरी हरिक दिलकी मेरे तोहफे में दर्द से भरी हम सबा ले आये अर्से से चाहत थी दिल कोबसाने की जो जान जालिम के हाथों में फसां ले आये क्या वफाओ का सिला है मिला हमको इस मुहब्बत का तजुर्बा हम बुरा ले आये आये जब कब्र पे मेरी वो बहाने आँसू तब मेरे वास्ते फूलों की कबा ले आये ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 24/3/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - तोहफे में दर्द से भरी हम सबा ले 31ಶ नींद आँखों की हम अपने उडा ले आये इक सितमगरको दिल में बसा ले आये पाई हमने  वो सजाएँ जुर्मे मोहब्बत की साथ हम अपने कजा की सजाले आये दाग दामन पे मुहब्बत का लगा के अपने सरपे इल्जाम हम अपने बडा ले आये आरजू हरअधूरी रह गई दिल की मेरे तोहफे में दर्द से भरी हम सबा ले आये ग अर्से से चाहत थी दिल कोबसाने की जो স ক্মা ল সাঠ जान जालिम के हाथों ؟ क्यावफाओ का सिला है मिला हमको हम बुरा ले आये तजुर्बा इस मुहब्बत का ल आँसू आये जब कब्र पे मेरी वो बहाने की कबा ले आये तब मेरे वास्ते फूलों ( लक्ष्मण दावानी तोहफे में दर्द से भरी हम सबा ले 31ಶ नींद आँखों की हम अपने उडा ले आये इक सितमगरको दिल में बसा ले आये पाई हमने  वो सजाएँ जुर्मे मोहब्बत की साथ हम अपने कजा की सजाले आये दाग दामन पे मुहब्बत का लगा के अपने सरपे इल्जाम हम अपने बडा ले आये आरजू हरअधूरी रह गई दिल की मेरे तोहफे में दर्द से भरी हम सबा ले आये ग अर्से से चाहत थी दिल कोबसाने की जो স ক্মা ল সাঠ जान जालिम के हाथों ؟ क्यावफाओ का सिला है मिला हमको हम बुरा ले आये तजुर्बा इस मुहब्बत का ल आँसू आये जब कब्र पे मेरी वो बहाने की कबा ले आये तब मेरे वास्ते फूलों ( लक्ष्मण दावानी - ShareChat
221 2121 1221 212 युँ तो लबो पे उस के सदा ही रहा हूँ उनके लिये में बन के दुआ ही रहा हूँ आँखों से बहते अश्क ने सुना दि दास्ताँ इक तीर बन के दिल मे चुभा ही रहा हूँ वो जान ही न पाये मुहब्बत भरा ये दिल ता उम्र जिनके खातिर रुका ही रहा हूँ जो पढ़ सके न मेरे निगाहों में बावफ़ा नज़रो में उन के मैं बेवफा ही रहा हूँ हमदर्द तो बहुत थे मिले इस जमाने में मैं अपने मर्जे दवा से जुदा ही रहा हूँ चाहत में जिनके मैने गुजारी ये ज़िन्दगी उनकी नज़र में बनके सजा ही रहा हूँ ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 13/10/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - 212 221 2121 1221 युँ तो लबो पे उस के सदा ही रहा हूँ उनके लिये में बन के दुआ ही रहा हूँ ऑँखों से बहते अश्क ने सुना दि दास्ताँ इक तीर बन के दिल मे चुभा ही रहा हूँ वो जान ही न पाये मुहब्बत भरा ये दिल ताउम्र जिनके खातिर रुका ही रहा हूँ जो पढ सके न मेरे निगाहों में बावफ़ा रोमें उन के मैं बेवफा ही रहा हूँ 6#6$# मिले इस में से जुदा ೫ 33 8 चाहतभें जिनके मैने 4f1 _ 3_AL =- ( बक्याणदावानी  13/10/2017 212 221 2121 1221 युँ तो लबो पे उस के सदा ही रहा हूँ उनके लिये में बन के दुआ ही रहा हूँ ऑँखों से बहते अश्क ने सुना दि दास्ताँ इक तीर बन के दिल मे चुभा ही रहा हूँ वो जान ही न पाये मुहब्बत भरा ये दिल ताउम्र जिनके खातिर रुका ही रहा हूँ जो पढ सके न मेरे निगाहों में बावफ़ा रोमें उन के मैं बेवफा ही रहा हूँ 6#6$# मिले इस में से जुदा ೫ 33 8 चाहतभें जिनके मैने 4f1 _ 3_AL =- ( बक्याणदावानी  13/10/2017 - ShareChat
