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#❤️जीवन की सीख #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
❤️जीवन की सीख - अयि शृणु' निधाय मम पाणितलेड्द्य कान्ते ! हस्तं संसार मार्गम् अखिलं सह याव नित्यम्। एकं हि लक्ष्यमिह नौ भविता हि लोके , प्रीत्या तथा मधुरतामुपयातु कालः|। हे मेरी रूपवती प्रिये! आज अपना यह कोमल हाथ हमेशा के लिए मेरे हाथों  में साँप दो, ताकि हम ज़िंदगी के इस पूरे सफर में हमेशा एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। आज से इस दुनिया में हम दोंनों का रास्ता और मंजिल एक ही होगी , और मुझे विश्वास है कि हमारे इस प्यार से... हमारा आने वाला हर एक पल हमेशा के लिए मीठा (मथुर ) हो जाएगा। अयि शृणु' निधाय मम पाणितलेड्द्य कान्ते ! हस्तं संसार मार्गम् अखिलं सह याव नित्यम्। एकं हि लक्ष्यमिह नौ भविता हि लोके , प्रीत्या तथा मधुरतामुपयातु कालः|। हे मेरी रूपवती प्रिये! आज अपना यह कोमल हाथ हमेशा के लिए मेरे हाथों  में साँप दो, ताकि हम ज़िंदगी के इस पूरे सफर में हमेशा एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकें। आज से इस दुनिया में हम दोंनों का रास्ता और मंजिल एक ही होगी , और मुझे विश्वास है कि हमारे इस प्यार से... हमारा आने वाला हर एक पल हमेशा के लिए मीठा (मथुर ) हो जाएगा। - ShareChat
#🙏कर्म क्या है❓
🙏कर्म क्या है❓ - पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ( লীকত্ত त्रिषु  अतो हि नास्ति मातृसमो गुरुः ।I गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है। पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ( লীকত্ত त्रिषु  अतो हि नास्ति मातृसमो गुरुः ।I गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है। - ShareChat
#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - कभी हार मानने की T आदत ही एक 5a दिन ds} facila  कभी हार मानने की T आदत ही एक 5a दिन ds} facila - ShareChat
#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - परिश्रान्तौ बाहू स्खलति करतोउरित्रयुगलम् जडीभूतौ पादौ पदमपि न यातुं प्रभवतः। इयं मध्येधारं मम समुपयाता लघुतरी  तरेद्वा मज्जेद्वा त्वयि निहितभाराः खलु वयम्।।३।I  भाषार्थः चूर- चूर हो गयी हैं और हाथ से पतवार " प्रभो! मेरी दोनों भुजाएँ थककर  खिसक रही हैं, पाँव ऐसे जकड़ गये हैं कि पग-भर भी आगे नहीं बढ् सकते। यह मेरी छोटी-सी नैया मझधार में आ पड़ी है, अब यह किनारे लगे या डूब जाय; मैंने तो सब भार तुझ पर छोड दिया है।।३II  परिश्रान्तौ बाहू स्खलति करतोउरित्रयुगलम् जडीभूतौ पादौ पदमपि न यातुं प्रभवतः। इयं मध्येधारं मम समुपयाता लघुतरी  तरेद्वा मज्जेद्वा त्वयि निहितभाराः खलु वयम्।।३।I  भाषार्थः चूर- चूर हो गयी हैं और हाथ से पतवार " प्रभो! मेरी दोनों भुजाएँ थककर  खिसक रही हैं, पाँव ऐसे जकड़ गये हैं कि पग-भर भी आगे नहीं बढ् सकते। यह मेरी छोटी-सी नैया मझधार में आ पड़ी है, अब यह किनारे लगे या डूब जाय; मैंने तो सब भार तुझ पर छोड दिया है।।३II - ShareChat
#❤️जीवन की सीख #👫हिंदू शादी रस्मे
❤️जीवन की सीख - ಶೊಶ೯ಹ ಶ9ಾ कुलञ्च, शीलञ्च, सनाथता च, विद्या च, वित्तञ्चे, वपुर्वयश्चा एतान्गुणान्सप्त विचिन्त्य देया  बुंधैः , शेषमचिन्तनीयम्ं ।। (उपजाति) कन्या (पञ्चतन्त्र, काकोलूकीयं , श्लोक॰ २०९ ) विवाह करते समय वर में ये सात गुण अवश्य देखने चाहिए। जैसे - कुल, शील कन्याका (स्वभाव ) , पारिवारिक स्थिति, विद्या, वित्त (धन) , सुन्दर सबल शरीर, अवस्था इन सात गुणों को ठीक - ठीक देखकर योग्य वर को कन्या देनी चाहिए। इन सात गुणों के अतिरिक्त और बात देखने की तो कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। ಶೊಶ೯ಹ ಶ9ಾ कुलञ्च, शीलञ्च, सनाथता च, विद्या च, वित्तञ्चे, वपुर्वयश्चा एतान्गुणान्सप्त विचिन्त्य देया  बुंधैः , शेषमचिन्तनीयम्ं ।। (उपजाति) कन्या (पञ्चतन्त्र, काकोलूकीयं , श्लोक॰ २०९ ) विवाह करते समय वर में ये सात गुण अवश्य देखने चाहिए। जैसे - कुल, शील कन्याका (स्वभाव ) , पारिवारिक स्थिति, विद्या, वित्त (धन) , सुन्दर सबल शरीर, अवस्था इन सात गुणों को ठीक - ठीक देखकर योग्य वर को कन्या देनी चाहिए। इन सात गुणों के अतिरिक्त और बात देखने की तो कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। - ShareChat
