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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱बम बम भोले🙏 #🔱हर हर महादेव #🔱महाशिवरात्रि Coming Soon 🪔 #🙏शिव पार्वती #रुद्राष्टकम् *नमामीशमीशान निर्वाणरूपं।* *विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरुपं।।* *निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।* *चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।* *निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।* *गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।* *करालं महाकाल कालं कृपालं।* *गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।* *तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं।* *मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।* *स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा।* *लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।3।।* *चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं।* *प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।* *मृगाधीशचरमाम्बरं मुण्डमालं।* *प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।* *प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।* *अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।* *त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं।* *भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।* *कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।* *सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।।* *चिदानंद संदोह मोहापहारी।* *प्रसीद पसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।* *न यावद् उमानाथ पादारविन्द।* *भजंतीह लोके परे वा नराणां।।* *न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं।* *प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।* *न जानामि योगं जपं नैव पूजां।* *नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।* *जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं।* *प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।8।।* श्लोक:- *रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।।* *ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।* *🕉️‼️हर हर महादेव ‼️🕉️*
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#कर्म ही पूजा है #धर्म कर्म #कर्म ⁉️प्रारब्ध क्या होता है..??⁉️ भगवान् हमारे अनंत पुण्य व अनंत पापों में से थोडा-थोडा लेकर हमारे किसी एक जन्म का प्रारब्ध तैयार करते हैं और मानव जीवन के रूप में हमें एक अवसर देते हैं । ताकि हम अपने आनंद प्राप्ति के परम चरम लक्ष्य को पा लें। प्रारब्ध सबको भोगना पड़ता है.. भगवद् प्राप्ति के बाद जब कोई जीव महा पुरुष बन जाता है,तब भगवान् उसके तमाम पिछले जन्मों के एवं उस जन्म के भी समस्त पाप-पुण्यों को भस्म कर देते हैं, लेकिन वे उसके उस जीवन के शेष बचे हुए प्रारब्ध में कोई छेड़छाड़ नहीं करते हैं..इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् को पा चुके मुक्त आत्मा संतों/भक्तों को भी अपना उस जन्म का पूरा प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है। उसमें इतना अंतर अवश्य आ जाता है कि अब वह नित्य आनंद में लीन रहने से किसी सुख-दुःख की ।फ़ीलिंग नहीं करता। लेकिन फिर भी एक्टिंग में उसे सब भोगना पड़ता है। किसी के प्रारब्ध को मिटाना भगवान् के कानून में नहीं है। वे लोग बहुत भोले हैं, जो यह समझते हैं कि अमुक देवी जी, अमुक बाबा जी अपनी कृपा से मेरे कष्ट को दूर कर देंगे। या मुझे धन, वैभव, पुत्र आदि दे देंगे। जो प्रारब्ध में लिखा होगा, वह नित्य भगवान् को गालियाँ देने से भी अवश्य मिलेगा,जो प्रारब्ध में नहीं लिखा होगा, वह दिन-रात पूजा पाठ करने से भी न मिलेगा..।। भगवान् की भक्ति करने से संसारी सामान नहीं मिला करता, जीव के प्रारब्ध जन्य दुःख दूर नहीं होते, बल्कि भक्ति से तो स्वयं भगवान् की ही प्राप्ति हुआ करती है। यह बात अलग है कि कोई मूर्ख अपनी भक्ति से भगवान् को पा लेने पर भी वरदान के रूप में उनसे उन्हीं को न माँगकर संसार ही माँग बैठे। यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि जिसको भगवान् की प्राप्ति हो चुकी, उसके लिए प्रारब्ध के सुख- दुःख खिलवाड़ मात्र रह जाते हैं ।।