1212 1122 1212 22/112 सिला वफ़ा का वफ़ा से अदा नहीं होता हर एक शख्स यहाँ पारसा नहीं होता कदम कदम पे मिली ठोकरे यहाँ हमको कभी लिखा मुकद्दर का जुदा नहीं होता नेकी के बदले बदी है यहाँ पे मिलती अब कर के भला भी यहाँ पर भला नहीं होता करूँ में कैसे यकीं अब जहाँ के बातों पर गिरा है कौन अब कितना पता नहीं होता न करते गर ये मुहब्बत यहाँ किसी से हम झुठा इल्जाम ये सर पर लगा नहीं होता गिला किया बेवफाई का उनके जब हमने कहा कि हुस्न कभी बे वफा नहीं होता ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 21/3/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - कभी लिखा मुकद्दर का जुदा नहीं होता वफ़ा से अदा नहीं होता सिला  वफ़ा का शख्स यहाँ पारसा नहीं होता हर एक कदम पे मिली ठोकरे यहाँ हमको कदम कभी लिखा मुकद्दर का जुदा नहीं होता ग नेकी के बदले बदी है पे मिलती अब यहाँ कर के भला भी यहाँपर भला नहीं होता ज़करूँ में कैसे यकीं अब जहाँ के बातों पर गिरा है कौन अब कितना पता नहीं होता लन करते गर ये मुहब्बत यहाँ किसी से हम झुठा इल्जाम ये सरपर लगा नहीं होता गिला किया बेवफाई का उनके जब हमने க 55 कभी बे वफा नहीं होता कहा ( লঃসতা নানানী कभी लिखा मुकद्दर का जुदा नहीं होता वफ़ा से अदा नहीं होता सिला  वफ़ा का शख्स यहाँ पारसा नहीं होता हर एक कदम पे मिली ठोकरे यहाँ हमको कदम कभी लिखा मुकद्दर का जुदा नहीं होता ग नेकी के बदले बदी है पे मिलती अब यहाँ कर के भला भी यहाँपर भला नहीं होता ज़करूँ में कैसे यकीं अब जहाँ के बातों पर गिरा है कौन अब कितना पता नहीं होता लन करते गर ये मुहब्बत यहाँ किसी से हम झुठा इल्जाम ये सरपर लगा नहीं होता गिला किया बेवफाई का उनके जब हमने க 55 कभी बे वफा नहीं होता कहा ( লঃসতা নানানী - ShareChat
2122 1212 22 बोझ दिल का उतार आये क्या दर्द की हद गुज़ार आये क्या हम समझ लेते है इशारों को दिल कहीं अपना हार आये क्या हर मुहब्बत सफल नही होती तुम मुकद्दर सवार आये क्या उम्र गुस्ताखियों में गुजारी कोई अच्छे विचार आये क्या हिज्र की रात ढल गई तेरी दिल मे फिर भी करार आये क्या चाँदनी मिल गई भले तुमको ज़िन्दगी में मयार आये क्या वस्ल की रातेँ खुश नुमा होगी कोई पल खुशगवार आये क्या ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 27/10/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - 4144 1212 22 बोझ दिलका उतार आये क्या दर्द की हद गुज़ार आये क्या लेते है इशारों को हम समझ दिल कहीं   अपना हार आये क्या हर मुहब्बत सफल नही होती 3াঠ নযা HqR तुम मुकद्दर गुस्ताखियों गुजारी 3 म कोई अच्छे [ళ विचार अय I চিত কী   যন $ # 6 दिल मे फिर भी करार आये क्या SSXLi चाँदनी मिल गई भले तुमको ज़िन्दगी # 3ಶ R क्या वस्ल की रातेँ खुश नुमा होगी कोई पल खुशगवार आये क्या ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 27/10/2017 4144 1212 22 बोझ दिलका उतार आये क्या दर्द की हद गुज़ार आये क्या लेते है इशारों को हम समझ दिल कहीं   अपना हार आये क्या हर मुहब्बत सफल नही होती 3াঠ নযা HqR तुम मुकद्दर गुस्ताखियों गुजारी 3 म कोई अच्छे [ళ विचार अय I চিত কী   যন $ # 6 दिल मे फिर भी करार आये क्या SSXLi चाँदनी मिल गई भले तुमको ज़िन्दगी # 3ಶ R क्या वस्ल की रातेँ खुश नुमा होगी कोई पल खुशगवार आये क्या ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 27/10/2017 - ShareChat
