संत कबीरदास जी अनुयाई ।
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संत कबीरदास जी अनुयाई ।
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मनुष्य जन्म नही मिलता है बारंबार ।
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : #🙏 भक्ति : https://youtu.be/RcupggmgT_A?si=_4f7mT3OsYfUIDBe
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#❤️जीवन की सीख : #🙏सुविचार📿 : #✍️ जीवन में बदलाव : --- बुरा बनना बहुत आसान है । अच्छा बनना बहुत मुश्किल है । बुरा बनना बिल्कुल फूलों के चादर पर चलने जैसा है । अच्छा बनना बिल्कुल कांटों की सड़क पर चलने जैसा है । हमे जीवन में किस रास्ते पर चलना है इस का फैसला हमे करना रहता है । हो सके तो अच्छे रास्ते पर चले । नियम का पालन करे । कुछ भी हो जाय – गुस्सा क्रोध हिंसा नहीं करना है । चाहे जान चले जाय तो चले जाय । हो सके तो बुरे रास्ते पर नही चलना है । नियम को नही तोड़ना है । कुछ भी हो जाय – गुस्सा क्रोध हिंसा लालच नही करना है । चाहे भूखा प्यासा ही क्यों न मरना पड़े । केवल मेहनत कर के खाना है । परजीवी/पर-आश्रित बन कर नही । अपने हाथो से मजदूरी करनी है और फिर अनाज खाना है । इसके अलावा चोरी मक्कारी धोखा छल कपट कर के भोजन खाना और पानी पीना भी अच्छी बात नही है । अच्छा बनने की कोशिश करें और बीरा बनने की नही । सुझाव : आप से जो उम्र में कम है और उनकी बातो पर अधिक ध्यान मत दीजिए । वह सब कुछ गलत ज्ञान लेकर बैठे हुए है । वह हमे भी गलत रास्ते पर ले कर चले जाएंगे । तो अपने से उम्र में छोटे आयु के इंसान की बात न सुने । उम्र से आयु में छोटे इंसान को केवल और केवल बड़ो का आज्ञाकारी होना चाहिए और कुछ नही । जो आज्ञाकारी नही है वह चोरी मक्कारी धोखेबाजी छल कपट कर रहा है । हमे इस देश को चोरों का देश । मक्कारो का देश । धोकेबाजो का देश । छल कपट करने वालो का देश । बईमानी करने वालो का देश । बनने नही देना है । बचपन से हर दिन एक बच्चे के जब सही गलत के बीच का अंतर बताया जाय तो वह वयस्क होने तक सब सीख जाता है । पहले खुद अच्छे बने और सच्चे ईमानदार मेहनती आज्ञाकारी बने । और फिर अपने आने वाले पीढियों को सच्चा ईमानदार मेहनती आज्ञाकारी बनाय । हम भारतीय इंसान को केवल ब्राह्मण धर्म के नियम का पालन करना चाहिए । ब्राह्मण के गुरु हैं परमपिता परमात्मा संत कबीरदास जी है । ब्राह्मण को परमपिता परमात्मा संत कबीरदास की आज्ञा का पालन करना चाहिए । ब्रह्मा जी ने अपने गुरु परमपिता परमात्मा संत कबीरदास जी की बात नही मानी और रास्ते से भटक गए । जो रास्ते से भटक जाता है । उस से पैसा अनाज पानी दूर चले जाते है । अगर आपको समझना है की आप सही रास्ते पर चल रहे है य नही तो इसका फैसला इस मापदंड से करें की आपके पास जरुरत से ज्यादा नही मगर जरूरत के अनुसार अनाज पैसा पानी है य नही है । अगर इन में से थोड़ी सी भी कमी है आपके पास तो आप गलत रास्ते पर चल रहे है । अब या तो चोरी कीजिए । धोखा कीजिए । छल कपट कीजिए । मक्कारी कीजिए । झूठ बोलिए । परजीवी/पर-आश्रित बनिए । जैसे भी अनाज पानी और पैसे को पाने की कोशिश कर सकते है कीजिए । मरना ऐसे जीवन के जीने से ज्यादा बेहतर है । अगर हो सके तो । और अगर न हो सके तो हम चोरी मक्कारी छल कपट बेईमानी कर सकते है । "या" मन से ईश्वर को याद करते करते भूखे प्यासे मर सकते है । मरना तो एक दिन है ही । मेरा सुझाव है कि आज से ही ईश्वर को याद करना शुरू कर देना चाहिए भले कल भूखा और प्यासा ही क्यों न मरना पड़े । आज जब हमे भूखा प्यासा नही रहना पड़ रहा है तब ही ईश्वर को याद कर लेना बेहतर है कि जब कल जब हम भूखे प्यासे मर रहे होंगे तब हम ईश्वर को मन से याद करते हुए मर जाय । ---
