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जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕 ⁉️ जब जीवन का उद्देश्य अंततः परम सत्ता में ही जाकर विलीन हो जाना है, तो वह सत्ता फिर " मन " और "संबंधों " के भ्रमजाल में उलझने के लिए मनुष्य को प्रेरित क्यों करती है ? हम अच्छी तरह जानते हैं कि "मोह " दुःख देता है फिर भी उसके पीछे पागल क्यों बने रहते हैं ? ⁉️ ❣️यह स्थिति ऐसी लगती है ,जैसे चिकित्सक रोगी को जिन चीज़ों के सेवन से मना करता और वही चीज़ेँ वह थाल में परोस कर दे भी देता हो ??❣️ 🧑‍🍼 जीवन वास्तव में अबूझ पहेली है l जब "जीव" ईश्वर का अंश है,अविनाशी है तब फिर ईश्वर अपने ही अंश को मोह और तृष्णा के बंधन मे बांधता ही क्यों है ? जीव के सामने भ्रम की स्थिति आती ही क्यों है ? 🧑‍🍼 ✍️उत्तर :- कुमति कीन्ह सब विश्व दुःखारी । एकमात्र अज्ञान ही सभी दुखों का मूल है । मन को बचपन से ही यह समझाया जाता है कि इसमें सुख है , इसमें सुख है । लेकिन मायिक जगत के किसी भी पदार्थ में कोई सुख नहीं है। न किसी मे सुख है न किसी मे दुख। जो हम इन पदार्थों में सुख का आभास करते हैं वह मात्र हमारा आभास या कल्पना है । जैसे हमें बहुत दुख मिल रहा है , तो जब वह दुख हटता है तो हम उसे सुख समझ लेते हैं और हमारा मन अनादिकाल से अभ्यास रत है संसार में सुख ढूंढने का । इसी अभ्यास के कारण हम बार बार संसार की ओर attract होते है। हमें यह बार बार बताया गया है कि यही हमारे सम्बन्धी हैं , इन्हीं से सुख मिलेगा ,इसीलिए मन बार बार उसी में जाता है । इस संसार मे न सुख है न दुख है। ये सुख दुख हम केवल अपनी कल्पना के आधार पर उसमें आभास करते हैं ।। क्योंकि इंसान अज्ञान से ग्रसित है। ✍️ कुमति कीन्ह सब विश्व दुःखारी । 🧘एकमात्र गलत बुद्धि के कारण लोग दुःखी होते हैं । जिस वस्तु में आनंद है उसे छोड़कर उसके पीछे भागते हैं जिसमें मात्र दुःख के अलावा कुछ नहीं है। माया और माया से बनी जितनी वस्तुएं या पदार्थ हैं सब दुखमय है। दुखमय तो नहीं , लेकिन उनमें कोई आनंद नहीं है और जीव आनंद का अंश है और वह आनंद चाहता है और प्रतिक्षण उसको पाने के लिए कार्य करता है । लेकिन उसका चुनाव गलत होता है । वह सांसारिक उपभोग और वस्तुओं को आनंद का द्योतक मानता है जो कि है नहीं । फिर इसी कारण और दुखी होता है और होता ही जाता है और यह ईश्वर नहीं बांधता । हम स्वयं बंधते हैं और नाम लगाते हैं ईश्वर का ।🧘 🕉️ईश्वर तो कब से हमारी ओर देख रहा है कि कभी तो जीव मेरी ओर मुड़ेगा और मुझे प्राप्त करेगा । लेकिन हम 36 की तरह भगवान से मुंह मोड कर बैठे हैं , इसको हमें 63 करना है । बस भगवान की तरफ मुड़ जाना है। हम उस बंदर की तरह हैं जो मटके में चने को लेने के लिए मुट्ठी बंद किये हुए है और चिल्ला रहा है कि मैं फंस गया , मेरा हाथ नहीं निकल रहा है । बल्कि जैसे ही वह मुठ्ठी खोल देगा ,उसका हाथ बाहर निकल जायेगा और वह घड़े से मुक्त हो जाएगा । लेकिन उसका लोभ उसे चने वाली मुट्ठी छोड़ने नहीं देता और अंत मे वह मदारियों द्वारा पकड़ लिया जाता है । अब बंदर भले मटके को दोष देता रहे ,लेकिन सब जानते हैं कि दोष बंदर के लोभ का है।🕉️
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 मृत्यु के पश्चात मनुष्य के साथ मनुष्य की पाँच वस्तुएँ साथ जाती हैं.. *1-(कामना ) ::-* यदि मृत्य के समय हमारे मन मे किसी वस्तु विशेष के प्रति कोई आसक्ति शेष रह जाती है ।कोई इक्षा अधूरी रह जाती है।*कोई अपूर्ण कामना रह जाती है।तो मरणोपरांत भी वही कामना उस जीवात्मा के साथ जाती है।* *2-(वासना) ::-* वासना कामना की ही साथी है। *वासना का अर्थ केवल शारिरिक भोग से नही अपितु इस संसार मे भोगे हुए हर उस सुख से है ।जो उस जीवात्मा को आनन्दित करता है। फिर वो घर हो ,पैसा हो ,गाड़ी हो, रूतबा हो,या शौर्य।* मृत्यु के बाद भी ये अधूरी वासनाएं मनुष्य के साथ ही जाती हैं।और मोक्ष प्राप्ति में बाधक होती है। *3-(कर्म) ::-* मृत्यु के बाद हमारे द्वारा किये गए कर्म चाहे वो सुकर्म हो अथवा कुकर्म हमारे साथ ही जाता है। *मरणोपरांत जीवात्मा अपने द्वारा किये गए कर्मो की पूँजी भी साथ ले जाता है। जिस के हिसाब किताब द्वारा उस जीवात्मा का यानी हमारा अगला जन्म निर्धारित किया जाता है।* *4-(कर्ज़ ) ::-* यदि हमने -आपने मनुष्य जीवन मे कभी भी किसी प्रकार का ऋण लिया हो, *तो उस ऋण को यथासम्भव उतार देना चाहिए। ताकि मरणोपरांत इसलोक से उस ऋण को उसलोक में अपने साथ न ले जाना पड़े।* *5-( पुण्य) ::-* हमारे द्वारा किये गए *दान-दक्षिणा व परमार्थ के कार्य ही हमारे पुण्यों की पूंजी होती है।* इसलिए हमें *समय-समय पर अपने सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा एवं परमार्थ और परोपकार अवश्य ही करने चाहिए।* *इन्ही पांचों वस्तुओं से ही मनुष्य को इस मृत्युलोक को छोड़ कर परलोक जाने पर उस लोक अथवा अगले जन्म की प्रक्रिया का चयन किया जाता है..!!