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#जय श्री कृष्ण 🙏💐एक कथा के अनुसार, कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल सेनाओं के आवागमन के लिए तैयार किया जा रहा था। पेड़ों को उखाड़ने और भूमि को समतल करने हेतु हाथियों का उपयोग किया जा रहा था। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। जब वह पेड़ उखाड़ा गया, तो उसका घोंसला नीचे गिर गया। चमत्कारवश उसके बच्चे सुरक्षित तो रहे, परंतु वे इतने छोटे थे कि उड़ने में असमर्थ थे। भयभीत और असहाय गौरैया इधर-उधर सहायता के लिए देखने लगी। उसी समय उसने देखा कि श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ वहाँ आ रहे हैं। वे युद्धभूमि का निरीक्षण करने और युद्ध से पूर्व रणनीति बनाने आए थे। साहस जुटाकर गौरैया अपने छोटे पंख फड़फड़ाती हुई किसी प्रकार श्रीकृष्ण के रथ तक पहुँची और विनती करने लगी— “हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों की रक्षा कीजिए। युद्ध आरंभ होने पर वे कुचल दिए जाएँगे।” सर्वव्यापी भगवान ने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारी पीड़ा समझता हूँ, परंतु मैं प्रकृति के नियमों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।” गौरैया ने श्रद्धा से कहा— “हे प्रभु, मैं जानती हूँ कि आप ही मेरे उद्धारकर्ता हैं। मैं अपने बच्चों का भाग्य आपके चरणों में समर्पित करती हूँ। अब यह आप पर है कि आप उन्हें बचाएँ या न बचाएँ।” श्रीकृष्ण बोले— “कालचक्र पर किसी का वश नहीं होता।” तब गौरैया ने पूर्ण विश्वास के साथ कहा— “प्रभु, आप कैसे और क्या करते हैं, यह मैं नहीं जानती। परंतु आप ही काल के नियंता हैं। मैं स्वयं को और अपने परिवार को पूर्णतः आपको समर्पित करती हूँ।” भगवान ने कहा— “अपने घोंसले में तीन सप्ताह का भोजन एकत्र कर लो।” इस संवाद से अनजान अर्जुन ने गौरैया को हटाने का प्रयास किया। गौरैया कुछ क्षण अपने पंख फैलाकर खड़ी रही और फिर अपने घोंसले में लौट गई। दो दिन बाद शंखनाद के साथ युद्ध आरंभ हुआ। कृष्ण ने अर्जुन से कहा— “मुझे अपना धनुष और बाण दो।” अर्जुन चकित रह गया, क्योंकि कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी। फिर भी उसने श्रद्धापूर्वक धनुष सौंप दिया। कृष्ण ने एक हाथी की ओर बाण चलाया, परंतु बाण हाथी को घायल करने के स्थान पर उसकी गर्दन में बँधी घंटी से टकराकर चिंगारी के साथ गिर पड़ा। अर्जुन मुस्कुरा उठा। “क्या मैं प्रयास करूँ, प्रभु?” कृष्ण ने धनुष लौटाते हुए कहा— “अब कोई अन्य कार्य आवश्यक नहीं है।” अर्जुन ने पूछा— “केशव, आपने हाथी को बाण क्यों मारा? वह तो जीवित है, केवल उसकी घंटी टूटी है।” कृष्ण ने उत्तर नहीं दिया और शंखनाद करने का संकेत किया। अठारह दिनों के भीषण युद्ध के बाद पांडवों की विजय हुई। एक दिन कृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि के एक सुदूर स्थान पर ले गए, जहाँ अब भी अनेक शव अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में पड़े थे। वहाँ कृष्ण एक स्थान पर रुके और बोले— “अर्जुन, कृपया इस घंटी को उठाकर एक ओर रख दो।” अर्जुन ने वही घंटी उठाई, जो उस हाथी के गले में थी। जैसे ही घंटी उठी, एक के बाद एक चार छोटे पक्षी और फिर उनकी माँ गौरैया बाहर निकल आए। वे आनंदपूर्वक कृष्ण के चारों ओर मंडराने लगे। अठारह दिनों तक वही टूटी हुई घंटी उस परिवार का सुरक्षित आश्रय बनी रही थी। अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा— “क्षमा कीजिए प्रभु। आपको मानव रूप में देखकर मैं भूल गया था कि आप वास्तव में कौन हैं।” आइए, हम भी इस समय को उस घंटी रूपी घर की तरह मानें— परिवार के साथ संयम, आस्था और धैर्य रखते हुए, जब तक प्रभु स्वयं हमें बाहर निकालें। जय श्री राधा–कृष्ण💐🙏
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🚩 अद्भुत रामायण ज्ञान: काकभुशुण्डि की अमर कथा 🚩 आखिर कौन थे काकभुशुण्डि? क्यों एक कौए को माना जाता है परमज्ञानी राम भक्त? क्यों उन्हें लेना पड़ा 1000 बार जन्म और कैसे उन्होंने मिटाया गरुड़ जी का संदेह? गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के उत्तर काण्ड में इस दिव्य चरित्र का अद्भुत वर्णन किया है। आइए जानते हैं उनके रहस्यमयी जीवन की पूरी कहानी। 👇 🦅 गरुड़ का संदेह और काकभुशुण्डि से भेंट लंका युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने भगवान राम को 'नागपाश' में बांध दिया, तब देवर्षि नारद के कहने पर गरुड़ जी ने आकर उन्हें मुक्त किया। लेकिन, स्वयं भगवान को बंधनों में देख गरुड़ को उनके 'परमब्रह्म' होने पर संदेह हो गया। इस संदेह को मिटाने के लिए नारद जी ने उन्हें ब्रह्मा जी के पास, ब्रह्मा जी ने शिव जी के पास और अंत में भगवान शिव ने उन्हें परमज्ञानी काकभुशुण्डि के पास भेजा। काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ को पवित्र राम कथा सुनाई और उनका संदेह दूर किया। 