#❤️जीवन की सीख : #🙏सुविचार📿 : #✍️ जीवन में बदलाव : --- धार्मिक आदेश : ( मैं धार्मिक पंथ – भक्ति पंथ से जुड़ा हुआ व्यक्ति हूं ) ( भारत देश में हम सब भारतीय धार्मिक इंसान ही है । ऐसा हम सब का मानना है । धर्म का पालन करना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है । ऐसा हमारी मान्यता है । अगर ऐसी ही बात है तो । तो मेरी बात मानना भी एक धार्मिक आदेश ही है । ) --- आज्ञा न मानना एक पाप है। आइए इसे समझते हैं। अगर किसी ने हमें कोई काम न करने को कहा है, तो हमें उसी समय वह काम बंद कर देना चाहिए। कोई सवाल नहीं करना चाहिए। अगर एक भी व्यक्ति कह दे कि यह काम अच्छा नहीं है और इसे रोक देना चाहिए, तो हमें उसे फिर कभी नहीं करना चाहिए। यही अनुशासन और आज्ञाकारिता कहलाती है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम कहें – “मुझे रुकना नहीं है।” अगर कोई बड़ा कहता है कि यह काम नहीं करना चाहिए, तो इसका मतलब है कि उस काम से किसी को चोट, दुख या नुकसान हो सकता है। किसी को दुख देना, किसी को नुकसान पहुँचाना, या कोई बुरा काम करना – यह सब बुराई है। हमें बुराई का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। हमें कभी भी बुरा काम नहीं करना चाहिए। हमारे बड़े हमेशा हमारे भले के लिए ही समझाते हैं। वे चाहते हैं कि हम सुरक्षित रहें और दूसरे लोग भी सुरक्षित रहें। बड़ों की बात को गंभीरता से लेना चाहिए। उसे ऐसा समझना चाहिए जैसे वह बहुत ज़रूरी आदेश हो। इसलिए बड़ों की आज्ञा मानना बहुत ज़रूरी है। इसमें कोई छूट नहीं होनी चाहिए। यह सब सभी की सुरक्षा के लिए किया जाता है। अगर कोई आज्ञा नहीं मानेगा, तो उसे बाद में बिना मार-पीट के सज़ा दी जाएगी। इसलिए हमेशा आज्ञाकारी रहना ही बेहतर है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए। ---
#❤️जीवन की सीख : --- 21. झूठ 1. झूठ सत्य का अभाव है। 2. यह भय या स्वार्थ से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा ने झूठ को सबसे बड़ा पाप कहा है। 4. झूठ विश्वास को नष्ट करता है। 5. इससे मन में डर बना रहता है। 6. झूठा व्यक्ति शांति नहीं पाता। 7. सत्य से ही आत्मबल बढ़ता है। 8. सच्चाई में ही ईश्वर का वास है। 22. लालच 1. लालच आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा है। 2. यह संतोष के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा संतोष को धन मानते हैं। 4. लालची व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता। 5. इससे अन्याय जन्म लेता है। 6. संबंध स्वार्थ पर टिक जाते हैं। 7. लालच दुःख का कारण है। 8. संतोष ही इसका उपचार है। 23. लोभ 1. लोभ वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण है। 2. यह मन को बाँध देता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे माया का जाल कहते हैं। 4. लोभी व्यक्ति अस्थिर रहता है। 5. उसे शांति नहीं मिलती। 6. लोभ से धर्म कमजोर पड़ता है। 7. यह आत्मा को नीचे गिराता है। 8. त्याग से लोभ समाप्त होता है। 24. मोह 1. मोह आसक्ति का रूप है। 2. यह संबंधों और वस्तुओं से जुड़ाव है। 3. परमपिता परमात्मा कहते हैं मोह बंधन है। 4. इससे विवेक ढक जाता है। 5. मोह दुख का कारण बनता है। 6. व्यक्ति सत्य से दूर होता है। 