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#चांदनी जब नाम पूछे,
चांदनी जब नाम पूछे, - चांदनी जब नाम तुम कहो हम क्या बताएं प्रीत के ये गीत बोलो कब तलक हम गुनगुनाएं हां तुम्हारे कुंतलों की छांह ने निंदिया संवारी हां तुम्हारी दृष्टि ने विधु की विभा मेरे संवारी हां तुम्हारे चित्र ने साकार मेरी भावना की और हां स्पर्श् ने मेरे हृदय को चेतना दी "अहं ब्रमहास्मि" के वाग्जालों में फंसे हम पर जिंदगी पर है तुम्हारा , किस तरह, अनग्रह बताएं ने छूकर अधर को, बोल सीखे हैं ` R शब्द और पा स्पर्श, आशा के खुले हैं राज द्वारे ओढ़नी अहसास की लहराई पा इंगित तुम्हारा अर्थके अनुपात से अभिप्राय जुड़ता सा हमारा पर शिराओं में संवरती शिंजिनी की झनझनाहट से सपन रंग कर नयन में किस तरह बोलो सजाएं हां तुम्हारे आलते ने अल्पना के चित्र खींचे हां तुम्हारे होंठ ने हैं प्यास को मधुघट उलीचे हां तुम्हारी अचर्ना ने दीप को सौंपी शिखाएं हां तुम्हारे पग-कमल से मंत्रणा करतीं दिशाएं क्षितिज की अलगनी पर सांझ के लटके रवि सी चांदनी जब नाम तुम कहो हम क्या बताएं प्रीत के ये गीत बोलो कब तलक हम गुनगुनाएं हां तुम्हारे कुंतलों की छांह ने निंदिया संवारी हां तुम्हारी दृष्टि ने विधु की विभा मेरे संवारी हां तुम्हारे चित्र ने साकार मेरी भावना की और हां स्पर्श् ने मेरे हृदय को चेतना दी "अहं ब्रमहास्मि" के वाग्जालों में फंसे हम पर जिंदगी पर है तुम्हारा , किस तरह, अनग्रह बताएं ने छूकर अधर को, बोल सीखे हैं ` R शब्द और पा स्पर्श, आशा के खुले हैं राज द्वारे ओढ़नी अहसास की लहराई पा इंगित तुम्हारा अर्थके अनुपात से अभिप्राय जुड़ता सा हमारा पर शिराओं में संवरती शिंजिनी की झनझनाहट से सपन रंग कर नयन में किस तरह बोलो सजाएं हां तुम्हारे आलते ने अल्पना के चित्र खींचे हां तुम्हारे होंठ ने हैं प्यास को मधुघट उलीचे हां तुम्हारी अचर्ना ने दीप को सौंपी शिखाएं हां तुम्हारे पग-कमल से मंत्रणा करतीं दिशाएं क्षितिज की अलगनी पर सांझ के लटके रवि सी - ShareChat
#मैं जाना चाहता हूँ अमेरिका
मैं जाना चाहता हूँ अमेरिका - मैं जाना चाहता हूँ अमेरिका हूँ अमेरिका ख़ूब जाना चाहता पी जाना चाहता हूँ अमेरिका मैं खा जाना चाहता हूँ अमेरिका क्या क्या क्या है अमेरिका रे बोलो क्या क्या क्या है अमेरिका बस ख़ामख़्वाह है अमेरिका रे बोलो बस ख़ामख़्वाह है अमेरिका .सोने की खान है अमेरिका गोरी गोरी रान है अमेरिका मेरा अरमान है अमेरिका रे हाय मेरी जान है अमेरिका मैं जाना चाहता हूँ॰.. में ऐसे क्या॰क्या हीरे मोती जड़े हुए अमरीका देखो उसके फुटपाथों पर कितने भूखे पडे़े हुए जिधर उसे दिखती गुंजाइश वहीं वहीं घुस जाता है सबकी छाती पर मूँगों को दलना उसको आता है अमरीका है क्या...कद्दू अमरीका है क्या...बदबू टिंडा अमरीका है क्या अमरीका है...मुछमुण्डा बात हमारी ; अब भी सँभल जाइए हज़रत मान চিচমমীই ীফিা मैं जाना चाहता हूँ अमेरिका हूँ अमेरिका ख़ूब जाना चाहता पी जाना चाहता हूँ अमेरिका मैं खा जाना चाहता हूँ अमेरिका क्या क्या क्या है अमेरिका रे बोलो क्या क्या क्या है अमेरिका बस ख़ामख़्वाह है अमेरिका रे बोलो बस ख़ामख़्वाह है अमेरिका .सोने की खान है अमेरिका गोरी गोरी रान है अमेरिका मेरा अरमान है अमेरिका रे हाय मेरी जान है अमेरिका मैं जाना चाहता हूँ॰.. में ऐसे क्या॰क्या हीरे मोती जड़े हुए अमरीका देखो उसके फुटपाथों पर कितने भूखे पडे़े हुए जिधर उसे दिखती गुंजाइश वहीं वहीं घुस जाता है सबकी छाती पर मूँगों को दलना उसको आता है अमरीका है क्या...कद्दू अमरीका है क्या...बदबू टिंडा अमरीका है क्या अमरीका है...मुछमुण्डा बात हमारी ; अब भी सँभल जाइए हज़रत मान চিচমমীই ীফিা - ShareChat
#इक बगल में चाँद होगा,
