अजय ओमप्रकाश आर्य
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अजय ओमप्रकाश आर्य
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4.3.2026 समस्याएं किसके जीवन में नहीं आती सबके जीवन में आती हैं। आपके जीवन में भी आती ही होंगी। *"यदि आप अपने जीवन की उन समस्याओं को हल करेंगे, तो आप सुखी रहेंगे। यदि आप समस्याओं की उपेक्षा करेंगे, उन पर चिंतन मनन नहीं करेंगे, उनका समाधान नहीं ढूंढेंगे, तो आप दुखी रहेंगे। इसलिए समस्याओं का समाधान करना तो आवश्यक है।"* अब उसका सही उपाय यह है, कि *"उन समस्याओं के समाधान पर चिंतन करें। चिंतन करने से समस्याओं का हल मिल जाता है। यदि स्वयं न मिले, तो दूसरे बुद्धिमानों की सहायता लेवें। उससे आपकी समस्याएं हल हो जाएंगी।"* परंतु कुछ लोग चिंतन नहीं करते, बल्कि अपनी समस्याओं को लेकर अनेक प्रकार की चिंताएं करते हैं। यह ठीक नहीं है। *"क्योंकि चिंता करने से समस्याएं और बढ़ती हैं, कम नहीं होती।"* *"इसलिए अपनी समस्याओं पर चिंता न करें, बल्कि उनका समाधान ढूंढने के लिए चिंतन करें। चिंतन करने से आपकी समस्याएं हल हो जाएंगी और आप सुखी हो जाएंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏कर्म क्या है❓ - अण dl  aa 04 ম चिंता करने से समस्याएं बढ़ती है। और चिंतन करने से समस्याएं हल हो जाती हैंl जीवन जीने के लिए चिंता न करें, सुखी ' अतः चिंतन अवश्य करें। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyog org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय अण dl  aa 04 ম चिंता करने से समस्याएं बढ़ती है। और चिंतन करने से समस्याएं हल हो जाती हैंl जीवन जीने के लिए चिंता न करें, सुखी ' अतः चिंतन अवश्य करें। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyog org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय - ShareChat
3.3.2026 *"इच्छाओं को पूरा करने से इच्छाएं बढ़ती हैं, घटती नहीं।"* यह अनुभव लगभग सभी लोगों को है। दूसरी बात - *"किसी भी व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी हो नहीं पाती."* यह भी लोगों को पता है। फिर भी लोग अपनी अविद्या या मूर्खता आदि के कारण अपनी इच्छाएं बढ़ाते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है, कि *"उनकी चिंताएं और क्रोध बढ़ता जाता है। उन्हें शांति नहीं मिलती।"* यदि आप शांति चाहते हों, तो उसका उपाय है, कि *"अधिक इच्छाएं न रखें। अपनी इच्छाओं को यथासंभव यथाशक्ति घटाएं। अपने मन में कम से कम इच्छाएं रखें। उनमें से जो इच्छाएं पूरी हो जाएंगी, वे आपको सुख देंगी। और जो पूरी नहीं हो सकती, उन्हें छोड़ दीजिए।" "वे इच्छाएं छोड़ देने पर आपका दुख चिंता क्रोध आदि सब समस्याएं हल हो जाएंगी। इससे आप स्वस्थ एवं प्रसन्न रहेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓ #❤️जीवन की सीख
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - बहुत अधिक इच्छाएं रखना , चिंता एवं क्रोध को बढ़ाता है। $ इसलिए इच्छाएं तो रखें, परंतु सीभित रखें। इससे आप स्वस्थ एवं प्रसन्न रहेंगे। व्सुविचारर ওতো ক্ষা 03 T स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyog org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय बहुत अधिक इच्छाएं रखना , चिंता एवं क्रोध को बढ़ाता है। $ इसलिए इच्छाएं तो रखें, परंतु सीभित रखें। इससे आप स्वस्थ एवं प्रसन्न रहेंगे। व्सुविचारर ওতো ক্ষা 03 T स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyog org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय - ShareChat
