⭐ प्रेरणादायक कहानियां
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Sachin Sharma
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नानी का फ़ोन - एक मार्मिक कहानी कहानी की शुरुआत सर्दियों की हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। छोटे से घर में एक बूढ़ी औरत—मीरा देवी, जिसे पूरा मोहल्ला प्यार से “नानी” बुलाता था—अपने पुराने और धीमे फोन को बार-बार अनलॉक कर रही थी। हर दिन की तरह आज भी वो इंतज़ार में थीं। एक वीडियो कॉल… बस एक बार। कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए था उन्हें। बस अपनी बेटी की आवाज़, अपने नाती की हंसी… और दो मिनट की बात। लेकिन आज फिर स्क्रीन पर वही लिखा आया— “Call declined.” “User busy.” मीरा देवी मुस्कुराईं… लेकिन वो मुस्कान सिर्फ होंठों तक सिमट कर रह गई। उन्होंने धीमी आवाज़ में खुद से कहा, “कोई बात नहीं… शायद काम में होंगे। बाद में कर लेंगे।” कमरे में सन्नाटा था। दीवारों पर पुराने फोटो टंगे थे — बेटियों की शादी, दामाद की मुस्कान, नाती के जन्म की तस्वीरें। लेकिन असली जिंदगी में… फोटोज मुस्कुराती रही। और रिश्ते चुप होते गए। --- नाती आरव—जिसने कभी सोचा ही नहीं था… आरव 17 साल का लड़का था। व्यस्त अपनी दुनिया में — फोन, सोशल मीडिया, दोस्तों और पढ़ाई में। नानी को वो बहुत प्यार करता था, लेकिन “बात बाद में कर लूँगा” कहकर अक्सर टाल देता था। उस दिन भी जब नानी ने उसे वीडियो कॉल किया, वो एक गेम खेल रहा था। स्क्रीन पर नाम चमका: “Nani Calling…” आरव ने नज़र डाली, एक सेकंड रुका… और फौरन फोन साइड में रख दिया। “बाद में बात कर लूँगा…” उसने खुद से कहा। लेकिन वो ‘बाद में’ कई हफ्तों से कभी आया ही नहीं था। --- नानी का फोन… आज कुछ अलग था शाम तक नानी ने शायद 6–7 बार कॉल किया था। हर बार काट दिया गया या किसी ने उठाया ही नहीं। पर आज आरव को थोड़ा अजीब लगा। नानी इतनी बार कॉल नहीं करती थीं। रात को उसने मां से पूछा, “मां, नानी ठीक तो हैं? क्यों बार-बार कॉल कर रही थीं?” मां ने थकी आवाज़ में कहा, “मुझे क्या पता? सुबह कॉल की थी, बोलीं कि तुमसे बात करनी है। शायद वही होगी।” बस… बात वहीं खत्म। पर आरव के मन में एक बेचैनी बैठ चुकी थी। --- अगली सुबह — एक चुभता हुआ सन्नाटा सुबह उठकर आरव ने मोबाइल देखा। एक मिस्ड कॉल फिर दिखाई दी — रात 1:47 AM की। “Nani Calling…” उसके दिल की धड़कन एक पल को रुक गई। नानी रात में क्यों कॉल करेंगी? वो घबराहट में तुरंत नानी को कॉल करने लगा। लेकिन फोन स्विच्ड ऑफ आ रहा था। पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसने कई दिनों से नानी को “जानबूझकर” इग्नोर किया है। पहली बार उसे लगने लगा कि शायद सच में कुछ गड़बड़ है। वो तुरंत अपनी मां के पास गया। दोनों ने जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑटो लिया और नानी के घर पहुँचे। घर का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था। आरव ने धीरे से पुकारा, “नानी…?” कोई जवाब नहीं। घर में अजीब सा सन्नाटा था। मां भागती हुई अंदर गईं। और फिर… एक पल जो कभी भुलाया नहीं जा सकता। मीरा देवी अपने कुर्सी पर ही सोई हुई थीं। उनके हाथ में फोन था। स्क्रीन पर वही—अधूरी वीडियो कॉल। उनकी सांसे… रुक चुकी थीं। कमरे में पड़ोसन खड़ी थी। वो बोली, “रात में प्रकॉप हुआ होगा… उन्होंने कई बार किसी को फोन करने की कोशिश भी की थी।” आरव वहीं बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे। उसे अचानक याद आया — रात 1:47 की मिस्ड कॉल… दिनभर के ignored calls… और वो एक सेकंड जिसमें उसने गेम खेलते हुए नानी की कॉल काट दी थी। उसे ऐसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। --- नानी की आखिरी लिखी हुई पर्ची घर साफ करते समय आरव को मेज के नीचे एक छोटी सी मुड़ी हुई पर्ची मिली। लिखा था: > “आरव, तुम्हारी बोर्ड परीक्षा है… बस दो मिनट तुमसे बात करनी थी।” और नीचे “अपना ख्याल रखना — नानी।” आरव टूटकर रो पड़ा। उसे एहसास हुआ कि नानी अकेली थीं… और वो हमेशा सोचता रहा कि “बाद में बात कर लूंगा।” --- आज भी जब फोन बजता है… अब वो हर कॉल उठाता है। अपनी मां की, अपनी मौसी की, अपने पापा की, हर किसी की। क्योंकि उसे समझ आ चुका था कि एक दिन… हर फोन आखिरी फोन बन सकता है। और पछतावे की आग जिंदगी भर जलाती है। --- कहानी का संदेश हम अक्सर सोचते हैं कि “बाद में कर लूंगा…” “अभी काम है…” “फुर्सत में कॉल कर दूंगा…” पर बूढ़े माता-पिता, नानी-दादी, दादा-नाना… ये लोग जल्दी नाराज़ नहीं होते, लेकिन हर मिस्ड कॉल के पीछे एक उम्मीद टूट जाती है। थोड़ा सा वक्त… 2 मिनट… एक “हाँ नानी, कैसी हो?” बस इतना काफी होता है किसी बूढ़े दिल के लिए। --- तो दोस्तों अगर आपको मेरी लिखी हुई यह कहानी पसंद आई है, तो कृपया मुझे Follow जरूर करें 🙏 कहानी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास जरूर भेजें 🙏 --- #📚कविता-कहानी संग्रह #📓 हिंदी साहित्य #👀रोमांचक कहानियाँ 🕵️‍♂️ #⭐ प्रेरणादायक कहानियां #☝अनमोल ज्ञान
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Sachin Sharma
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शीर्षक - बीवी का सच "अरे! यह क्या बना दिया तुमने?" विक्रम ने खाने की प्लेट को धक्का देते हुए कहा। "रोज-रोज यही बेस्वाद खाना! पता नहीं तुम दिन भर करती क्या हो?" प्रिया चुपचाप खड़ी रही। यह कोई नई बात नहीं थी। पिछले पाँच साल की शादीशुदा जिंदगी में विक्रम रोज कुछ न कुछ शिकायत जरूर करता था। कभी खाना ठीक नहीं, कभी कपड़े सही से प्रेस नहीं हुए, कभी घर की सफाई में कमी। "विक्रम, मैंने आज ऑफिस से आकर बच्चों को तैयार किया, उनका होमवर्क करवाया, फिर खाना बनाया। थोड़ी थकान हो गई थी तो..." प्रिया ने समझाने की कोशिश की। "अरे वाह! तुम्हें थकान हो जाती है? मैं पूरे दिन ऑफिस में जान खपाता हूँ, पर क्या मैं शिकायत करता हूँ? तुम घर पर हो, आराम से हो, बस थोड़ा सा काम है। वो भी ढंग से नहीं होता!" विक्रम झल्लाकर बोला। छह साल के बेटे अर्जुन और चार साल की बेटी अनया डरी-सहमी अपने कमरे में चली गईं। रोज का यही दृश्य था। पापा मम्मी को डांटते थे और बच्चे चुपचाप अपने कमरे में छुप जाते थे। प्रिया की आँखों में आँसू आ गए। उसने चुपचाप बर्तन उठाए और किचन में चली गई। उस रात उसने फैसला कर लिया। सुबह विक्रम के ऑफिस जाने के बाद, उसने अपना और बच्चों का सामान पैक किया और एक चिट्ठी छोड़ी: "विक्रम, मैं बच्चों के साथ अपने मायके जा रही हूँ। तुम्हें लगता है मैं कुछ नहीं करती, तो अब तुम खुद कर लेना। पंद्रह दिन बाद आऊँगी। प्रिया" दोपहर को जब विक्रम घर आया तो घर सूना था। चिट्ठी पढ़कर उसे गुस्सा आया। "जाने दो! देखता हूँ कितने दिन टिकती है वहाँ।" पहला दिन आसानी से निकल गया। विक्रम ने बाहर से खाना मंगवा लिया। सोचा, "कोई बड़ी बात नहीं।" दूसरे दिन