#😇 चाणक्य नीति
😇 चाणक्य नीति - सुभाषितम् कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपुः| अर्थतस्तु निबध्यन्ते , मित्राणि रिपवस्तथा Il भावार्थः कोई भी जन्म से मित्र या शत्रु नहीं होता; व्यक्ति का व्यवहार और परिस्थितियाँ ही उन्हें मित्र या शत्रु बनाती हैं, क्योंकि अच्छे आचरण से मित्रता और बुरे आचरण से शत्रुता उत्पन्न 2-31 सुभाषितम् कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपुः| अर्थतस्तु निबध्यन्ते , मित्राणि रिपवस्तथा Il भावार्थः कोई भी जन्म से मित्र या शत्रु नहीं होता; व्यक्ति का व्यवहार और परिस्थितियाँ ही उन्हें मित्र या शत्रु बनाती हैं, क्योंकि अच्छे आचरण से मित्रता और बुरे आचरण से शत्रुता उत्पन्न 2-31 - ShareChat
#😇 चाणक्य नीति
😇 चाणक्य नीति - सुभाषितम् राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः| राजा भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पाप गुरुस्तथा |I भावार्थः किए ' गए पापों का फल राजा राजा राष्ट्रकृतं पापंः राष्ट्र (प्रजा) द्वारा ' को मिलता है, क्योंकि चह उनका शासक है। पुरोहितःः राजा के पापों के fag' पुरोहित (या Z5: m उसक मंत्रीगण) जिम्मेदार होता है, क्योंकि वह राजा को मार्गदर्शन देता है। किए ' भर्ता च स्त्रीकृतं पापंः पत्नी द्वारा गए पापों का फल उसके पति को भोगना पड़ता है। शिष्य पाप गुरुस्तथाः शिष्य के पापों का बोझ उसके गुरु पर आता है, क्योंकि गुरु ही उसे शिक्षा देता है। सुभाषितम् राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः| राजा भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पाप गुरुस्तथा |I भावार्थः किए ' गए पापों का फल राजा राजा राष्ट्रकृतं पापंः राष्ट्र (प्रजा) द्वारा ' को मिलता है, क्योंकि चह उनका शासक है। पुरोहितःः राजा के पापों के fag' पुरोहित (या Z5: m उसक मंत्रीगण) जिम्मेदार होता है, क्योंकि वह राजा को मार्गदर्शन देता है। किए ' भर्ता च स्त्रीकृतं पापंः पत्नी द्वारा गए पापों का फल उसके पति को भोगना पड़ता है। शिष्य पाप गुरुस्तथाः शिष्य के पापों का बोझ उसके गुरु पर आता है, क्योंकि गुरु ही उसे शिक्षा देता है। - ShareChat
#🙏गुरु महिमा😇
🙏गुरु महिमा😇 - शिव समान दाता नहीं विपद विदारण हार लज्जा सबकी राखिये श्रीनन्दी के असवार शिव समान दाता नहीं विपद विदारण हार लज्जा सबकी राखिये श्रीनन्दी के असवार - ShareChat
#😇 चाणक्य नीति
😇 चाणक्य नीति - पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः | गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।I ( चाणक्यनीति ५ / १) अभ्यागत अर्थात् स्त्रियोंका गुरु पति ही है, अतिथि सबका गुरु है, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका गुरु अग्नि है और चारों वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है। पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः | गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।I ( चाणक्यनीति ५ / १) अभ्यागत अर्थात् स्त्रियोंका गुरु पति ही है, अतिथि सबका गुरु है, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका गुरु अग्नि है और चारों वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है। - ShareChat
#😇 चाणक्य नीति
😇 चाणक्य नीति - अन्नदानं महादानं विद्यादानमतः परम् अन्नदान महादान है, पर उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है। अन्न क्षणिक तृप्ति देता है, पर विद्या जीवन भर साथ देता है। ODI VIOU 8080 अन्नदानं महादानं विद्यादानमतः परम् अन्नदान महादान है, पर उससे भी श्रेष्ठ विद्यादान है। अन्न क्षणिक तृप्ति देता है, पर विद्या जीवन भर साथ देता है। ODI VIOU 8080 - ShareChat