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - परमात्मा से योग लगाएं। योग की अग्नि में - तकलीफ देने वाले संस्कार, गलत आदतें , दुःख देने वाली यादें, पकड़ी हुई बातें , पुरानी अधूरी इच्छाएं सबकी होलिंका जलाएं। परमात्मा से योग लगाएं। योग की अग्नि में - तकलीफ देने वाले संस्कार, गलत आदतें , दुःख देने वाली यादें, पकड़ी हुई बातें , पुरानी अधूरी इच्छाएं सबकी होलिंका जलाएं। - ShareChat
2.3.2026 छोटे न्यायालय के निर्णय को उच्च या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, कि वह निर्णय ठीक नहीं हुआ, और सही निर्णय यह है। जैसे सांसारिक न्यायालय में यह व्यवस्था चलती है। ऐसे ही यह भी समझना चाहिए कि *"सांसारिक सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर एक और ऊंचा न्यायालय है, जो ईश्वर का है। वह उच्चतम न्यायालय है। वह अंतिम न्यायालय है। वहां जो निर्णय होता है, वह सदा सही ही होता है। क्योंकि वहां का न्यायाधीश स्वयं ईश्वर है।"* *"ईश्वर सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान और पूर्ण न्यायकारी पक्षपात रहित न्यायाधीश है। इसलिए वहां कभी अन्याय नहीं होता। उसका न्याय सबको स्वीकार करना ही पड़ता है।" "चाहे कोई यहां का राजा हो, या किसी अन्य देश का राजा हो, या किसी भी सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो, ईश्वर उससे भी बड़ा न्यायाधीश है।"* *"तो जैसे सर्वोच्च न्यायालय के सामने छोटे न्यायालय का निर्णय नहीं चलता। ऐसे ही ईश्वर के उच्चतम न्यायालय के सामने किसी भी मनुष्य राजा या न्यायाधीश का निर्णय नहीं चलता। अंतिम निर्णय ईश्वर का ही मान्य होता है।" "इसलिए ईश्वर के संविधान का ज्ञान अवश्य करें। उसके नियमों का पालन अवश्य करें। यदि आप ईश्वर के संविधान का पालन नहीं करेंगे, तो वह पक्षपात रहित ईश्वर अपने न्याय नियमों के अनुसार आपका भी न्याय कर देगा, और तब उसके न्यायालय में आपको भारी दंड भोगना पड़ेगा।"* *"ईश्वर का संविधान चार वेदों में लिखा है। फिर ऋषियों ने वेदों को पढ़कर अपने ग्रंथों में उसे और सरल भाषा में समझाया है। अतः यदि आप वेदों को पढ़ें या ऋषियों के ग्रंथों को पढ़ें, तो आपको ईश्वर का संविधान ठीक-ठाक समझ में आ सकता है। फिर आप उसका पालन कर सकते हैं, और सुखी जीवन जी सकते हैं। तथा ईश्वर के दंड से भी बच सकते हैं।"* कहने का सार यह हुआ कि *"या तो ईश्वर के संविधान का पालन कर लें, तब तो ईश्वर आपको सुख देगा। अन्यथा ईश्वर के न्यायालय से भारी दंड भोगने की तैयारी कर लें।" "आपके सामने ये दो रास्ते हैं। इनमें से जो आपको अच्छा लगे, उस पर चलें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - 0 ওত ಹL स्सुविचाव एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान , 02 मार्च सृष्टिकर्ता, न्यायकारी, आनन्दस्वरूप परमात्मा ही इस संसार का पहले भी राजा था, आज भी वही है और आगे भी वही रहेगा। इसलिए उसके अनुशासन में चलें। अन्यथा दंड भोगने की Tumtril 57- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyogorg निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय 0 ওত ಹL स्सुविचाव एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान , 02 मार्च सृष्टिकर्ता, न्यायकारी, आनन्दस्वरूप परमात्मा ही इस संसार का पहले भी राजा था, आज भी वही है और आगे भी वही रहेगा। इसलिए उसके अनुशासन में चलें। अन्यथा दंड भोगने की Tumtril 57- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https lldarshanyogorg निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय - ShareChat
1.3.2026 मनुष्य, जो 'प्राणी' कहलाता है, वह न तो केवल शरीर है, और न केवल आत्मा; बल्कि वह इन दोनों का समुदाय है। *"यद्यपि शरीर और आत्मा दोनों अलग-अलग पदार्थ हैं। शरीर जड़ है, और आत्मा चेतन। परंतु ये दोनों अकेले-अकेले कुछ नहीं कर पाते। दोनों को एक दूसरे की सहायता की आवश्यकता होती है।"* इन दोनों में मुख्य तत्व तो आत्मा है, शरीर उसका साधन है। *"शरीर की सहायता से आत्मा कर्म करता है, और अपने कर्मों का फल भोगता है। जब आत्मा शरीर में होता है, तब वह 'प्राणी' कहलाता है, मनुष्य पशु पक्षी इत्यादि।"* जब मनुष्य प्राणी कार्य करता है, तो उसे दोनों प्रकार की थकान होती है, शरीर की भी और आत्मा की भी। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए विश्राम तथा दोनों प्रकार का भोजन चाहिए। *"शरीर के लिए दाल रोटी सब्जी इत्यादि। तथा आत्मा के लिए ज्ञान विज्ञान एवं सुख या आनन्द। जब यह दोनों प्रकार का भोजन मिलता है, तभी दोनों स्वस्थ रह सकते हैं।"* तो मनुष्य को अपना जीवन सफल बनाने के लिए दोनों को स्वस्थ रखना आवश्यक है। *"शरीर के स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन थोड़ा व्यायाम करना चाहिए। शाकाहारी भोजन करना चाहिए, और उचित मात्रा में अर्थात 6/7 घंटे विश्राम करना चाहिए।"* *"आत्मा को स्वस्थ बनाए रखने के लिए वेदों का अध्ययन करना चाहिए। जिससे उसे शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हो। और ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, जिससे कि उसे सुख या आनन्द मिल सके।"* *"जो व्यक्ति इस प्रकार से अपना जीवन जीता है, वह शरीर और आत्मा दोनों तरह से स्वस्थ रहता है, और वही व्यक्ति सुखी होता है।"* *"आप भी यदि सुखी होना चाहते हों, तो ऊपर बताई बातों का पालन करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🤗जया किशोरी जी🕉️ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🤗जया किशोरी जी🕉️ - मनुष्य, आत्मा और शरीर दोनों को मिलाकर कहलाता है | दोनों को स्वस्थ रखना आवश्यक है | आत्मा की स्वस्थता के लिए वेदों का अध्ययन और ईश्वर का ध्यान करना चाहिए | शरीर को स्वस्थ रखने के लिए थोड़ा व्यायाम , शाकाहारी भोजन और उचित विश्राम करना चाहिए | स्सुविचावर अज का 01 मार्च स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https:Ildarshanyog.org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय मनुष्य, आत्मा और शरीर दोनों को मिलाकर कहलाता है | दोनों को स्वस्थ रखना आवश्यक है | आत्मा की स्वस्थता के लिए वेदों का अध्ययन और ईश्वर का ध्यान करना चाहिए | शरीर को स्वस्थ रखने के लिए थोड़ा व्यायाम , शाकाहारी भोजन और उचित विश्राम करना चाहिए | स्सुविचावर अज का 01 मार्च स्वामी विवेकानंद परिव्राजक https:Ildarshanyog.org निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय - ShareChat
