सुवेंदु अधिकारी के पीए की हत्या की खबर सुनकर
मन में एक सवाल बार-बार उठता है —
क्या यही लोकतंत्र है?
जहाँ सत्ता और राजनीति के बीच
एक इंसान की जान इतनी सस्ती हो जाए,
वहाँ आम नागरिक अपने आपको सुरक्षित कैसे महसूस करे?
जब बड़े नेताओं के करीबी लोग भी
खतरे से बाहर नहीं हैं,
तो फिर उस साधारण व्यक्ति की सुरक्षा की क्या गारंटी है
जो रोज़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता है?
लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ वोट डालना नहीं होता,
लोकतंत्र का असली मतलब है —
न्याय, सुरक्षा और जनता का विश्वास।
अगर लोगों के मन में डर बैठ जाए,
अगर हर घटना के बाद सवाल उठें
कि “कल किसकी बारी होगी?”,
तो यह चिंता केवल राजनीति की नहीं,
पूरे समाज की बन जाती है।
देश की जनता लड़ाई नहीं चाहती,
जनता सिर्फ इतना चाहती है कि
कानून सबके लिए बराबर हो,
दोषी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो,
उसे सज़ा मिले।
क्योंकि जब न्याय कमजोर पड़ता है,
तब डर मजबूत हो जाता है।
और जिस समाज में डर बढ़ने लगे,
वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाता है।
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