सुबह उसे ऑफिस जाने के लिए शर्ट चाहिए थी। अलमारी खोली तो सारी शर्ट्स मैली पड़ी थीं। उसे याद आया कि प्रिया रोज कपड़े धोती थी। उसने सोचा, "चलो कोई बात नहीं, धोबी को दे देता हूँ।" तीसरे दिन रात को जब थका-हारा घर लौटा तो बर्तन सिंक में गंदे पड़े थे। कूड़ा इधर-उधर फैला था। घर में बदबू आने लगी थी। उसने सोचा, "कल सुबह साफ कर दूँगा।" पाँचवें दिन तक घर का हाल बुरा हो चुका था। खाना बाहर से मंगवाते-मंगवाते पेट खराब हो गया। कपड़े धोबी के यहाँ अटके हुए थे। घर में धूल की मोटी परत जम गई थी। एक दिन ऑफिस से आकर देखा तो किचन में चूहे घूम रहे थे। बाथरूम में पानी भर गया था क्योंकि नाली साफ नहीं की थी। बिस्तर गंदे और बिखरे हुए थे। दसवें दिन विक्रम का सिर चकराने लगा। खाना ठीक से नहीं मिल रहा था। बाहर का खाना रोज खाते-खाते तबीयत बिगड़ गई। घर इतना गंदा हो गया था कि रहने का मन नहीं करता था। उसे एहसास होने लगा कि प्रिया कितना काम करती थी। रोज सुबह उठकर नाश्ता बनाना, बच्चों को तैयार करना, उनका टिफिन पैक करना, घर साफ करना, कपड़े धोना, खाना बनाना, बर्तन साफ करना... और सब कुछ इतनी खामोशी से कि किसी को पता भी नहीं चलता था। पंद्रहवें दिन विक्रम की हालत देखने लायक थी। उसका वजन कम हो गया था। आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। ऑफिस में भी परफॉर्मेंस खराब हो गई थी क्योंकि घर की चिंता लगी रहती थी। उस शाम उसने तय किया कि प्रिया को वापस लाना होगा। उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। अगले दिन सुबह-सुबह वह अपनी कार लेकर प्रिया के मायके पहुँचा। दरवाजा खटखटाया। प्रिया की माँ ने दरवाजा खोला। "नमस्ते माँ जी, प्रिया है?" विक्रम ने कहा। "हाँ है। पर तुमसे मिलना नहीं चाहती।" माँ ने रूखा जवाब दिया। "प्लीज माँ जी, मुझे एक बार बात तो करने दीजिए।" थोड़ी देर बाद प्रिया बाहर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। वह पंद्रह दिनों में आराम से सो पाई थी, शांति से खाना खा पाई थी। किसी की शिकायत नहीं, किसी की डांट नहीं। "प्रिया, मुझे माफ कर दो। मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। तुम कितना काम करती हो, यह मुझे अब समझ आया। प्लीज घर चलो।" विक्रम ने हाथ जोड़े। प्रिया ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया। "यह क्या है?" विक्रम ने पूछा। "तलाक के कागज़। मैंने वकील से बात कर ली है। बस तुम्हारे दस्तखत चाहिए।" प्रिया ने ठंडी आवाज में कहा। विक्रम स्तब्ध रह गया। "तलाक? पर क्यों? मैं तो माफी मांग रहा हूँ।" "विक्रम, पाँच साल हो गए। तुमने कभी मेरी कद्र नहीं की। मैं सुबह छह बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक काम करती रही। घर, बच्चे, तुम्हारी देखभाल... सब कुछ। पर तुमने कभी एक बार भी 'थैंक यू' नहीं कहा। हमेशा शिकायत, हमेशा ताने।" प्रिया की आवाज में दर्द था। "पर अब मैं समझ गया हूँ प्रिया! मैं बदल जाऊँगा। प्लीज..." विक्रम गिड़गिड़ाया। "बदल जाओगे? कब तक? एक महीना, दो महीना? फिर वही पुरानी आदतें। नहीं विक्रम, अब मुझे इस रिश्ते में बंधे नहीं रहना। मैं भी इंसान हूँ, मेरी भी फीलिंग्स हैं। मैं भी थकती हूँ, मैं भी दर्द महसूस करती हूँ।" प्रिया की आँखें नम थीं पर आवाज दृढ़ थी। "बच्चों का क्या होगा?" विक्रम ने आखिरी कोशिश की। "बच्चे मेरे साथ रहेंगे। तुम महीने में उनसे मिल सकते हो। मैं नौकरी ढूँढ लूँगी। कम से कम