इतिहास गवाह है, जब-जब किसी ने अंधकार के खिलाफ चिराग जलाने की कोशिश की, हवाओं ने उसे बुझाने का नहीं, बल्कि चिराग को ही तोड़ देने का हुक्म जारी किया। गाजियाबाद के लोनी में सलीम पर हुए वार दरअसल उस 'डर' की नुमाइश हैं, जो एक अकेले निहत्थे शख्स के सवालों से पैदा हुआ था। कितना आसान है न? अगर कोई आपके अकीदे, आपकी मान्यताओं या आपकी किताबों पर सवाल उठाए, तो दिमाग पर जोर मत डालिए। तर्क मत ढूंढिए, इतिहास मत खंगालिए। बस एक लंबा चाकू उठाइए और उस सवाल को 'खामोश' कर दीजिए। क्योंकि ज़वाब देने के लिए 'इल्म' (ज्ञान) चाहिए होता है, और हमला करने के लिए सिर्फ 'जहालत' (अज्ञानता)। कट्टरपंथी सोच की सबसे बड़ी नाकामी यही है कि वे 'इंसान' को मारना जानते हैं, 'विचार' को नहीं। उन्होंने सलीम के सीने पर वार किया, यह सोचकर कि आवाज़ बंद हो जाएगी। लेकिन बेवकूफों को यह नहीं पता कि खून की हर बूंद से अब नए सवाल पैदा होंगे। तुमने गला रेता: ताकि वह बोल न सके। तुमने सीने पर वार किया: ताकि वह सोच न सके। मगर नतीजा? अब वह एक व्यक्ति नहीं, एक विस्फोटक सवाल बनकर हर उस गली में गूंजेगा जहाँ तुमने सच को दफनाने की कोशिश की है। इतिहास के पन्नों में ऐसे लाखों सलीम दर्ज हैं जिन्हें तुमने 'कुफ्र' या 'गुस्ताखी' के नाम पर मिटा दिया। लेकिन विडंबना देखो, सदियां बीत गईं, तुम आज भी वहीं खड़े हो—अपने हाथों में खून सने खंजर लिए और चेहरे पर वही पुराना खौफ। तुम्हारी जीत तभी होती जब तुम उसके सवालों का जवाब देकर उसे निरुत्तर करते। उसे मारकर तुमने दुनिया को बता दिया कि तुम्हारे पास सत्य नहीं, सिर्फ शक्ति का घमंड है। सलीम भाई को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके उठाए गए सवालों को दबने न दिया जाए। जो सवाल उन्होंने सोशल मीडिया पर छोड़े, वे अब करोड़ों स्क्रीन पर चमकेंगे। "तुम कितने सलीम मारोगे? हर घर से सवाल निकलेगा!" अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब सिर्फ तालियां सुनना नहीं है, बल्कि 'कड़वे सच' और 'आलोचना' को बर्दाश्त करने की हिम्मत रखना भी है। अगर कानून इन दरिंदों को सबक नहीं सिखाता, तो यह समझा जाएगा कि लोकतंत्र में 'स्याही' की कीमत 'खून' से कम है। #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
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28.2.2026 व्यक्ति की उन्नति अथवा पतन के अनेक कारण हैं। जिनमें से पांच मुख्य हैं। वे इस प्रकार से हैं। पहला कारण -- *"प्रत्येक व्यक्ति के पूर्व जन्मों के अच्छे बुरे संस्कार होते हैं। यदि उसके पूर्व जन्मों के संस्कार अच्छे होंगे, तो उस व्यक्ति की उन्नति अच्छी होगी। और यदि उसके संस्कार बुरे होंगे, तो उसका पतन होगा।"* दूसरा कारण -- *"वह इस जन्म में कैसा पुरुषार्थ करता है, इस पर आधारित है, कि उसकी उन्नति होगी या पतन होगा।"