2122 2122 2122 अपने लब तो खोलिये खामोश क्यों हो राज -ए - दिल बोलिये खामोश क्यों हो है मुहब्बत की अलामत रूठ जाना क्यूँ खफा हो सोचिये खामोश क्यों हो उठते थे जो हाथ दुआओ मे मेरी सन्ग गैरों हो लिये खामोश क्यों हो बात दिल की साफ़ शब्दो में बता दो चुप न रहिये देखिये खामोश क्यों हो है निभाने की अगर चाहत तुझे भी पास मेरे आइये खामोश क्यों हो उम्र तो कट जायेगी ये धीरे धीरे यूँ जहर ना घोलिये खामोश क्यों हो ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 20/3/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - सन्ग गैरों हो लिये खामोश क्यों हो अपने लब तो खोलिये खामोश क्यों हो -ए - दिल बोलिये खामोश क्यों हो 7 मोहब्बत की है अलामत २ठ TT क्यूँ खफा हो सोचिये खामोश क्यों हो हाथ   दुआओ मे मेरी ও০৯ থ তী सन्ग गैरों हो लिये खामोश क्यों हो ग बात दिलकी साफ शब्दो में बता दो चुप न रहिये देखिये खामोश क्यों हो ज़ है निभाने की अगर चाहत तुझे भी பH # खामोश क्यों हो आइये ल ये धीरे धीरे 37 గ कट जायेगी यूँजिहरना घोलिये खामोश क्यों हो ( লঃসতা নানানী सन्ग गैरों हो लिये खामोश क्यों हो अपने लब तो खोलिये खामोश क्यों हो -ए - दिल बोलिये खामोश क्यों हो 7 मोहब्बत की है अलामत २ठ TT क्यूँ खफा हो सोचिये खामोश क्यों हो हाथ   दुआओ मे मेरी ও০৯ থ তী सन्ग गैरों हो लिये खामोश क्यों हो ग बात दिलकी साफ शब्दो में बता दो चुप न रहिये देखिये खामोश क्यों हो ज़ है निभाने की अगर चाहत तुझे भी பH # खामोश क्यों हो आइये ल ये धीरे धीरे 37 గ कट जायेगी यूँजिहरना घोलिये खामोश क्यों हो ( লঃসতা নানানী - ShareChat
122 122 122 122 भले प्यार का हम से इजहार मत कर मगर बेवफा बन के भी वार मत कर करो चाहे जितने सितम दिल पे मेरे रकीबो से मेरे मगर प्यार मत कर सिमट आये हो युँ पनाहों में मेरी बता राजे दिल अपने बेजार मत कर कहाँ जाते हो गैर की बातें सुन कर किसी अजनबी का तू एतबार मत कर गिराओ न पर्दा ठहर जा जरा सा शबे वस्ल को अब युँ बेकार मत कर कभी गौर से सुन ले बातें हमारी मुहब्बत इबादत है व्यापार मत कर ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 25/10/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - 122 122 122 122 भले प्यार का हम से इजहार मत कर मगर बेवफा बन के भी वार मत कर 14 #4# <I 418 [ रकीबो से फरप्यार मत कर सिमट पनाहों में मेरी आये बता राजे दिल अपने  बेजार मत कर कहाँ जाते हो गै़र की बातें सुन कर किसी अजनबी का तू एतबार मत कर गिराओ न पर्दा ठहर जा जरा HI থান বংল ব্ী 3ন যুঁ ঐব্চাৎ মন বং कभी गौर से sdid 8 मुहब्बत @ ( লঃসতা মাবানী 25/10/2017 122 122 122 122 भले प्यार का हम से इजहार मत कर मगर बेवफा बन के भी वार मत कर 14 #4# <I 418 [ रकीबो से फरप्यार मत कर सिमट पनाहों में मेरी आये बता राजे दिल अपने  बेजार मत कर कहाँ जाते हो गै़र की बातें सुन कर किसी अजनबी का तू एतबार मत कर गिराओ न पर्दा ठहर जा जरा HI থান বংল ব্ী 3ন যুঁ ঐব্চাৎ মন বং कभी गौर से sdid 8 मुहब्बत @ ( লঃসতা মাবানী 25/10/2017 - ShareChat
