Bidesh Mishra
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#📙वेदों का ज्ञान #jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram #👏भगवान विष्णु की अद्भुत लीला😇 #🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙
📙वेदों का ज्ञान - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। १ II भावार्थःश्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il १ II ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। १ II भावार्थःश्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il १ II - ShareChat
#🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 #👏भगवान विष्णु की अद्भुत लीला😇 #jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram #📙वेदों का ज्ञान
🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड 35 অয্র ৪ী মীনাহাম पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि সীনী |l कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज नयन कमल कल FಹTll4Il भावार्थः पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊ की तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरों पर मणि और मोती लगे हैं। कमल के समान सुंदर नेत्र हैं, कानों में सुंदर कुंडल हैं और मुख तो सारी सुंदरता का खजाना ही ೯Il4Il নিলব্ত रुचिरता सुंदर मनोहर नासा। भाल भृकुटि निवासा।। सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि TTTబtII5II भावार्थः सुंदर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाट पर तिलक तो  सुंदरता घर ही है॰ जिसमें का मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं ऐसा मनोहर मौर माथे पर सोह रहा हैII५II राधेकृष्ण ऊँ जय श्री ऊँ जय श्री लक्ष्मीनारायण ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड 35 অয্র ৪ী মীনাহাম पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि সীনী |l कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज नयन कमल कल FಹTll4Il भावार्थः पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊ की तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरों पर मणि और मोती लगे हैं। कमल के समान सुंदर नेत्र हैं, कानों में सुंदर कुंडल हैं और मुख तो सारी सुंदरता का खजाना ही ೯Il4Il নিলব্ত रुचिरता सुंदर मनोहर नासा। भाल भृकुटि निवासा।। सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि TTTబtII5II भावार्थः सुंदर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाट पर तिलक तो  सुंदरता घर ही है॰ जिसमें का मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं ऐसा मनोहर मौर माथे पर सोह रहा हैII५II राधेकृष्ण ऊँ जय श्री ऊँ जय श्री लक्ष्मीनारायण - ShareChat
#📙वेदों का ज्ञान #jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram #👏भगवान विष्णु की अद्भुत लीला😇 #🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙
📙वेदों का ज्ञान - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बाल रबि दामिनि पीत मनोहर धोती। हरति पुनीत তীনী Il कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। I5 fHH बिभूषन सुंदरII२ II भावार्थः पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कटिसूत्र कमर में सुंदर किंकिणी और विशाल 81  में सुंदर आभूषण सुशोभित हैं Il२ II भुजाओं पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।I सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन <சII3 II भावार्थःपीला जनेऊ महान शोभा दे रहा है। हाथ की अँगूठी चित्त को चुरा लेती है। ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छाती पर हृदय के सुंदर आभूषण सुशोभित हैं II३ II পক্নন पर पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोतीIl राधेकृष्ण ऊँ जयःश्री ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बाल रबि दामिनि पीत मनोहर धोती। हरति पुनीत তীনী Il कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। I5 fHH बिभूषन सुंदरII२ II भावार्थः पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कटिसूत्र कमर में सुंदर किंकिणी और विशाल 81  में सुंदर आभूषण सुशोभित हैं Il२ II भुजाओं पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।I सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन <சII3 II भावार्थःपीला जनेऊ महान शोभा दे रहा है। हाथ की अँगूठी चित्त को चुरा लेती है। ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छाती पर हृदय के सुंदर आभूषण सुशोभित हैं II३ II পক্নন पर पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोतीIl राधेकृष्ण ऊँ जयःश्री - ShareChat
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🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। १ II भावार्थःश्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il १ II ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।। १ II भावार्थःश्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il १ II - ShareChat
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📙वेदों का ज्ञान - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम दोहा पुनि पुनि रामहि चितव सिय #3 =$4 সক্তবনি न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।३२६ ।। भावार्थः सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छबि को हर <881|326 1| मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम दोहा पुनि पुनि रामहि चितव सिय #3 =$4 সক্তবনি न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।३२६ ।। भावार्थः सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छबि को हर <881|326 1| मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम - ShareChat