📜 काकभुशुण्डि के पूर्व जन्म और श्राप की कहानी काकभुशुण्डि की कहानी अहंकार से भक्ति तक की यात्रा है। 🔹 पहला जन्म और शिव का श्राप: अपने प्रथम जन्म में वे अयोध्या में एक शिव भक्त थे, लेकिन अहंकारवश अन्य देवताओं की निंदा करते थे। बाद में उज्जैन में एक दयालु गुरु की शरण में गए। लेकिन वहां भी उनका अहंकार बढ़ा और उन्होंने भगवान विष्णु से द्रोह किया। एक दिन शिव मंदिर में अपने गुरु का अपमान करने पर भगवान शिव ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया: "तू सर्प योनि में जा और इसके बाद तुझे 1000 बार अलग-अलग योनियों में जन्म लेना पड़ेगा।" 🔹 गुरु की कृपा और वरदान: गुरु ने दयालु होकर शिव जी से क्षमा मांगी। शिव जी ने श्राप तो वापस नहीं लिया, लेकिन वरदान दिया: "इसे 1000 जन्म लेने पड़ेंगे, लेकिन जन्म-मृत्यु का कष्ट नहीं होगा, ज्ञान नष्ट नहीं होगा और इसे पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रहेगी। अंत में इसे श्रीराम की भक्ति प्राप्त होगी।" 🐦 कैसे बने 'कौआ' (काकभुशुण्डि)? हजारों जन्मों के बाद, अंतिम जन्म में वे ब्राह्मण बने और ज्ञान प्राप्ति के लिए लोमस ऋषि के पास गए। वहां ऋषि से तर्क-वितर्क और हठ करने पर क्रोधित होकर लोमस ऋषि ने श्राप दिया: "जा तू चंडाल पक्षी (कौआ) हो जा।" वे तुरंत कौआ बन गए। बाद में ऋषि को पछतावा हुआ, उन्होंने उसे वापस बुलाकर 'राम मंत्र' दिया और 'इच्छामृत्यु' का वरदान दिया। कौए के शरीर में ही राम मंत्र मिलने के कारण उन्हें इस रूप से प्रेम हो गया और वे 'काकभुशुण्डि' कहलाए। 🕉️ प्रभु राम का साक्षात्कार और अमरता कौए के रूप में एक बार उनकी भेंट बाल रूप भगवान राम से हुई। जब प्रभु खेल रहे थे, तो काकभुशुण्डि ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की। तभी उन्हें भगवान के मुख के भीतर पूरे ब्रह्मांड और आकाशगंगाओं के दर्शन हुए। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं परमेश्वर हैं। उन्होंने क्षमा मांगी। भगवान राम ने प्रसन्न होकर उन्हें भक्ति का वरदान दिया और अमर कर दिया। राम जी ने आशीर्वाद दिया कि काल (समय) काकभुशुण्डि को नहीं मार सकता और वे कल्प के अंत तक जीवित रहेंगे। ✨ अद्भुत तथ्य: 👁️‍🗨️ वेदों और पुराणों के अनुसार, काकभुशुण्डि जी ने 11 बार रामायण और 16 बार महाभारत का युद्ध देखा है। ⏳ वे आज भी अमर हैं। जब भी भगवान राम का अवतार होता है, वे अयोध्या जाकर उनकी बाल लीलाओं का दर्शन करते हैं। जय श्री राम! 🙏 #रामचरितमानस #रामायण #जय श्री राम
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शीर्षक: 🤯 जब एक दानवीर राजा को बनना पड़ा 'गिरगिट'! श्रीकृष्ण ने ऐसे किया उद्धार 🙏 #❤️जीवन की सीख #कर्म #धर्म कर्म क्या आप जानते हैं, अनजाने में किया गया पाप भी कितना भारी पड़ सकता है? श्रीमद्भागवत महापुराण की यह कथा आँखें खोल देने वाली है। एक बार द्वारका में श्रीकृष्ण के पुत्रों को एक कुएँ में एक विशालकाय गिरगिट दिखा। वे उसे निकाल न सके और श्रीकृष्ण को बुलाया। भगवान के स्पर्श मात्र से वह गिरगिट एक दिव्य पुरुष बन गया! वह कोई और नहीं, दानवीर राजा नृग थे। 🤔 आखिर क्यों मिला उन्हें यह श्राप? राजा नृग ने जीवन भर लाखों गायों और अपार धन का दान किया था। लेकिन एक बार, भूलवश, एक ब्राह्मण की गाय उनकी गायों में मिल गई और उन्होंने उसे अनजाने में दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया। इस एक छोटी सी भूल के कारण, दोनों ब्राह्मणों के बीच विवाद हुआ और अंततः राजा नृग को यमराज ने पाप का फल पहले भोगने का विकल्प दिया। 🙏 श्रीकृष्ण का उपदेश: ब्राह्मण-धन है 'महाविष' राजा नृग का उद्धार करने के बाद, श्रीकृष्ण ने अपने परिवार और समाज को एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी: 🔥 "ब्राह्मण का धन हलाहल विष से भी खतरनाक है। विष तो सिर्फ खाने वाले को मारता है, लेकिन ब्राह्मण के धन से पैदा हुई आग पूरे कुल का नाश कर देती है।" 🔥 "जो मूर्ख राजा अभिमान में ब्राह्मण का धन हड़पते हैं, वे अपने और अपने वंशजों के लिए नरक का रास्ता साफ करते हैं।" 🔥 "ब्राह्मण अगर अपराध भी करे, गाली दे या मारे, तब भी उसे नमस्कार ही करना चाहिए, द्वेष नहीं।" शिक्षा: हमें अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। अनजाने में की गई भूल भी पाप बन सकती है। दान-पुण्य करते समय भी अत्यंत सावधानी बरतें। और सबसे महत्वपूर्ण, ब्राह्मणों और सज्जनों का सदा सम्मान करें। जय श्री कृष्णा! 🙏🕉️