2122 2122 212 ऐसे ना लाचार करना चाहिये दर बदर ना यार करना चाहिये इश्क जब हो ही गया है तुझे तो इश्क का इजहार करना चाहिये बे खबर कब तक रहोगे इश्क से प्यार का इकरार करना चाहिये ख्वाब आँखों में मुहब्बत के जगे अब उसे साकार करना चाहिये मिल गयी है बे इरादा नज़रे जब इनके तो सत्कार करना चाहिये आ गये जो बिन बुलाए बज्म में उनके भी आभार करना चाहिये ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 17/3/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - प्यार का इकरार க 4ரf84 ऐसेना चाहिये लाचार करना 41f84 दर बदर नायार करना इश्क जब होही गया है तुझे तो इजहार करना चाहिये इश्क का ग इश्क से बे खबर कब तक रहोगे करना चाहिये प्यार का इकरार ज़ ख्वाब आँखों में मुहब्बत के जगे aIfగu अब उसे साकार HI ल मिल गयी हैबे इरादा नज़रे जब इनके तो  सत्कार करना चाहिये आ गये जोबिन बुलाए बज्म में उनके भी आभार करना चाहिये ( लक्ष्मण दावानी प्यार का इकरार க 4ரf84 ऐसेना चाहिये लाचार करना 41f84 दर बदर नायार करना इश्क जब होही गया है तुझे तो इजहार करना चाहिये इश्क का ग इश्क से बे खबर कब तक रहोगे करना चाहिये प्यार का इकरार ज़ ख्वाब आँखों में मुहब्बत के जगे aIfగu अब उसे साकार HI ल मिल गयी हैबे इरादा नज़रे जब इनके तो  सत्कार करना चाहिये आ गये जोबिन बुलाए बज्म में उनके भी आभार करना चाहिये ( लक्ष्मण दावानी - ShareChat
2122 1122 1122 22/११२ जो मिले जख्म मोहब्बत के सुहाने है बहुत दर्द मद्वम है मगर जख्म पुराने है बहुत शाख-दर -शाख तेरी याद की हरियाली हो दिल-ए-बर्बाद पे शजर ऐसे लगाने है बहुत सर झुका कर सलाम करने में हर्ज क्या है आस्ताँ पर अभी तो सर झुकाने है बहुत साथ छूटा तुमारा अजनबी भी हुए तुम अब कहाँ खोजें हम तेरे ठिकाने है बहुत गम न कर हो न पशेमाँ तू जफ़ा से अपनी राजे उल्फत से अभी पर्दे उठाने है बहुत सर पे इल्जाम लगाये जो झूठे तूने मेरे आँसुभी धो न पाये जिन्हें दिखाने है बहुत ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 16/3/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - मद्वम है मगर है पुराने UgT बहुत है बहुत जो मिले जख्म मोहब्बत के सुहाने दर्द मद्वम है मगर जख्म है बहुत पुराने हरियाली हो शाखदर -शाख तेरी याद की दिल ए बर्बाद पे शजर ऐसे लगाने है बहुत गसर झुका करने में हर्ज क्या है कर सलाम सर झुकाने है बहुत पर अभी तो आस्ता ज़साथ छूटा तुमारा अजनबी भी ೯೯೯೯ अब कहाँ खोजें हम तेरे ठिकाने बहुत লে गम न कर हो न पशेमाँ तू जफ़ा से अपनी राजे उल्फत से अभी पर्दे उठाने है बहुत ಕ್ಷಷಕ್ಷ೯್ सर पे इल्जाम लगाये जो झूठे आँसुभी धो न पाये जिन्हें दिखाने बहुत ( लक्ष्मण दावानी मद्वम है मगर है पुराने UgT बहुत है बहुत जो मिले जख्म मोहब्बत के सुहाने दर्द मद्वम है मगर जख्म है बहुत पुराने हरियाली हो शाखदर -शाख तेरी याद की दिल ए बर्बाद पे शजर ऐसे लगाने है बहुत गसर झुका करने में हर्ज क्या है कर सलाम सर झुकाने है बहुत पर अभी तो आस्ता ज़साथ छूटा तुमारा अजनबी भी ೯೯೯೯ अब कहाँ खोजें हम तेरे ठिकाने बहुत লে गम न कर हो न पशेमाँ तू जफ़ा से अपनी राजे उल्फत से अभी पर्दे उठाने है बहुत ಕ್ಷಷಕ್ಷ೯್ सर पे इल्जाम लगाये जो झूठे आँसुभी धो न पाये जिन्हें दिखाने बहुत ( लक्ष्मण दावानी - ShareChat