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 🍁*"..भगवान् से कैसे छिपें-कहाँ छिपें.."*🍁 👩‍❤️‍👩अपना कोई एक अत्यन्त प्रिय व्यक्ति मिल जाय तो बड़ा आनन्द आता है। परन्तु जब सब रूपों में ही अपने अत्यन्त प्रिय इष्ट भगवान् मिलें तो आनन्द का क्या ठिकाना है! इसलिये सब रूपों में अपने प्यारे को देख-देख कर प्रसन्न होते रहें, मस्त होते रहे। कभी भगवान् सौम्य रूप से आते हैं, कभी क्रूर- रूप से आते हैं, कभी ठण्ड-रूप से आते हैं, कभी गरमी रूप से आते हैं, कभी वायु-रूप से आते हैं, कभी वर्षा-रूप से आते हैं, कभी बिजली-रूप से चमकते हैं, कभी मेघ-रूप से गर्जना करते हैं। तात्पर्य है कि अनेक रूपों से भगवान्- ही-भगवान् आते हैं। जहाँ मन जाय, वहीं भगवान् हैं। अब मन को एकाग्र करने की तकलीफ क्यों करें? मन को खुला छोड़ दें। यह दृढ़ विचार कर लें कि मेरा मन जहाँ भी जाय, भगवान् में ही जाता है और मेरे मन में जो भी आये, भगवान् ही आते हैं; क्योंकि सब कुछ एक भगवान् ही हैं।👩‍❤️‍👩 🕉️भगवान् कहते हैं -🕉️ *यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।* *तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥* 🧘'जो भक्त सब में मुझे देखता है और मुझमें सबको देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।'🧘 ✍️जैसे सब जगह बर्फ-ही-बर्फ पड़ी हो तो बर्फ कैसे छिपेगी ? बर्फ के पीछे बर्फ रखने पर भी बर्फ ही दीखेगी! ऐसे ही जब सब रूपों में भगवान् ही हैं, तो फिर वे कैसे छिपें, कहाँ छिपें और किसके पीछे छिपें ?✍️ 🙏*राम !.राम!.राम !!!*🙏
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#🙏गीता ज्ञान🛕 🌺।।श्रीहरि:।। 🌺 🕉️ परमात्मा की प्राप्ति भी करनी है - इसमें ' भी' की जगह ' ही ' हो जाए और ' ही ' पर दृढ़ रहें कि हमें तो केवल इस तरफ ही चलना है । दु:ख पाएं, सुख पाएं, कुछ भी हो जाए , हमें तो अपना उद्धार करना है - ऐसा पक्का विचार करके चलें तो बहुत सुगमता से, बहुत जल्दी कल्याण हो जाए। इसमें खुद का विचार ही काम आएगा - 🕉️ उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥(गीता ६ । ५) 🧘' स्वयं अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे ; क्योंकि यह आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।'🧘 🌟 नारायण !नारायण ! !नारायण! नारायण!🌟
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#जय श्री राम प्रभु राम-सीता माता हनुमान जी से बोले --- वृक्ष की शोभा को देखकर भगवान् श्रीराम हनुमानजी से बोले – ‘देखो हनुमान ! यह लता कितनी सुन्दर है | वृक्ष के चारों ओर कैसी छायी हुई है | यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पतियों से इस वृक्ष की कैसी शोभा बढा रही है इससे जंगल के अन्य सब वृक्षों से यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख रहा है | इतना ही नहीं, इस वृक्ष के कारण ही सारे जंगल की शोभा हो रही है | इस लता के कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्ष का आश्रय लेते हैं | धन्य है यह लता !’ भगवान् श्रीराम के मुख से लता की प्रशंसा सुनकर सीता जी हनुमानजी से बोलीं – ‘देखो बेटा हनुमान ! तुमने ख्याल किया कि नहीं ? देखो, इस लता का ऊपर चढ़ जाना, फूल पतों से छा जाना, तन्तुओं का फ़ैल जाना – ये सब वृक्ष के आश्रित हैं, वृक्ष के कारण ही हैं | इस लता की शोभा भी वृक्ष के ही कारण है | इस वास्ते मूल में महिमा तो वृक्ष की ही है | आधार तो वृक्ष ही है | वृक्ष के सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है ? कैसे छा सकती है ? अब बोलो हनुमान ! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्ष की ही हुई न ?’ रामजी ने कहा – ‘क्यों हनुमान ! यह महिमा तो लता की ही हुई न ?’ हनुमानजी बोले – ‘हमें तो तीसरी बात ही सूझती है |’ सीताजी ने पूछा – ‘वह क्या है बेटा ?’ हनुमानजी ने कहा –‘माँ ! वृक्ष और लता की छाया बड़ी सुन्दर है | इस वास्ते हमें तो इन दोनों की छाया में रहना ही अच्छा लगता है, अर्थात हमें तो आप दोनों की छाया (चरणों का आश्रय) – में रहना ही अच्छा लगता है |’ सेवक सुत पति मातु भरोसें | रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें || (मानस. ४/३/२)
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#👉 लोगों के लिए सीख👈 #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं 🌟 || सकारात्मक दृष्टि रखें || 🌟 सुख अथवा दुःख, जिस पर भी आप ध्यान केंद्रित करेंगे वही बात जीवन में प्रभावी हो जायेगी। यदि आप केवल दुःख पर ध्यान देंगे तो हमेशा दुःखी रहेंगे और सुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा सुखी रहेंगे। यह जीवन का शाश्वत नियम है, कि आप जिस पर ध्यान देंगे वही बात जीवन में सक्रिय हो जाती है। विज्ञान ने भी सिद्ध किया है, कि जीवन में जिस वस्तु की आप उपेक्षा करने लगते हैं, वो वस्तु धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोना प्रारंभ कर देती है। प्रेम हो, करुणा हो, जीवन का उल्लास हो, प्रसन्नता हो, सुख हो अथवा दुःख ही क्यों न हो, जिसकी उपेक्षा करेंगे वही आपके जीवन में अपना प्रभाव कम करता चला जायेगा। जहाँ सकारात्मक दृष्टि जीवन में सुख की जननी होती है, वहीं नकारात्मक दृष्टि जीवन को दुःख और विषाद से भी भर देती है। इसलिए जीवन में सदा सकारात्मक दृष्टि ही रखी जानी चाहिए ताकि व्यक्ति के दुःख और विषाद जैसे काल्पनिक शत्रुओं का समूल नाश हो सके।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