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🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ दूलह #II4Il भावार्थः ्देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनंद छा रहा है), तब मुनीश्वर सखियाँ मंगलगान करती हुई की आज्ञा पाकर सुंदरी  दुलहिनों   सहित को लिवाकर कोहबर को বুক্কী चलीं II४ II ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ दूलह #II4Il भावार्थः ्देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनंद छा रहा है), तब मुनीश्वर सखियाँ मंगलगान करती हुई की आज्ञा पाकर सुंदरी  दुलहिनों   सहित को लिवाकर कोहबर को বুক্কী चलीं II४ II - ShareChat
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📙वेदों का ज्ञान - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड 3ঁ অয্র ৪ী মীনাহাম ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।। पुनि भानुकुलभूषन সব্ধল সনমান নিখি সমধী किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।। 3|| भावार्थः ्इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नई-्नई कीजिएगा। मैंने बड़ी ढिठाई की दया करके पालन भेजा, कि आपको 461 अपराध क्षमा बुला कीजिएगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को सम्पूर्ण सम्मान का निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि॰वे सम्मान के भंडार ही हो गए)। उनकी परस्पर की विनय कही नहीं प्रेम से परिपूर्ण हैं II३ II के हृदय  जाती, दोनों ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड 3ঁ অয্র ৪ী মীনাহাম ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई। अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई।। पुनि भानुकुलभूषन সব্ধল সনমান নিখি সমধী किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।। 3|| भावार्थः ्इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नई-्नई कीजिएगा। मैंने बड़ी ढिठाई की दया करके पालन भेजा, कि आपको 461 अपराध क्षमा बुला कीजिएगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को सम्पूर्ण सम्मान का निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि॰वे सम्मान के भंडार ही हो गए)। उनकी परस्पर की विनय कही नहीं प्रेम से परिपूर्ण हैं II३ II के हृदय  जाती, दोनों - ShareChat
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🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत ಸ೯' ಖTII1 Il भावार्थः्श्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il 1 II নাল ২নি মামিনি पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति जोती।। कल किंकिनि कटि मनोहर। बाहु बिसाल 27 बिभूषन सुंदर।I२ II भावार्थः पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कटिसूत्र कमर में सुंदर किंकिणी और हैं। विशाल आभूषण सुशोभित हैं Il२ में सुंदर 307317 राधेकृष्ण ತ ೯ೌ 91 ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम चौपाई सुहावन। सोभा कोटि मनोज स्याम सरीरु सुभायँ लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत ಸ೯' ಖTII1 Il भावार्थः्श्री रामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुंदर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को लजाने वाली है। महावर से युक्त चरण कमल बड़े लगते हैं, जिन पर मुनियों के मन रूपी भौंरे सुहावने सदा छाए रहते हैं Il 1 II নাল ২নি মামিনি पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति जोती।। कल किंकिनि कटि मनोहर। बाहु बिसाल 27 बिभूषन सुंदर।I२ II भावार्थः पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कटिसूत्र कमर में सुंदर किंकिणी और हैं। विशाल आभूषण सुशोभित हैं Il२ में सुंदर 307317 राधेकृष्ण ತ ೯ೌ 91 - ShareChat
#📙वेदों का ज्ञान #jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram jai shree ram #👏भगवान विष्णु की अद्भुत लीला😇 #🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙
📙वेदों का ज्ञान - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम दोहा पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै 71 हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।३२६ ।। भावार्थः सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छबि को हर z೯ ೯Il326 Il मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम दोहा पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै 71 हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन।।३२६ ।। भावार्थः सीताजी बार-बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छबि को हर z೯ ೯Il326 Il मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम - ShareChat
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🙏भगवान विष्णु की कथाएं📙 - ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत आयसु पाइ कै। मुनीस दूलह दुलहिनिन्ह सहित चलीं कोहबर ल्याइ सुंदरि II4II भावार्थः ्देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनंद छा रहा है), तब मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई सहित को लिवाकर कोहबर को दुलहिनों दूल्हों चलीं II४ II ऊँ श्री रामचरितमानस बालकाण्ड ऊँ जय श्री सीताराम बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले। दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत आयसु पाइ कै। मुनीस दूलह दुलहिनिन्ह सहित चलीं कोहबर ल्याइ सुंदरि II4II भावार्थः ्देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनंद छा रहा है), तब मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई सहित को लिवाकर कोहबर को दुलहिनों दूल्हों चलीं II४ II - ShareChat