* तीसरा कारण है -- *"माता द्वारा दिए गए संस्कार। जिस बच्चे को माता अच्छे संस्कार देती है। उसको प्रेम पूर्वक सिखाती समझाती है, तर्क और बुद्धि से सब बातों का प्रशिक्षण देती है, उस पर अनेक वर्षों तक समय लगाकर तपस्या करती है। उस व्यक्ति का विकास अच्छा होता है। जैसे माता कौशल्या जी ने श्री रामचंद्र जी महाराज को अच्छे संस्कार दिए।" "जो माता ऐसा नहीं करती, उसके बच्चे का विकास अच्छा नहीं हो पाता। जैसे आजकल की बहुत सी माताएं बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दे पा रही। वे अपनी नौकरी व्यापार करने खाने-पीने फैशन और भोग विलास में लगी हुई हैं। इसलिए उनके बच्चे अच्छे नहीं बन पा रहे।"* इसी प्रकार से चौथा कारण है -- *"बच्चे का पिता। माता के समान पिता भी यदि बच्चे को अच्छे संस्कार अच्छा प्रशिक्षण देता है। अच्छाई की ओर प्रेरित करता है, बुराई से बचाता है, और उसकी सब उचित इच्छाएं पूरी करता है, अनुचित नहीं। तो उस व्यक्ति या बच्चे का विकास अच्छा होता है अन्यथा नहीं।"* और पांचवा मुख्य कारण है -- *"बच्चों के गुरु आचार्य शिक्षक अध्यापक उपदेशक। यदि वे बच्चे को अच्छा बनाते हैं, उस पर परिश्रम करते हैं। तो बच्चा अच्छा बन सकता है।" "और यदि अध्यापक शिक्षक लोग उस पर पुरुषार्थ नहीं करते, और बस किताब पढ़ाकर छोड़ देते हैं, उसके चरित्र का विकास नहीं करते, तो उस व्यक्ति का भी विकास ठीक से नहीं हो पाएगा।"* *"इस प्रकार से मनुष्य की उन्नति होने के लिए ये पांच बड़े-बड़े कारण हैं।" "यदि ये किसी व्यक्ति को अच्छे मिल जाएं, अनुकूल हों, तो उसकी उन्नति बहुत अच्छी होगी। और यदि ये पांच मुख्य कारण उसके प्रतिकूल हों, तो उसका पतन हो जाएगा, उसकी उन्नति होना बहुत कठिन है। कुछ अन्य गौण कारण भी हैं उनकी चर्चा फिर कभी करेंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - ब्सुविचाव अज का २८ फरवरी आपकी उन्नति अथवा पतन के qiage कारण ये हैं। आपके पिछले जन्मों के संस्कार। इस जन्म में आप द्वारा किया गया पुरुषार्थ। आपके माता पिता और आचार्य द्वारा आपको दिया गया प्रशिक्षण। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https :lldarshanyog org ब्सुविचाव अज का २८ फरवरी आपकी उन्नति अथवा पतन के qiage कारण ये हैं। आपके पिछले जन्मों के संस्कार। इस जन्म में आप द्वारा किया गया पुरुषार्थ। आपके माता पिता और आचार्य द्वारा आपको दिया गया प्रशिक्षण। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https :lldarshanyog org - ShareChat
27.2.2026 *"व्यक्ति दिन भर या तो संसार से प्रभावित रहता है या ईश्वर से।"* *"यदि वह संसार से प्रभावित रहता है, तो वह संसार के लोगों की नकल करता है, अर्थात झूठ छल कपट हेरा फेरी आदि बुरे काम करता रहता है। कुछ अच्छे काम भी करता है। परन्तु बुरे काम करने के कारण वह पूरी तरह से निर्भय होकर अपना जीवन नहीं जी पाता।"* *"जब वह अच्छे काम करता है, तो उसको ईश्वर अंदर से आनंद उत्साह निर्भयता की अनुभूति उत्पन्न करता है। और जब वह बुरे काम करता है तो भय शंका लज्जा चिंता तनाव इत्यादि ऐसी अनुभूतियां उत्पन्न करता है।"* *"दूसरे पक्ष में, जो व्यक्ति ईश्वर से प्रभावित रहता है, सारा दिन ईश्वर को साक्षी मानकर काम करता है, उसके सब काम अच्छे होते हैं। वह बुरे काम नहीं कर सकता। जैसे पुलिस के सिपाही की उपस्थिति में व्यक्ति कोई गलत काम नहीं करता। ऐसे ही उसे ईश्वर पुलिस मैन की तरह दिखता है। इसलिए वह कोई बुरा काम नहीं करता। उस को संसार का राग द्वेष छू नहीं सकता। वह सदा उत्साहित प्रसन्न निश्चिंत तनाव मुक्त और निर्भय होकर अपना जीवन जीता है। यही जीवन वास्तविक जीवन है। सबको ऐसा प्रयास करना चाहिए। अन्यथा पाप कर्मों से बचना असंभव है।"