वहाँ मेरी मेहनत की कद्र होगी।" प्रिया ने कहा। विक्रम के पास कहने को कुछ नहीं बचा था। उसने काँपते हाथों से वो लिफाफा पकड़ा। घर वापस आते हुए रास्ते भर वह सोचता रहा। एक घर बसाने में औरत कितना योगदान देती है, यह उसे आज समझ आया। पर समझ तब आई जब सब कुछ बिखर चुका था। उस दिन विक्रम ने जाना कि बीवी कोई नौकर नहीं होती, वह घर की धुरी होती है। उसके बिना घर, घर नहीं रहता, बस एक इमारत रह जाती है। पर यह सबक उसे बहुत महंगा पड़ा। उसने अपनी बीवी खो दी, अपना घर खो दिया, अपने बच्चों को खो दिया। कभी-कभी कुछ चीजें खोने के बाद ही उनकी कीमत पता चलती है। और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। सीख: हर रिश्ते में इज्जत और सम्मान जरूरी है। जो लोग हमारे लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, उनकी कद्र कीजिए। खासकर घर की महिलाएँ जो बिना किसी शिकायत के अपना सब कुछ परिवार के लिए न्योछावर कर देती हैं। उनका काम "सिर्फ घर का काम" नहीं है, वो एक पूरे घर को चलाने की जिम्मेदारी है। उनकी मेहनत की कद्र कीजिए, उन्हें सम्मान दीजिए, वरना जब वे चली जाएँगी, तो सिर्फ पछतावा रह जाएगा। --- पाठकों से निवेदन 🙏 अगर आप सब को यह कहानी अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ जरूर शेयर करें 🙏 ओर अपनी राय comment में दीजिए। और मुझे Follow करिए 🙏 #📚कविता-कहानी संग्रह #📓 हिंदी साहित्य #👀रोमांचक कहानियाँ 🕵️‍♂️ #⭐ प्रेरणादायक कहानियां #☝अनमोल ज्ञान
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Sachin Sharma
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शीर्षक - परिवार का त्योहार शर्मा जी का घर कभी हंसी-ख़ुशी से गूंजा करता था। तीन बेटे, एक बेटी, और उनके बच्चे - कुल मिलाकर एक खुशहाल परिवार था। लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया। बड़ा बेटा राजेश अमेरिका चला गया, मँझला बेटा संजय मुंबई में व्यापार करने लगा, छोटा बेटा अजय दिल्ली में नौकरी करता था, और बेटी प्रिया की शादी पुणे में हो गई थी। अब घर में सिर्फ शर्मा जी और उनकी पत्नी सुधा देवी रह गए थे। बड़ा सा घर अब सुनसान लगता था। जो आँगन कभी बच्चों की किलकारियों से भरा रहता था, वो अब केवल चिड़ियों की चहचहाट सुनता था। दिवाली नज़दीक आ रही थी। सुधा देवी रोज़ कैलेंडर देखती और सोचती - "इस बार तो सब आएंगे।" लेकिन एक-एक करके सबके फोन आने लगे। राजेश ने कहा, "मम्मी, इस बार ऑफिस का बहुत काम है। अगली बार पक्का आऊंगा।" संजय बोला, "पापा, मुंबई में बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला है। दिवाली के बाद आता हूँ।" अजय ने कहा, "सॉरी मम्मी, दिवाली की छुट्टियों में ससुराल जाना पड़ेगा।" प्रिया ने भी माफी मांगी, "मम्मी, इस साल ससुराल वालों के साथ दिवाली मना रही हूं। सुधा देवी का चेहरा उतर गया। उन्होंने शर्मा जी से कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी आँखों में आंसू थे। शर्मा जी सब समझ गए। उन्होंने पत्नी का हाथ थामा और कहा, "कोई बात नहीं, हम दोनों मिलकर त्योहार मना लेंगे।" दिवाली की शाम आ गई। सुधा देवी ने घर में थोड़े दिए जलाए, छोटी सी रंगोली बनाई। पर दिल नहीं लग रहा था। शर्मा जी भी चुपचाप बैठे थे। दोनों को अपने बच्चों की बहुत याद आ रही थी। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। शर्मा जी ने दरवाज़ा खोला तो सामने राजेश खड़ा था, अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ। "सरप्राइज़ पापा!" शर्मा जी की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। अभी वो कुछ कहते, तभी पीछे से संजय का परिवार भी आ गया। "क्या पापा, हमें भूल गए?" संजय मुस्कुराया। इससे पहले कि शर्मा जी कुछ समझ पाते, अजय और प्रिया भी अपने-अपने परिवार के साथ पहुंच गए। सुधा देवी रसोई से बाहर आईं और यह देखकर वहीं खड़ी रह गईं। उनका पूरा परिवार उनके सामने था। वो ख़ुशी के आंसू रो पड़ी। "मम्मी, रोती क्यों हो? हम सब आए हैं न!" प्रिया ने माँ को गले लगा लिया। राजेश ने बताया, "मम्मी, हम सबने मिलकर ये प्लान बनाया था। हम कैसे दिवाली पर घर नहीं आते? बस आपको सरप्राइज़ देना चाहते थे।" उस रात घर फिर से रोशनी से जगमगा उठा। रसोई में सुधा देवी और बहुएं मिलकर खाना बना रही थीं, आँगन में बच्चे पटाखे फोड़ रहे थे, और बेटे अपने पिता के साथ बैठकर पुरानी बातें कर रहे थे। खाने की मेज़ पर सब एक साथ बैठे। शर्मा जी ने कहा, "बच्चों, आज मुझे एहसास हुआ कि घर, घर नहीं होता अगर परिवार साथ न हो। ये ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं, तुम सब हो जो इस घर को घर बनाते हो।" सुधा देवी बोलीं, "बच्चों, मैं जानती हूँ तुम सबकी अपनी ज़िम्मेदारियां हैं, अपनी ज़िंदगी है। लेकिन इतना ज़रूर याद रखना - परिवार ही हमारी असली पूँजी है। बाकी सब आता-जाता रहता है।" संजय ने कहा, "मम्मी-पापा, हम वादा करते हैं कि अब हर त्योहार साथ मनाएंगे। भले ही हम दूर रहें, लेकिन ये परिवार हमेशा एक रहेगा।" सब बच्चों ने एक साथ कहा, "हाँ पापा, ये वादा रहा!" उस रात देर तक घर में रौनक रही। बच्चे खेलते रहे, बड़े बातें करते रहे। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, नई यादें बनीं। अगली सुबह जब शर्मा जी छत पर चाय पी रहे थे, तो नीचे आँगन में सारे बच्चे और पोते-पोतियां दादी के साथ रंगोली बना रहे थे। उनका पूरा परिवार एक साथ था। शर्मा जी मुस्कुराए। उन्हें लगा कि यही तो असली दिवाली है - रिश्तों की रोशनी, परिवार का साथ, और प्यार की मिठास। उस दिन के बाद से हर त्योहार पर पूरा परिवार इकट्ठा होने लगा। चाहे कोई कितना भी दूर हो, कितना भी व्यस्त हो, त्योहार के दिन सब अपने घर लौट आते। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि दुनिया की कोई भी चीज़ परिवार के साथ से ज़्यादा क़ीमती नहीं है। शर्मा जी का घर फिर से वैसा ही हो गया जैसा पहले था - हंसी-ख़ुशी से भरा, प्यार से सजा, और रिश्तों की मज़बूत डोर से बंधा। सीख: जीवन में सफलता, पैसा, और शोहरत सब कुछ है, लेकिन परिवार से बढ़कर कुछ नहीं। समय निकालकर अपने प्रियजनों के साथ बिताए गए पल ही असली खुशी देते हैं। त्योहार हमें याद दिलाते हैं कि रिश्ते निभाना ज़रूरी है, और परिवार ही हमारी असली ताकत है। --- पाठकों से निवेदन 🙏 प्रिय पाठकों आपको यह कहानी कैसी लगी? नीचे comment करके जरूर बताए, मैने बहुत ही मेहनत से दो दिन में यह Moral Story लिखी है, कृपया comment जरूर करें 🙏 आपके एक Comment और Follow से मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है। कहानी में बहुत अच्छी सीख है, इसलिए कहानी अपने दोस्तों और परिवार वालों के पास जरूर भेजें 🙏 #📚कविता-कहानी संग्रह #📓 हिंदी साहित्य #👀रोमांचक कहानियाँ 🕵️‍♂️ #📗प्रेरक पुस्तकें📘 #⭐ प्रेरणादायक कहानियां
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