इक बगल में चाँद होगा, - इक बगल में चाँद होगा , इक बगल में रोटियाँ इक बगल में नींद होगी , इक बगल में लोरियाँ हम चाँद पे, हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल कर सो जाएँगे और नींद से, और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे इक बगल में चाँद होगा , इक बगल में रोटियाँ इक बगल में नींद होगी , इक बगल में लोरियाँ हम चाँद पे , रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे एक बगल में खनखनाती , सीपियाँ हो जाएँगी एक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी #,6#' हम सीपियो ' सीपियो में भरके सारे तारे छू के आएँगे और सिसकियो को, और सिसकियो को गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे और सिसकियों को , गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा गम न करजो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी याट रख पर कोर्ड अनहोनी नहीं त लाएगी इक बगल में चाँद होगा , इक बगल में रोटियाँ इक बगल में नींद होगी , इक बगल में लोरियाँ हम चाँद पे, हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल कर सो जाएँगे और नींद से, और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे इक बगल में चाँद होगा , इक बगल में रोटियाँ इक बगल में नींद होगी , इक बगल में लोरियाँ हम चाँद पे , रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे एक बगल में खनखनाती , सीपियाँ हो जाएँगी एक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी #,6#' हम सीपियो ' सीपियो में भरके सारे तारे छू के आएँगे और सिसकियो को, और सिसकियो को गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे और सिसकियों को , गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा गम न करजो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी याट रख पर कोर्ड अनहोनी नहीं त लाएगी - ShareChat
#javed ka khat abhi bhi pade jaate hai
javed ka khat abhi bhi pade jaate hai - लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको, दूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में पहुँचे लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए- हुस्नाँ में पहुँचे ओ हुस्नाँ... मैं तो हूँ बैठा , ओ हुस्नाँ मेरी , यादों पुरानी में खोया को चुनता , बीती पल पल को गिनता, पल पल कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में, बातें तुम्हारी ये बोलें 3574எ4 होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें, ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ.. पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में वैसे ही जैसे झड़ते 461 3ెi కౌ=i .  हिन्दुस्ताँ में होता उजाला क्या वैसा ही है जैसा होता চাঁ ओ हुस्नाँ... लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको, दूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में पहुँचे लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए- हुस्नाँ में पहुँचे ओ हुस्नाँ... मैं तो हूँ बैठा , ओ हुस्नाँ मेरी , यादों पुरानी में खोया को चुनता , बीती पल पल को गिनता, पल पल कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में, बातें तुम्हारी ये बोलें 3574எ4 होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें, ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ.. पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में वैसे ही जैसे झड़ते 461 3ెi కౌ=i .  हिन्दुस्ताँ में होता उजाला क्या वैसा ही है जैसा होता চাঁ ओ हुस्नाँ... - ShareChat
#हीरों के राँझों के नगमें क्या अब भी सुने जाते हैं हाँ वहाँ
हीरों के राँझों के नगमें क्या अब भी सुने जाते हैं हाँ वहाँ - लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको , दरूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में ப लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए ्हुसनाँ में ओ हुस्नाँ 10 मैं तो हूँ बैठा, ओ हुसनाँसेरी यादों में खोया पुरानी पल पल को गिनता, पल पल को चुनता , बीती कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में , बातें तुम्हारी ये बोलें होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें  तुम्हारी ये बोलें ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर ्सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ . पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में बैसे ही जैसे झड़ते यहाँ ओ हुस्नाँ.. होता उजाला क्या बैसा ही है जैसा होता हिन्दुस्ताँ में हाँ 3EFii... लाहौर के उस पहले ज़िले के, दो परगना में