❤️जीवन की सीख - श्री कृष्ण  द्वारा राजा नृग का उद्धार विकल्प २ः दिव्य और कलात्मक चित्रण ब्राह्मणों का धन, अनजाने में भी हड़प लिया जाए, तो वह पतन का कारण बनता है। हलाहल विष की तो दवा है, लेकिन ब्राह्मण- धन रूपी विष का कोई इलाज नहीं। यह पीढ़ियों को जला देता है। श्री कृष्ण  द्वारा राजा नृग का उद्धार विकल्प २ः दिव्य और कलात्मक चित्रण ब्राह्मणों का धन, अनजाने में भी हड़प लिया जाए, तो वह पतन का कारण बनता है। हलाहल विष की तो दवा है, लेकिन ब्राह्मण- धन रूपी विष का कोई इलाज नहीं। यह पीढ़ियों को जला देता है। - ShareChat
#महाभारत यह भानुमति, दुर्योधन की पत्नी है जो महाभारत के भीतर का सबसे अयोग्य चरित्र था। भानुमति एक बुद्धिमान, प्यारी राजकुमारी थी, जिसे दुर्योधन ने जबरदस्ती अपने स्वयंवर से अपनी इच्छा के बिना कर्ण की मदद से हस्तिनापुर लाया था। वह दुर्योधन से शादी करना चाहती थी, हालांकि वह नहीं चाहती थी। हालाँकि दुर्योधन ने उसका सम्मान किया और उसे प्यार किया, उसने दूसरों के लिए बहुत बुरे काम किए, पांडवों ने। द्रौपदी विशालहरण सबसे बुरी चीज थी जो उसने करने के लिए कहा था और भानुमति ने एक महिला के रूप में वास्तव में बुरा महसूस किया होगा लेकिन वह क्या कर सकती है। अंततः, उनके पति की मृत्यु हो गई और उनके बेटे लक्ष्मण भी युद्ध के भीतर। उनकी बेटी लक्ष्मण को सांबा ने अगवा कर लिया था और वह अपनी शादी से खुश नहीं थी। युद्ध के बाद भानुमति टूट गई और बिखर गई। वह अपने पति की चिता में कूद गई। अपने जीवन के भीतर इस दुख को पाने के लिए उसने क्या किया था? वह शुद्ध और प्यारी थी, लेकिन भाग्य ने उसे धोखा क्यों दिया? वह अच्छी तरह से रह सकती थी लेकिन हस्तिनापुर के महल ने उसे दुखद यादें दीं और कुछ नहीं। वह सिर्फ एक उदाहरण था। वास्तव में मैं कहूंगा कि महाभारत की सभी कुरु देवियाँ दुर्भाग्यशाली थीं। दुर्योधन की पत्नी, कौरवों की सभी पत्नियां जो विधवा हो गईं और यहां तक कि उनके सभी पुत्रों का नाश हो गया। उनकी बेटियाँ जिनके पति युद्ध में भाग ले चुके थे, उन्हें मार डाला गया और उन्हें विधवा बना दिया गया। कर्ण की पत्नियों ने अपने पति और नौ पुत्रों के मरने के बाद विलाप किया। पांडवों की द्रौपदी की ओर से भले ही वह एक पंचकन्या थी, लेकिन उसने अपना जीवन वास्तव में खुशी से नहीं बिताया। कुरुसभा के भीतर उसका अपमान किया गया, दुशासन ने उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की, उसे कर्ण द्वारा अस्वस्थ महिला कहा गया, उसे रानी के रूप में अपने सभी धन के साथ भाग लेना पड़ा, उसे जंगलों के भीतर रहना पड़ा, जयद्रथ ने उसे जबरन हटाने की कोशिश की, उसने उसे छोड़ दिया एक साल तक एक नौकरानी के रूप में रहना पड़ा और उसके सभी बेटों को मार डाला गया। सुभद्रा के बारे में क्या? हालाँकि सुभद्रा को कौरवों के किसी भी अपमान का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन उनके बहादुर बेटे को महाभारत युद्ध में मार दिया गया था। उनकी बहू विधवा हो गई। सुभद्रा को 13 वर्षों तक पांडवों, उनके पति अर्जुन और द्रौपदी के परिवार से दूर रहना पड़ा। उसने द्वारका जाकर द्रौपदी के सभी पुत्रों और उसके पुत्र को पाला। वह अपने भाइयों के साथ द्वारका के महल में रहती थी लेकिन अपने परिवार से दूर थी। वल्लंधरा, हिडिम्बा, देविका, करेनुमति और पांडवों की अन्य सभी पत्नियां पांडवों से अपने जीवन के भीतर अधिक समय तक नहीं मिलीं। उनका विवाह विभिन्न पांडवों से हुआ था लेकिन हस्तिनापुर से दूर रहे। इसलिए वे ज्यादातर नहीं मिले। द्रौपदी और सुभद्रा जैसी महाभारत की महिलाएं उनके पति का समर्थन करने वाली बुद्धि और आत्मविश्वास का प्रदर्शन करने वाली सराहनीय लोग हैं जिन्होंने हस्तिनापुर के भविष्य को अद्भुत बना दिया है। कुछ लोगों ने लिखा है कि कर्ण सबसे अशुभ चरित्र है, लेकिन मैं ऐसा नहीं कहता क्योंकि उसने अपने जीवन में दुःख नहीं पाया, लेकिन उन समय की महिलाओं के बारे में सोचें, जिनके पास मामलों में कोई बात नहीं थी। उन महिलाओं के बारे में सोचें, जिन्हें युद्ध के भीतर अपने पति के मारे जाने के बाद उदासी और विधवाओं के साथ जीवन जीना पड़ा था। सभी कौरवों की विधवाएँ तब रोईं जब इन महिलाओं के पतियों ने अपना जीवन व्यतीत किया और दुख के साथ अपना जीवन व्यतीत किया। उन्होंने किसी भी गहने और नाज़ुक व्यंजनों और किसी एक के विशेष प्यार का आनंद नहीं लिया। कर्ण की पत्नियाँ भी दुःख के साथ जीवन व्यतीत कर सकती थीं। रानी द्रौपदी के बारे में सोचें, जिन्होंने मदद के लिए अपने पांच पतियों को बुलाया था, लेकिन उन्होंने धर्म के स्पष्टीकरण पर उन्हें दुष्ट दशासन से नहीं