7. मोह अस्थायी चीजों से होता है। 8. ज्ञान से मोह मिटता है। --- 25. तृष्णा 1. तृष्णा अंतहीन इच्छा है। 2. यह कभी पूर्ण नहीं होती। 3. परमपिता परमात्मा इसे दुख का मूल बताते हैं। 4. तृष्णा मन को चंचल रखती है। 5. इससे संतोष नहीं मिलता। 6. व्यक्ति भटकता रहता है। 7. तृष्णा जीवन को अशांत करती है। 8. संतोष और संयम से इसका अंत होता है। 26. स्वार्थ 1. स्वार्थ केवल अपने हित की सोच है। 2. यह प्रेम के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा निःस्वार्थ भक्ति का उपदेश देते हैं। 4. स्वार्थ संबंधों को कमजोर करता है। 5. इससे विश्वास घटता है। 6. समाज में दूरी बढ़ती है। 7. स्वार्थी व्यक्ति अकेला रह जाता है। 8. सेवा भाव ही इसका समाधान है। 27. ईर्ष्या 1. ईर्ष्या दूसरों की उन्नति से जलन है। 2. यह तुलना से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा समभाव का उपदेश देते हैं। 4. ईर्ष्या मन को अशांत करती है। 5. इससे द्वेष जन्म लेता है। 6. व्यक्ति सुख खो देता है। 7. ईर्ष्या आत्मा को कलुषित करती है। 8. प्रेम और संतोष से यह मिटती है। 28. आलस्य 1. आलस्य कर्म से दूरी है। 2. यह समय का अपव्यय है। 3. परमपिता परमात्मा कर्म को आवश्यक मानते हैं। 4. आलसी व्यक्ति प्रगति नहीं करता। 5. इससे अवसर चूक जाते हैं। 6. आत्मबल कमजोर होता है। 7. आलस्य आध्यात्मिक बाधा है। 8. परिश्रम ही सफलता का मार्ग है। --- 29. निंदा 1. निंदा दूसरों की बुराई करना है। 2. यह ईर्ष्या से जुड़ी होती है। 3. परमपिता परमात्मा निंदक को भी गुरु समान बताते हैं। 4. निंदा मन को दूषित करती है। 5. इससे समाज में कलह बढ़ता है। 6. निंदक स्वयं अशांत रहता है। 7. सद्विचार से निंदा दूर होती है। 8. आत्मचिंतन श्रेष्ठ है। 30. चुगली 1. चुगली गुप्त बातें फैलाना है। 2. यह संबंधों में अविश्वास लाती है। 3. परमपिता परमात्मा सच्ची वाणी पर बल देते हैं। 4. चुगली से कलह बढ़ता है। 5. व्यक्ति की विश्वसनीयता घटती है। 6. यह सामाजिक दोष है। 7. चुगली मन को अशांत करती है। 8. मौन इसका समाधान है। 31. असत्य 1. असत्य सत्य का विपरीत है। 2. यह छल और झूठ से जुड़ा है। 3. परमपिता परमात्मा सत्य को तप के समान मानते हैं। 4. असत्य से विश्वास टूटता है। 5. आत्मबल घटता है। 6. मन में भय रहता है। 7. असत्य से धर्म कमजोर होता है। 8. सत्य से ही मुक्ति मिलती है। 32. कठोर वाणी 1. कठोर वाणी हृदय को चोट पहुँचाती है। 2. यह क्रोध से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा मधुर वाणी को अनमोल बताते हैं। 4. कठोर शब्द संबंध तोड़ते हैं। 5. इससे मन दुखी होता है। 6. समाज में दूरी बढ़ती है। 7. संयम आवश्यक है। 8. मधुरता ही श्रेष्ठ मार्ग है। 33. असहिष्णुता 1. असहिष्णुता सहनशीलता का अभाव है। 2. यह अहंकार से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा धैर्य और समभाव सिखाते हैं। 4. असहिष्णु व्यक्ति क्रोधित रहता है। 5. समाज में विवाद बढ़ते हैं। 6. प्रेम समाप्त हो जाता है। 7. यह शांति को नष्ट करती है। 8. सहनशीलता ही सच्ची महानता है। ---