2122 1212 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन के वो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म तर बतर हुआ अश्क बन आँखों से आब उतरा चौट ऐसी लगी मेरे दिल पर इश्क का सर से मेरे ताब उतरा ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 22/10/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - 1212 2122 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन केवो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म q S3 बन आँखों सेआब उतरा अश्क चौट ऐसी लगी मेरे  दिल ٦ ব্ধা মং ম মং নান ওনয इश्क ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 22/10/2017 1212 2122 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन केवो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म q S3 बन आँखों सेआब उतरा अश्क चौट ऐसी लगी मेरे  दिल ٦ ব্ধা মং ম মং নান ওনয इश्क ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 22/10/2017 - ShareChat
221 2121 1221 212 आँखों के बहते अश्क के धारो को छोड़ दो मौजो के साथ खेलो किनारों को छोड़ दो सुर बजते है गमो के मेरी मुहब्बत के अब मत पूछ नग्मा - इश्क के तारों को छोड़ दो इस इश्क ने किसे है दिया साथ उम्र भर तन्हा सफर हे झूठे सहारो को छोड़ दो गुलफिर खिलेंगे उजड़े चमन केआशियाँ में बिखरी हुई बहारो के खारों को छोड़ दो हर हसरतो के खाब अधूरे रहते नहीं इन बद नसीब दर्द के मारों को छोड़ दो पत्थर नहीं थे फेंक दिया जो तूने हमें आओ करीब दिल के दयारों को छोड़ दो ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 10/3/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - इन बदनसीब दर्द 3 HRI &} els आँखों के अश्क के धारो को छोड़ दो बहते मौजो के साथ खेलो किनारों को छोड़ दो सुर बजते है गमो के मेरी मुहब्बत के अब इश्क के तारों को छोड़ दो मत पूछ नग्मा TT इस इश्क ने किसे है दिया साथ उम्र भर ಫ ಐತ೩ तन्हा सफर हे झूठे सहारो ؟« खिलेंगे उजड़े चमन केआशियाँ में के खारों को छोड़ दो d6RI हसरतो के खाब रहते नहीं T अधरे हर इन बद नसीब दर्दके मारोंको छोड़ दो पत्थर नहीं थे फेंक दियाजो तूने हमें आओ करीब दिल के दयारों को छोड़ दो ( लक्ष्मण दावानी इन बदनसीब दर्द 3 HRI &} els आँखों के अश्क के धारो को छोड़ दो बहते मौजो के साथ खेलो किनारों को छोड़ दो सुर बजते है गमो के मेरी मुहब्बत के अब इश्क के तारों को छोड़ दो मत पूछ नग्मा TT इस इश्क ने किसे है दिया साथ उम्र भर ಫ ಐತ೩ तन्हा सफर हे झूठे सहारो ؟« खिलेंगे उजड़े चमन केआशियाँ में के खारों को छोड़ दो d6RI हसरतो के खाब रहते नहीं T अधरे हर इन बद नसीब दर्दके मारोंको छोड़ दो पत्थर नहीं थे फेंक दियाजो तूने हमें आओ करीब दिल के दयारों को छोड़ दो ( लक्ष्मण दावानी - ShareChat