बचाया। भगवान कृष्ण का धन्यवाद जो द्रौपदी को बचाने आए। उस महिला के बारे में सोचिए जो श्री अवतार (रुक्मिणी) थी, जिसके भाई रुक्मी ने उसकी शादी शिशुपाल से करने का फैसला किया था, जबकि वह ऐसा नहीं चाहती थी। भगवान कृष्ण का धन्यवाद जिन्होंने उसे बचाया और उसे अपनी रानी बनाया। भगवान कृष्ण वास्तव में उनके चाहने वालों के तारणहार थे और उनसे ईमानदारी और विनम्रता से प्रार्थना की। कर्ण ने दुशासन से कहा था कि वह कुरुसभा के भीतर द्रौपदी का वध कर दे। यह वह था जिसने पवित्र द्रौपदी को अस्थिर कहा था और उसका अपमान किया था। इस बारे में आपको क्या कहना है? आपको लगता है कि कर्ण के पास वह नहीं था जो उसके जीवन में था? उनके जीवन में दुख था लेकिन जिस तरह से उन्होंने द्रौपदी का अपमान किया था, उसका अंत हुआ। यदि वह दुर्योधन का मित्र था, तो उसे यह बताना चाहिए था कि जो गलत था वह नहीं करना चाहिए लेकिन उसने अपने दुष्ट मित्र का समर्थन किया, जिसने कर्ण की सत्यता को भी समाप्त कर दिया। महाभारत की महिलाएं अपने परिवार के लिए अपने अंत तक वफादार साबित हुईं और यहां तक कि उनके पति के मारे जाने के बाद उन्होंने अपने बच्चों की देखभाल की। उन महिलाओं जैसे द्रौपदी, सुभद्रा, श्री रुक्मिणी, कुंती, हिडिम्बा और अन्य सरल महिलाएं नहीं थीं, जो आनंद और महलों के भीतर रहती थीं, लेकिन वे वही थीं, जिन्होंने जीवन के भीतर कठिनाइयों को देखा और फिर भी उत्कृष्टता प्राप्त की।
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#ॐ नमः शिवाय आरती के बाद क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं मंत्र किसी भी मंदिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मंत्रों का जप अनिवार्य रूप से किया जाता है, सभी देवी-देवताओं के मंत्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो यह मंत्र विशेष रूप से बोला जाता है l कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।। इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ इस प्रकार है । कर्पूरगौरं-कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले। करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं। संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं। भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं। सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है। मंत्र का पूरा अर्थ :- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है। यही मंत्र क्यों…. किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं….मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो।
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝अनमोल ज्ञान अन्य देवताओं की तरह ब्रह्माजी की पूजा क्यों नहीं की जाती है? ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ब्रह्मा सनातन धर्म के अनुसार सृजन के देव हैं। हिन्दू दर्शनशास्त्रों में ३ प्रमुख देव बताये गये है जिसमें ब्रह्मा सृष्टि के सर्जक, विष्णु पालक और महेश विलय करने वाले देवता हैं। व्यासलिखित पुराणों में ब्रह्मा का वर्णन किया गया है कि उनके चार मुख हैं, जो चार दिशाओं में देखते हैं। ब्रह्मा को स्वयंभू (स्वयं जन्म लेने वाला) और चार वेदों का निर्माता भी कहा जाता है। हिन्दू विश्वास के अनुसार हर वेद ब्रह्मा के एक मुँह से निकला था। भगवान ब्रह्मा त्रिदेवों में सबसे पहले आते हैं। ये लोकपितामह होने के कारण सभी के कल्याण की कामनाकरते हैं क्योंकि सभी इनकी प्रजा हैं। देवी सावित्री और सरस्वतीजी के अधिष्ठाता होने के कारण ज्ञान, विद्या व समस्त मंगलमयी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इनकी आराधना बहुत फलदायी है। वे ही ‘विधाता’ कहलाते हैं। भगवान ब्रह्मा की पूजा आराधना का एक विशिष्ट सम्प्रदाय है जो ‘वैखानस आगम’ के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्माजी के नाम से श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, स्मार्तसूत्र तथा स्मृतियां प्राप्त होती हैं। ब्रह्माजी की सब जगह अमूर्त उपासना होती है । सभी प्रकार के सर्वतोभद्र, लिंगतोभद्र तथा वास्तु आदि चक्रों में उनकी पूजा मुख्य स्थान में होती है किन्तु मन्दिरों के रूप में उनकी पूजा मुख्यत: पुष्कर तथा ब्रह्मावर्त क्षेत्र (बिठूर) में होती है। मध्व-सम्प्रदाय के आदि प्रवर्तक आचार्य ब्रह्माजी ही माने गये हैं इसलिए उडूपी आदि मुख्य पीठों में इनकी बड़े आदर से पूजा आराधना की जाती है। अन्य देवताओं की तरह ब्रह्माजी की पूजा क्यों नहीं की जाती है? भगवान विष्णु, शिवजी, श्रीकृष्ण, श्रीराम, देवी