#❤️जीवन की सीख : --- 9. अभिमान 1. अभिमान अपने गुणों का अत्यधिक बोध है। 2. यह सूक्ष्म अहंकार का रूप है। 3. परमपिता परमात्मा के अनुसार यह भक्ति में बाधा है। 4. अभिमानी व्यक्ति दूसरों को छोटा समझता है। 5. इससे प्रेम घटता है। 6. आत्मज्ञान दूर हो जाता है। 7. अभिमान टूटने पर दुख होता है। 8. विनम्रता से ही इसका अंत संभव है। 10. मान 1. मान सम्मान की इच्छा है। 2. यह सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर है। 3. परमपिता परमात्मा इसे अस्थायी बताते हैं। 4. मान मिलने पर अहं बढ़ता है। 5. न मिलने पर क्रोध आता है। 6. यह मन को चंचल बनाता है। 7. सच्चा संत मान-अमान से परे रहता है। 8. समभाव ही श्रेष्ठ अवस्था है। 11. प्रतिष्ठा का मोह 1. प्रतिष्ठा का मोह बाहरी छवि से जुड़ा है। 2. व्यक्ति समाज में ऊँचा दिखना चाहता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे माया का जाल कहते हैं। 4. यह आत्मिक सादगी को नष्ट करता है। 5. व्यक्ति दिखावे में फँस जाता है। 6. सत्य छिप जाता है। 7. प्रतिष्ठा क्षणभंगुर है। 8. सच्ची प्रतिष्ठा चरित्र से आती है। 12. यश की लालसा 1. यश की लालसा प्रशंसा पाने की चाह है। 2. यह मन में सूक्ष्म लोभ है। 3. परमपिता परमात्मा सच्चे कर्म को निःस्वार्थ बताते हैं। 4. यश के पीछे दौड़ने से शांति नहीं मिलती। 5. व्यक्ति दूसरों पर निर्भर हो जाता है। 6. आलोचना से दुखी होता है। 7. यश अस्थायी है। 8. कर्म ही सच्ची पहचान है। --- 13. कीर्ति का मोह 1. कीर्ति नाम फैलाने की इच्छा है। 2. यह प्रसिद्धि का आकर्षण है। 3. परमपिता परमात्मा आंतरिक शुद्धता को प्रधान मानते हैं। 4. कीर्ति का मोह भक्ति से दूर करता है। 5. व्यक्ति बाहरी प्रशंसा में उलझता है। 6. आत्ममंथन छूट जाता है। 7. कीर्ति समय के साथ मिटती है। 8. सच्ची कीर्ति सद्कर्म से मिलती है। 14. इज्जत का अहंकार 1. इज्जत का अहंकार सामाजिक पहचान पर गर्व है। 2. यह स्वयं को श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति है। 3. परमपिता परमात्मा इसे माया का भ्रम कहते हैं। 4. इससे मन कठोर हो जाता है। 5. अपमान होने पर क्रोध बढ़ता है। 6. व्यक्ति क्षमा नहीं कर पाता। 7. इज्जत अस्थायी है। 8. नम्रता से ही सच्चा सम्मान मिलता है। 15. कपट 1. कपट मन की असत्य प्रवृत्ति है। 2. यह बाहर कुछ और, भीतर कुछ और होता है। 3. परमपिता परमात्मा पाखंड का विरोध करते हैं। 4. कपट भक्ति को निष्फल करता है। 5. इससे विश्वास टूटता है। 6. समाज में अविश्वास फैलता है। 7. कपटी व्यक्ति अशांत रहता है। 8. सरलता ही इसका समाधान है। 16. छल 1. छल जानबूझकर भ्रम देना है। 2. यह स्वार्थ से प्रेरित होता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे अधर्म मानते हैं। 4. छल संबंधों को तोड़ता है। 5. इससे मन कलुषित होता है। 6. छल का फल दुख होता है। 7. सच्चाई से ही विश्वास बनता है। 8. निष्कपटता ही श्रेष्ठ मार्ग है। --- 17. धोखा 1. धोखा विश्वास का टूटना है। 2. यह छल का परिणाम है। 3. परमपिता परमात्मा सत्य को सर्वोच्च मानते हैं। 4. धोखा आत्मा को कलुषित करता है। 5. इससे पीड़ा जन्म लेती है। 6. समाज में अविश्वास बढ़ता है। 7. धोखेबाज अंततः पछताता है। 8. ईमानदारी ही इसका उपचार है। 18. मक्कारी 1. मक्कारी चतुराई का दुरुपयोग है। 2. यह दूसरों को हानि पहुँचाने हेतु होती है। 3. परमपिता परमात्मा इसे अधर्म बताते हैं। 4. मक्कार व्यक्ति स्वार्थी होता है। 5. वह विश्वास खो देता है। 6. अंततः अकेला रह जाता है। 7. यह आत्मिक पतन का कारण है। 8. सादगी ही श्रेष्ठ गुण है। 19. धूर्तता 1. धूर्तता चालाकी का नकारात्मक रूप है। 2. इसमें कपट और छल दोनों शामिल हैं। 3. परमपिता परमात्मा सच्चाई को महत्व देते हैं। 4. धूर्त व्यक्ति लाभ के लिए संबंध बनाता है। 5. वह स्थायी सम्मान नहीं पाता। 6. धूर्तता से समाज दूषित होता है। 7. यह आत्मा को भारी बनाती है। 8. सरल हृदय ही श्रेष्ठ है। 20. पाखंड 1. पाखंड दिखावे की भक्ति है। 2. यह आंतरिक शुद्धता के बिना बाहरी आडंबर है। 3. परमपिता परमात्मा ने इसका तीव्र विरोध किया। 4. पाखंडी व्यक्ति दोहरा जीवन जीता है। 5. इससे आत्मिक प्रगति रुकती है। 6. समाज भ्रमित होता है। 7. पाखंड सत्य को ढक देता है। 8. सच्ची भक्ति मन से होती है। ---