* *"जो व्यक्ति ऊपर बताया गया उत्तम पुरुषार्थ करेगा, उसको ऊपर बताए प्रसन्नता निश्चिंतता तनाव मुक्ति आदि फल मिलेंगे। जो व्यक्ति पुरुषार्थ नहीं करेगा, उसको नहीं मिलेंगे।"* *"अब आप देखिए आपको दो में से कौन सा रास्ता पसंद है। जो पसंद हो, उस पर चलिए।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏कर्म क्या है❓
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - aaaa 3[[0[ at २७ फरवरी  यदि 311q मानकर साक्षी ईश्वर को करेंगे, कार्य सब संसार का आपको নী द्वेष छू नठीं  पाएगा 7T য ক্র্মী पाप अन्यथा %| असंभव बचना स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org aaaa 3[[0[ at २७ फरवरी  यदि 311q मानकर साक्षी ईश्वर को करेंगे, कार्य सब संसार का आपको নী द्वेष छू नठीं  पाएगा 7T য ক্র্মী पाप अन्यथा %| असंभव बचना स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https:lldarshanyog org - ShareChat
26.2.2026 व्यक्ति अपने जीवन में सफल भी होता है और असफल भी। उसकी असफलता के कुछ कारण हैं, जिनमें से मुख्य कारण ये हैं। *"कान का कच्चा होना अर्थात ऐसे ही इधर-उधर से अप्रामाणिक बातों को सुनकर उन्हें सत्य मान लेना। यह उसकी असफलता का एक बहुत बड़ा कारण है।"* दूसरा कारण है *"शंकालु दृष्टि।"* वह हर व्यक्ति पर बिना कारण शंका करता है, और प्रमाणों से सिद्ध बात को भी स्वीकार नहीं करता। *"ऐसे व्यर्थ में किसी पर भी शंका करना भी असफलता का एक बड़ा कारण है।"* असफलता का तीसरा कारण है, *"गंभीरता से विचार किये बिना जल्दबाजी में कोई भी निर्णय ले लेना।"* *"इन कारणों से व्यक्ति अपने जीवन में अनेक क्षेत्रों में बार-बार असफल होता रहता है। अंत में वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है, और फिर उसका जीवन नष्ट हो जाता है। अतः ऐसे कार्य न करें।"* जीवन में सफल होने के लिए कुछ मुख्य कारण इस प्रकार से हैं। *"दूरदर्शिता से विचार करना। स्थिर बुद्धि से चिंतन करना। निर्णय लेने में कभी भी जल्दबाजी नहीं करना। प्रमाणों से परीक्षा करके ही कोई बात स्वीकार करना। तथा प्रमाणों के आधार पर गंभीरता से विचार करके ही सारे निर्णय लेना।"* *"जो व्यक्ति इस प्रकार से अपना जीवन जिएगा, उसे जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."* #🙏कर्म क्या है❓ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
🙏कर्म क्या है❓ - FAILURE থাঁকালত और बिना पूरा विचार किये कच्चे कान, & शीघ्र निर्णय लेना, असफलता के कारण हैंl दूरदर्शिता , स्थिर बुद्धि और प्रमाणपूर्वक विचार करके सही निर्णय लेना , सफलता के कारण हैं। feate अज का २६ फरवरी  स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https Idarshanyog.org FAILURE থাঁকালত और बिना पूरा विचार किये कच्चे कान, & शीघ्र निर्णय लेना, असफलता के कारण हैंl दूरदर्शिता , स्थिर बुद्धि और प्रमाणपूर्वक विचार करके सही निर्णय लेना , सफलता के कारण हैं। feate अज का २६ फरवरी  स्वामी विवेकानंद परिव्राजक निदेशक , दर्शन योग महाविद्यालय https Idarshanyog.org - ShareChat