पहुँचे रेशम गली के, दूजे कूचे के, चौथे मकाँ में पहुँचे कहते हैं जिसको , दरूजा मुलुक उस, पाकिस्ताँ में ப लिखता हूँ ख़त मैं हिन्दोस्ताँ से, पहलू ए ्हुसनाँ में ओ हुस्नाँ 10 मैं तो हूँ बैठा, ओ हुसनाँसेरी यादों में खोया पुरानी पल पल को गिनता, पल पल को चुनता , बीती कहानी में खोया पत्ते जब झड़ते , हिन्दोस्ताँ में , बातें तुम्हारी ये बोलें होता उजाला , हिन्दोस्ताँ में यादें  तुम्हारी ये बोलें ओ हुस्नाँ मेरी, ये तो बता दो होता है ऐसा क्या उस गुलिस्ताँ में रहती हो नन्हीं कबूतर ्सी गुम तुम जहाँ ओ हुस्नाँ . पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्ताँ में बैसे ही जैसे झड़ते यहाँ ओ हुस्नाँ.. होता उजाला क्या बैसा ही है जैसा होता हिन्दुस्ताँ में हाँ 3EFii... - ShareChat
#अपनी गंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा - अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गईवो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा के सुर '  पतझारों का कोमल भंवरों : सरगम যীনা-খ্ীনা मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू ्टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-्पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनबंध नहीं बेचंगा चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा - अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गईवो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा - चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा के सुर '  पतझारों का कोमल भंवरों : सरगम যীনা-খ্ীনা मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू ्टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-्पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनबंध नहीं बेचंगा - ShareChat
#छीनकर छ्लछंद से
छीनकर छ्लछंद से - छीनकर छ्लछंद से हक पराया मारकर अम्रित पिया तो क्या पिया? हो गये बेशक अमर जी रहे अम्रित उमर लेकिन अभय अनमोल सारा छिन गया | देवता तो हो गये पर क्या हुआ देवत्व का? आयुभर चिन्ता करो अब पद प्रतिष्टा, राजसत्ता और अपने लोक की! छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की एकहि भय रात दिन आठों प्रहर प्राण में बैठा रहे-- इस भयातुर अमर जीवन का करो क्या? जो किसि षड्यंत्र मे छलछंद में शामिल नहीं था पी गया सारा हलाहल हो गया कैसे अमर? पा गया साम्राज्य ++- छीनकर छ्लछंद से हक पराया मारकर अम्रित पिया तो क्या पिया? हो गये बेशक अमर जी रहे अम्रित उमर लेकिन अभय अनमोल सारा छिन गया | देवता तो हो गये पर क्या हुआ देवत्व का? आयुभर चिन्ता करो अब पद प्रतिष्टा, राजसत्ता और अपने लोक की! छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की एकहि भय रात दिन आठों प्रहर प्राण में बैठा रहे-- इस भयातुर अमर जीवन का करो क्या? जो किसि षड्यंत्र मे छलछंद में शामिल नहीं था पी गया सारा हलाहल हो गया कैसे अमर? पा गया साम्राज्य ++- - ShareChat
#गन्ने! मेरे भाई!
गन्ने! मेरे भाई! - इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुष गन्ने! मेरे भाई!! रेशे रेशे में रस और रगनरग में मिठास का जस ri तो प्यारे भाई गन्ने! इक्ष्वाकु वंश के आदर्श! ! तुम्हारा वही हश्र होगा जो होता आया है-- पोरी-पोरी काटेंगे लोग तुम्हें चूस- चूसकर खाएँगे चरखियों में पेलेंगे आख़िरी बूँद तक निचोड़ेंगे किसी भी क़ीमत पर तुम्हें ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हारे वल्कल जैसे छिलकों तक को सुखाएँगे तुम्हारे ही रस से गुड़ या शक्कर बनाने वाली भट्ठी में ईंधन बनाकर स्तत्राागे | इक्ष्वाकु वंश के आदि पुरुष गन्ने! मेरे भाई!! रेशे रेशे में रस और रगनरग में मिठास का जस ri तो प्यारे भाई गन्ने! इक्ष्वाकु वंश के आदर्श! ! तुम्हारा वही हश्र होगा जो होता आया है-- पोरी-पोरी काटेंगे लोग तुम्हें चूस- चूसकर खाएँगे चरखियों में पेलेंगे आख़िरी बूँद तक निचोड़ेंगे किसी भी क़ीमत पर तुम्हें ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे तुम्हारे वल्कल जैसे छिलकों तक को सुखाएँगे तुम्हारे ही रस से गुड़ या शक्कर बनाने वाली भट्ठी में ईंधन बनाकर स्तत्राागे | - ShareChat