#❤️जीवन की सीख : संत कबीरदास जी के अनुसार ये सभी अवगुण आत्मा को परमात्मा से दूर ले जाते हैं। कुछ अवगुण जो हम इंसानों को हमेशा दुख देते है । दुख के दरवाजे । जो प्रवेश ( अंदर जाना चाहता है ) करना चाहता है कर सकता है । --- 1. गुस्सा 1. गुस्सा मन की असंतुलित अवस्था है। 2. यह क्षणिक उत्तेजना से उत्पन्न होता है। 3. परमपिता परमात्मा के अनुसार यह बुद्धि को ढक देता है। 4. गुस्से में व्यक्ति सही-गलत का भेद खो देता है। 5. यह संबंधों को तोड़ देता है। 6. भक्ति मार्ग में गुस्सा बाधा है। 7. विनम्रता से ही गुस्सा शांत होता है। 8. संत के लिए क्षमा, गुस्से का उपचार है। 2. क्रोध 1. क्रोध गुस्से का स्थायी और तीव्र रूप है। 2. यह अहंकार से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे अग्नि के समान बताते हैं। 4. क्रोध पहले स्वयं को जलाता है। 5. इससे विवेक नष्ट हो जाता है। 6. आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है। 7. क्रोधी व्यक्ति अशांत रहता है। 8. प्रेम और धैर्य से क्रोध शांत होता है। 3. हिंसा 1. हिंसा मन, वचन और कर्म से हो सकती है। 2. यह दया के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा दया को धर्म का मूल मानते हैं। 4. हिंसा हृदय को कठोर बनाती है। 5. इससे पाप बढ़ता है। 6. समाज में भय फैलता है। 7. हिंसक मनुष्य ईश्वर से दूर होता है। 8. करुणा ही इसका समाधान है। 4. द्वेष 1. द्वेष मन में छिपी शत्रुता है। 2. यह ईर्ष्या और अहं से उत्पन्न होता है। 3. परमपिता परमात्मा प्रेम को इसका उपचार बताते हैं। 4. द्वेष मन को अशांत करता है। 5. इससे संबंध बिगड़ते हैं। 6. यह आत्मा को दूषित करता है। 7. द्वेषी व्यक्ति सुखी नहीं रहता। 8. क्षमा से द्वेष समाप्त होता है। --- 5. बदला 1. बदला प्रतिशोध की प्रारंभिक भावना है। 2. यह चोट या अपमान से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा क्षमा को श्रेष्ठ मानते हैं। 4. बदला शांति नहीं देता। 5. यह द्वेष को बढ़ाता है। 6. मन में अशांति बनी रहती है। 7. बदले की आग जीवन जला देती है। 8. संत मार्ग क्षमा का मार्ग है। 6. प्रतिशोध 1. प्रतिशोध बदले का संगठित रूप है। 2. यह अहंकार को संतुष्ट करता है। 3. पर आत्मा को कलुषित करता है। 4. परमपिता परमात्मा इसे अज्ञान का परिणाम मानते हैं। 5. इससे हिंसा जन्म लेती है। 6. प्रतिशोध चक्र चलता ही रहता है। 7. शांति नहीं मिलती। 8. प्रेम ही इसे समाप्त करता है। 7. अहंकार 1. अहंकार “मैं” की भावना है। 2. परमपिता परमात्मा कहते हैं जहाँ “मैं” है, वहाँ ईश्वर नहीं। 3. यह आध्यात्मिक बाधा है। 4. अहंकार विनम्रता को नष्ट करता है। 5. इससे दूरी और अलगाव बढ़ता है। 6. ज्ञान प्राप्ति में बाधा बनता है। 7. संत सरल और निरहंकारी होता है। 8. समर्पण से अहंकार मिटता है। 8. घमंड 1. घमंड अहंकार का बाहरी रूप है। 2. यह धन, ज्ञान या शक्ति पर होता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे नाश का कारण बताते हैं। 4. घमंडी व्यक्ति दूसरों को तुच्छ समझता है। 5. इससे समाज में दूरी बढ़ती है। 6. घमंड अस्थायी वस्तुओं पर आधारित है। 7. समय सब छीन लेता है। 8. विनम्रता ही सच्ची महानता है। ---