दुर्गा और हनुमानजी की प्रतिमा की तरह ब्रह्माजी की प्रतिमा की पूजा न होने का कारण पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड में दिया गया है। पुष्कर के महायज्ञ में सभी देवता और देवपत्नियां उपस्थित हो गये और सभी की पूजा आदि के पश्चात् हवन की तैयारी होने लगी, किन्तु ब्रह्माजी की पत्नी सरस्वतीजी देवपत्नियों के बुलाये जाने पर भी विलम्ब करती गईं। बिना पत्नी के यज्ञ का विधान नहीं है और यज्ञ आरम्भ करने में बहुत बिलम्ब देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने कुछ समय के लिए सावित्री नाम की कन्या को ब्रह्माजी के वामभाग में बैठा दिया। कुछ देर बाद जब सरस्वतीजी वहां पहुंचीं तो वे यह सब देखकर क्रुद्ध हो गयीं और उन्होंने देवताओं को बिना विचार किये काम करने के कारण संतानरहित होने का शाप दे दिया और ब्रह्माजी को पुष्कर आदि कुछ स्थानों को छोड़कर अन्य जगह मन्दिर में प्रतिमा रूप में पूजित न होने का शाप दे दिया। यही कारण है कि ब्रह्माजी की मूर्ति रूप में पूजा-आराधना अन्य जगह नहीं होती है। किन्तु इससे ब्रह्माजी का महत्व कम नहीं होता क्योंकि... ▪️ बारह भागवताचार्यों (भगवान ब्रह्मा, भगवान शंकर, देवर्षि नारद, सनकादि कुमार, महर्षि कपिल, महाराज,मनु, भक्त प्रह्लाद, महाराज जनक, भीष्मपितामह, दैत्यराज बलि, महामुनि शुकदेवजी और यमराजजी) में ब्रह्माजी का प्रथम स्थान है। सृष्टि के आदि में भगवान शेषशायी विष्णु की नाभि से एक ज्योतिर्मय कमल प्रलयसिन्धु में प्रकट हुआ और उसी कमल की कर्णिका पर ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने यह देखने के लिए कि यह कमल कहां से निकला है, उसके नाल छिद्र में प्रवेश किया और सहस्त्रों वर्षों तक उस नाल का पता लगाते रहे। पर जब कोई पता न लगा तो उसी समय अव्यक्त वाणी में उन्हें ‘तप’ शब्द सुनाई दिया और वे दीर्घकाल तक तप करते रहे। उन्हें अंत:करण में भगवान के दर्शन हुए और भगवान ने चार श्लोकों में ‘चतु:श्लोकी भागवत’ का उपदेश किया। ब्रह्माजी ने यह उपदेश देवर्षि नारद को और नारदजी ने भगवान व्यासजी को यह उपदेश किया। व्यासजी ने ‘श्रीमद्भागवत’ के रूप में इसे शुकदेवजी को पढ़ाया। इस प्रकार संसार में श्रीमद्भागवत के ज्ञान का प्रकाश फैला। ▪️ जब कभी पृथ्वी पर अधर्म और अनीति बढ़ जाती है तो पृथ्वी माता दुराचारियों के भार से पीड़ित होकर गौ का रूप धारण कर ब्रह्माजी के पास ही जाती हैं। इसी तरह जब देवता भी दैत्यों से पराजित होकर अपना राज्य खो बैठते हैं तो वे भी प्राय: ब्रह्माजी के पास ही जाते हैं। भगवान ब्रह्मा देवताओं के साथ भगवान विष्णु की स्तुति करते हैं और तब जैसा भी भगवान का आदेश होता है, वैसा कार्य करने का आदेश वे देवताओं को देते हैं। इस प्रकार भगवान के अधिकांश अवतार ब्रह्माजी की प्रार्थना से ही होते हैं। अत: भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में प्राय: ब्रह्माजी ही निमित्त बने हैं। ▪️ जब भी विश्वामित्र या पृथु जैसे समर्थशाली सृष्टि में व्यतिक्रम करने लगते हैं तो सृष्टि में सामंजस्य बनाये रखने के लिए उन्हें समझाने के लिए ब्रह्माजी को ही आना पड़ता है। ▪️ ब्रह्माजी के चार मुखों से चार वेद; पूर्व मुख से ऋग्वेद, दक्षिण मुख से यजुर्वेद, पश्चिम मुख से सामवेद तथा उत्तर मुख से अथर्ववेद का आविर्भाव हुआ। इनके अतिरिक्त उपवेदों के साथ इतिहास पुराण के रूप में ‘पंचम वेद’ का भी ब्रह्माजी के मुख से आविर्भाव हुआ। अथर्ववेद तो ब्रह्माजी के नाम पर है इसलिए ‘ब्रह्मवेद’ भी कहलाता है। ▪️ इनके अतिरिक्त यज्ञ के होता, उद्गाता, अर्ध्वयु और ब्रह्मा आदि ऋत्विज् भी ब्रह्माजी से ही प्रकट हुए हैं। यज्ञ के मुख्य निरीक्षक ऋत्विज् को ‘ब्रह्मा’ नाम से जाना जाता है जो प्राय: यज्ञकुण्ड के दक्षिण दिशा में स्थित होकर यज्ञ-रक्षा और निरीक्षण का कार्य करता है। ▪️ ब्रह्माजी का यज्ञादि में सादर आवाहन-पूजन करके आहुतियां प्रदान की जाती हैं। ▪️ यज्ञ-कार्य में सबसे अधिक प्रयोग होने वाली पवित्र समिधा पलाश-वृक्ष की मानी जाती है जो ब्रह्माजी का ही स्वरूप माना जाता है। ▪️ देवता और असुरों की तपस्या में सबसे अधिक आराधना ब्रह्माजी की ही होती है। सृष्टिकर्म में लगे रहने से वे बहुत कठोर तप करने पर ही तुष्ट होते हैं। विप्रचित्ति, तारक, हिरण्यकशिपु, रावण, गजासुर तथा त्रिपुर आदि असुरों को इन्होंने ही अवध्य होने का वरदान दिया था। देवता, ऋषि, मुनि, गंधर्व, किन्नर और विद्याधर आदि इन्हीं की आराधना करते हैं। ▪️ ब्रह्माजी ने पुष्कर, प्रयाग और ब्रह्मावर्त क्षेत्र में विशाल यज्ञों का आयोजन किया था, इसलिए ब्रह्माजी के कमल के नाम पर पुष्कर और यज्ञ के नाम पर प्रयाग तीर्थ स्थापित हुए जिसे सभी तीर्थों के राजा, पुरोहित व गुरु माना गया है। काशी के मध्यभाग में ब्रह्माजी ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे जिस कारण इस स्थान को दशाश्वमेध-क्षेत्र कहते हैं। इसी कारण भगवान ब्रह्मा त्रिदेवों में सबसे पहले आते हैं। ये लोकपितामह होने के कारण सभी के कल्याण की कामना करते हैं क्योंकि सभी इनकी प्रजा हैं। देवी सावित्री और सरस्वतीजी के अधिष्ठाता होने के कारण ज्ञान, विद्या व समस्त मंगलमयी वस्तुओं की प्राप्ति के लिए इनकी आराधना बहुत फलदायी है। वे ही ‘विधाता’ कहलाते हैं।
