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#सनातन संस्कार (वसुधैव-कुटुंबकम)
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10 दिन पहले
वसुधैव-कुटुंबकम संपूर्ण धरा एक घर-संपूर्ण जीव एक परिवार! यही तो है भारत-दर्शन! यदि इस स्लोगन की तह तक जाया जाए तो इसमे अनंत ब्रह्मांड की तरह ही अनंत अध्यात्मिक जगत के भीतर नीहित विस्तृत विज्ञान की जटिलताओं का सहज-सरल-स्वच्छ लेकिन पारदर्शी गुफाओं का वृहद जाल दृश्यमान होता है ! जो बाहर से अलग-अलग किंतु अंदर से एकाण्वित है ! अर्थात मूल रूप से एक अणु पर केंद्रित है ! जो कि एक परमाणु मात्र के परिवर्तन से अपना स्वरूप बदलने मे निरंतर तत्पर है ! जल चक्र, खाद्य चक्र एवं जीवन चक्र जैसे अनंत अज्ञात पारिस्थितिकीय तंत्र एक-दूसरे को संतुलन प्रदान करते हैं तब जाकर कहीं हमारी पृथ्वी पर सृष्टि आकार लेती है ! हमारे पूर्वजों ने जब अपने संपूर्ण अनुसंधानों और अध्ययनों को मिलाकर एक निष्कर्ष निकाला तो जो सूत्र निकला वह 'वसुधैव-कुटुंबकम' है ! आज समूचे विश्व मे अनगिनत विद्यालय एवं विश्व विद्यालय संचालन मे हैं लेकिन उनकी शिक्षा हर बार सिर्फ अशांति और युद्ध का प्रारूप तैयार करती है ! क्योंकि इसमे सिर्फ अज्ञान है विज्ञान नहीं ! लेकिन हमारा भारतवर्ष लाखों वर्षों से सिर्फ इसीलिए सिमटता रहा है कि हमारे पास सनातन का विज्ञान है ! हम सृष्टि और जीवन का महत्व भलिभांति जानते हैं इसलिए हम हिंसा के अतिरिक्त विचार करते हैं ! और इसीलिए हमारे पास त्यौहारों का गुलदस्ता है ! जिसके अलग-अलग फूलों की महक जीवन की सुंदरता से मानवता का मिलाप कराती है ! निश्चय ही विश्व जगत को भारतीयों से जीवन जीना सीखना चाहिए! आज भारत-दर्शन ही समस्त संसारवासियों की प्रथम आवश्यक्ता है !
#सनातन संस्कार (वसुधैव-कुटुंबकम)
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11 दिन पहले
यात्रि-गण कृप्या ध्यान दें, किसी यात्रा के लिए निकलने से पूर्व अपने प्रत्येक बैग मे अपना पता लिखित पर्चा अवश्य डालकर रखें ! साथ ही एक निवेदन भी कि यदि यह सामान आप जाने-अन्जाने अपने साथ ले जा रहे हैं तो अवसर मिलने पर अथवा आपकी आवश्यक्ता पूर्ण होने के उपरांत स्वेच्छापूर्वक अपनी पहचान के साथ अथवा पहचान छिपाकर किसी भी माध्यम से उपरोक्त पते पर भेज दें ! हम सपरिवार सदैव आपके आभारी रहेंगे ! आज के समय मे हालात कभी भी किसी को अनैच्छिक कार्य करने के लिए विवश कर सकते हैं इस बात को समझना हमारे लिए मुश्किल नहीं है ! अतः बिना किसी संकोच अथवा डर के हमारी वस्तु लौटाकर अथवा उसकी कीमत अदाकर आप गर्व एवं संतोष की अनुभूति कर सकते हैं व आत्म-ग्लानि की भावना से बच सकते हैं साथ ही हम भी पीड़ा और संकट की अल्पकालिक स्थिति से बाहर आ सकते हैं ! हमें प्रत्येक व्यक्ति के परिश्रम का एवं हालात का सम्मान करना आना चाहिए! हो सकता है कि इस समय मे मै भी कठिन परिस्थितियों मे घिरा होऊं और आप इससे अंजान हों ! और हम एक दूसरे की विवशताओं को समझें और एक-दूसरे के काम आएं यही तो मनुष्यता है ! है न !?? आपका सहयात्री 🙏🙏 पता
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