👉 लोगों के लिए सीख👈 - सुविचर हारने ना देंखदको कभी खखेंहोसलों को सदा ज़िंदा रिश्ते कमही रखिएसफरमें लेकिन रखिए सिर्फ ছ্ুদিনয सुविचर हारने ना देंखदको कभी खखेंहोसलों को सदा ज़िंदा रिश्ते कमही रखिएसफरमें लेकिन रखिए सिर्फ ছ্ুদিনয - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾 🌸 सुप्रभातम् नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तम; मनोरथाः दुर्जनमानवानाम् । त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम; देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।। ● 'राजा का चित्त, कंजूस का धन, दुर्जनों का मनोरथ, पुरुष का भाग्य और स्त्रियों का चरित्र देवता तक नहीं जान पाते तो मनुष्यों की तो बात ही क्या है?' जय श्री कृष्ण🙏🏻 🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾🪾
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#❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 🛐“पूर्व-जन्म के दोष”🛐 एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था। धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था। जब भी उसे शौच, स्नान आदि के लिये जाना होता था वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे। धीरे-धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी-कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे। इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे। जब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा। एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है। अब ये रोज का नियम हो गया। एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है। एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड़ लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है ? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं। तभी अन्धेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआ और उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया। वह व्यक्ति रोते हुये कहता है–‘हे प्रभु ! आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे हैं। यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना।’ प्रभु कहते है–‘जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध हैं। आप मेरे सच्चे साधक है, हर समय मेरा नाम जप करते हैं इसलिये मैं आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ।’ व्यक्ति कहता है–‘क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है, क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ?’ प्रभु कहते है–‘मेरी कृपा सर्वोपरि हैं ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है, लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा। यही कर्म नियम है। इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ।’ प्रभु कहते है–‘प्रारब्ध तीन तरह के होते है–मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम। मन्द प्रारब्ध मेरा नाम जपने से कट जाते हैं।। तीव्र प्रारब्ध किसी सच्चे सन्त का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते हैं। परन्तु तीव्रतम प्रारब्ध भुगतने ही पडते है। लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं, उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ।’ प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर॥ ॥जय जय श्री राधे॥
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 369) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ।। २८ ।। अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा। इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं ।। २८ ।। वैशम्पायन उवाच (ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् । ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ।। सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्र परंतपान् ।। अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् । स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ।। कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्‌याश्च बलिनां श्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ।। भर्ना तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः । युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ।। मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्च नियमैः श्रान्ता मनोवाक्कायजैः शुभैः ।। व्रतोपवासनियमैः कृच्छ्रेश्चान्द्रायणादिभिः । भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ।। येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा । देहपोषणसंयुक्ता विषयैर्हतचेतना ।। देहव्ययेन नरकं महदाप्नोत्यसंशयः । तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्नुयुः ।। भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा । तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ।। तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्म शोभनम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा- 'सुभगे ! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभरखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता। कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्री के बलवानों में श्रेष्ठ महारथी शल्य उसके भाई हैं। इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं। जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है। वह क्षार (पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है। वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है। किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस (दुर्लभमनुष्य-) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके निःसंदेह महान् नरकको प्राप्त होती है। अतः साध्वी स्त्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय-कामनाएँ नष्ट हो जायें। इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है। इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है। अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो'। कुन्त्युवाच यथा पाण्डोश्च निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च । आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ।। यथाऽऽहुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् । भर्तुश्च मम पुत्राणां मम चैव न संशयः ।। कुन्ती बोली-महात्माओ ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है। आपका आदेश में सिर-माथे रखती हूँ। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगी। पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने-आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ- इसमें तनिक भी संशय नहीं है। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतमु श्रीमहाभारतमु - ShareChat
. ॐ ॥ श्री परमात्मने नम: ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 🌺 श्रीमद्भगवद्गीता 🌺 अध्याय - १२ : श्लोक १ से १० अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ भावार्थ : अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?॥1॥ श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ भावार्थ : श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं॥2॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ भावार्थ : परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥3-4॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ भावार्थ : उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है॥5॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ भावार्थ : परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)॥6॥ तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥ भावार्थ : हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ॥7॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ भावार्थ : मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥8॥ अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ भावार्थ : यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥9॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ भावार्थ : यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥10॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ हरि: शरणं हरि: शरणं हरि: शरणं हरि: शरणम् । हरि: शरणं हरि: शरणं हरि: शरणं हरि: शरणम् ॥ राम राम🙏🙏राम राम #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕
🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 - हरि शरणं वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च कृष्णाय नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण को, और जो देवकी नंदन है अर्थात देवकी के पुत्र को, ग्वाल नंद के पुत्र को, जो स्वयं भगवान श्री गोविंद हैं॰ मैं उन्हें नमस्कार 8 करता हरि शरणं वासुदेवाय देवकी नन्दनाय च कृष्णाय नन्दगोप कुमाराय गोविन्दाय नमो नमः वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण को, और जो देवकी नंदन है अर्थात देवकी के पुत्र को, ग्वाल नंद के पुत्र को, जो स्वयं भगवान श्री गोविंद हैं॰ मैं उन्हें नमस्कार 8 करता - ShareChat