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#श्री हरि विष्णु भगवान विष्णु के 'दशावतार' (दस अवतार) हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक हैं। शास्त्रों के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर पाप बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा करते हैं। भगवान विष्णु के दस अवतारों का विवरण नीचे दिया गया है: 1. मत्स्य अवतार (मछली) यह भगवान विष्णु का पहला अवतार था। जब एक दैत्य ने वेदों को चुराकर समुद्र की गहराई में छिपा दिया था, तब भगवान ने मछली का रूप धारण कर वेदों का उद्धार किया और प्रलय के समय राजा सत्यव्रत की रक्षा की। 2. कूर्म अवतार (कछुआ) समुद्र मंथन के समय जब मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने विशाल कछुए का रूप लिया और पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया, जिससे मंथन पूरा हो सका। 3. वराह अवतार (सूअर) जब हिरण्याक्ष राक्षस ने पृथ्वी को चुराकर समुद्र के नीचे छिपा दिया था, तब भगवान ने वराह (सूअर) रूप धारण कर उस राक्षस का वध किया और पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर बाहर निकाला। 4. नरसिंह अवतार (आधा मनुष्य, आधा शेर) अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए और अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए भगवान ने यह रूप लिया। उन्होंने न पूर्ण मनुष्य और न पूर्ण पशु के रूप में आकर धर्म की रक्षा की। 5. वामन अवतार (बौना ब्राह्मण) राजा बलि के अहंकार को तोड़ने और देवताओं को उनका स्वर्ग वापस दिलाने के लिए भगवान ने एक छोटे ब्राह्मण का रूप लिया और तीन पगों में तीनों लोकों को माप लिया। 6. परशुराम अवतार (क्रोधित ऋषि) अहंकारी और अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं के विनाश के लिए भगवान ने परशुराम के रूप में जन्म लिया। उनके पास एक अमोघ कुल्हाड़ी (परशु) थी। 7. राम अवतार (मर्यादा पुरुषोत्तम) त्रेता युग में रावण का वध करने और समाज को मर्यादा का पाठ पढ़ाने के लिए भगवान राम का जन्म हुआ। उनका जीवन सत्य और धर्म का आदर्श उदाहरण है। 8. कृष्ण अवतार (लीला पुरुषोत्तम) द्वापर युग में कंस का वध करने और महाभारत के युद्ध में अर्जुन का सारथी बनकर श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान देने के लिए भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। 9. बुद्ध अवतार (शांति के प्रतीक) संसार में अहिंसा, करुणा और शांति का प्रसार करने के लिए भगवान ने बुद्ध के रूप में जन्म लिया। उन्होंने जीव हत्या रोकने और मानव कल्याण का मार्ग दिखाया। 10. कल्कि अवतार (भविष्य का अवतार) शास्त्रों के अनुसार, यह अवतार कलियुग के अंत में होगा। भगवान कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होकर आएंगे और अधर्म का विनाश कर फिर से सतयुग की स्थापना करेंगे। निष्कर्ष ये दस अवतार क्रमिक विकास (Evolution) को भी दर्शाते हैं, जो जल से शुरू होकर (मत्स्य) अंत में एक पूर्ण विकसित मानव (राम, कृष्ण) तक पहुँचते हैं।
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#पौराणिक कथा #☝आज का ज्ञान नरसिंह भगवान और प्रह्लाद के बीच ज्ञान की बात!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा, लेकिन उसके उपरांत भी भगवान क्रोध में थे। अब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद सब देवता लोग आ गए, ब्रह्मा, शंकर भी आये। तब नारद मुनि सब ने कहा कि "भाई भगवान नरसिंह अवतार लिए है उनकी स्तुति करे, अभिनंदन करें, उनका धन्यवाद करना चाहिए, उन्होंने इतना बड़ा काम किया, इस लिए आप सब जाये उनके पास।" देवताओं ने पहले ही मना कर दिया। देवताओं ने कहा कि "अभी तो भगवान नरसिंह बड़े क्रोध में है, हमसे उनका यह स्वरूप देखा नहीं जा रहा है। हम सब देवता उनके इस स्वरूप से भयभीत है। अतएव हम नहीं जाएगे।" तो कौन जाएगा? यह प्रश्न हुआ। तो सबने शंकर जी को कहा की महाराज आप जाइये, आप तो प्रलय करने वाले है। तब शंकर जी ने कहा "नहीं-नहीं मेरी हिम्मत नहीं है, मैं नहीं जा सकता" तब ब्रह्मा से कहा गया, "आप तो सृष्टि करता है, आपकी दुनिया हैं, आपके लिए ही तो आए हैं।" ब्रह्मा जी कहते हैं "वह सब तो ठीक है। लेकिन मैं तो नहीं जाऊंगा।" तो फिर सब ने परामर्श किया की अब लक्ष्मी जी को बुलाया जाए और उनको बोला जाए। क्योंकि नरसिंह भगवान विष्णु जी के अवतार है और विष्णु जी की अर्धांगिनी लक्ष्मी जी है, इनको देख करके हो सकता है नरसिंह भगवान का क्रोध उतर जाए, जो विराट रूप इनका है वह विराट रूप शांत हो जाएगा और मुस्कुराहट वाला रूप आ जाएगा। इसलिए लक्ष्मी जी से कहा गया जाने को। तो लक्ष्मी जी ने कहा "मैं इस समय कोई अर्धांगिनी नहीं बनना चाहती हूँ। मैं अभी आप लोगों की बात नहीं मान सकती। मेरी हिम्मत नहीं है जाने की। नरसिंह भगवान का वह स्वरूप देखा नहीं जा रहा मुझसे, वो अनंत कोटि सूर्य के समान प्रकाश है व क्रोध भी है।" फिर सब लोग हार गए कोई भी तैयार नहीं हुआ जाने को। तब नारद जी ने तरकीब (सुझाव) दिया और उन्होंने कहा कि "देखो भाई! यह घपड़-सपड़ करना ठीक नहीं है। बड़ी बदनामी की बात है की मृत्यु लोक में इतना बड़ा काम किया भगवान ने और कोई उनकी स्तुति ना करे! अभिनंदन ना करें।" इसलिए नारद जी ने कहा कि "प्रह्लाद को भेजो!" प्रह्लाद के पास सब लोग गए और कहा कि "बेटा तुम्हारे पिता को मार कर के नरसिंह भगवान खड़े हैं। उनके पास जाओ ना!" प्रह्लाद जी को डर नहीं लगा, वो आराम से लेफ्ट राइट करते हुए पहुंच गए नरसिंह भगवान के पास। उस वक्त प्रह्लाद जी ५-६ वर्ष के थे ही। जब वह गए नरसिंह भगवान के पास तो भगवान का जो विराट स्वरूप, आंतों की माला पहने हुए, खून से लतपत नाख़ून था। तो प्रह्लाद को देख कर मुस्कुराने लगे। फिर समस्त देवी-देवता, ब्रह्मा, शंकर आदि नरसिंह भगवान के पास जाकर उनकी स्तुति व अभिनंदन करने लगे। तब नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद से कहा (भागवत ७.९.५२) "वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्" भावार्थ: बेटा वर मांगों। जो कुछ मांगोंगे वह सब मैं देने को तैयार हूँ। सब मांगते हैं तुम भी मांगों बेटा। तब प्रह्लाद ने मन ही मन कहा अच्छा! बेवकूफ बनाना शुरु हो गया, कहते हैं वर मांगो! तब प्रह्लाद ने कहा (भागवत ७.१०.४) "यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्" भावार्थ: हे प्रभु! जो दास कुछ भी कामना लेकर जाता है स्वामी के पास। तो वह दास नहीं है, वह तो बनिया (व्यापारी) है। ऐसा व्यापार तो हमारे संसार में रोज होता है। हमने ₹10 दिया तो उसने ₹10 की मिठाई दे दिया। यह तो व्यापार है। दास तो केवल दासता करता है। यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ। कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ भावार्थ: प्रह्लाद जी कहते हैं कि अगर प्रभु आप देना ही चाहते हैं और अगर आपकी आज्ञा है कि मेरी आज्ञा है मानना ही पड़ेगा। तो ऐसा कोई आपका आदेश हो, तो प्रभु! यह वर दीजिए कि मैं आपसे कुछ न मांगू, ऐसा मेरा अंतःकरण कर दीजिए की कभी मांगने की बुद्धि पैदा ही ना हो, वर्तमान में तो नहीं है प्रभु! लेकिन आगे भी ना हो ऐसा वर दे दीजिए। क्योंकि मैं तो अकाम हूँ। मैं तो सेवा चाहता हुँ। मैं कुछ मांगने नहीं आया हुँ और वास्तविकता यह है कि आपको भी हमसे कुछ नहीं चाहिए। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि वर मांग? (भागवत ७.१०.८) इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः। ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ भावार्थ: प्रभु! यह कामना ऐसी बुरी चीज है की अगर कामना पैदा हो गई, तो इंद्रियां, मन, प्राण, आत्मा, धर्म, धैर्य, लज्जा, श्री, तेज, सत्य, सब नष्ट हो जाते हैं। यह कामना की बीमारी मुझको नहीं है इसलिए आप देना ही चाहते है तो मुझे ऐसा वर दीजिए कि कामना कभी पैदा ही ना हो। नरसिंह भगवान मुस्कुराने लगे उन्होंने कहा कि ठीक है, जैसा तू कहता है वैसा ही होगा। अब मेरी आज्ञा सुन, (भागवत ७.१०.११) "तथापि मन्वन्तरमेतदत्र दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्" भावार्थ: एक मन्वन्तर राज्य करो। (४३२०००० मानव वर्ष का चार युग, ७१ बार चार युग बीत जाये तो १ मन्वन्तर होता है जो ३०६७२०००० मानव वर्ष के बराबर है।) लगभग ३० करोड़ वर्ष तक राज्य करो, यह आज्ञा नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को दिया। ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए और सब लोगों ने कहा कि बोलिए नरसिंह भगवान की जय।
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