हैप्पी गुरूनानक जयंती🙏🙏
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Govind Hashani
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*"गुरु नानक जन्म जयंती"* - प्रकाश पर्व विश्व में जब भी किसी दिव्य आत्मा का प्रकाश होता है , तब वह प्रभु का संदेश लेकर विश्व का मार्गदर्शन करता है। सन 1469 ई० में कार्तिक पूर्णिमा को भारतवर्ष के तलवंडी गांव (वर्तमान में पाकिस्तान) में जिस दिव्य आत्मा का प्रकाशन हुआ था , उनका नाम नानक था। गुरु नानक देव जी महाराज के अवतरण दिवस को प्रकाश-पर्व के रूप में मनाया जाता है। अध्यात्म के पथ पर चलने वाले साधक संवाद करते हैं और तर्क के रास्ते पर चलने वाले साधक वाद-विवाद करते हैं। वाद-विवाद की परंपरा में स्वयं ही एक दूसरे को पराजित करने की भावना का समावेश हो जाता है , लेकिन संवाद से समन्वय स्थापित होता है। गुरु नानक देव जी ने अपने संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए संवाद का माध्यम चुना। इस पर उनका एक बहुमूल्य सूत्र है - जब लगि दुनिया रहीए नानक किछु सुणीए किछु कहीए।। जिस प्रकार महात्मा बुद्ध को गया में एक वृक्ष के नीचे ज्ञान हुआ था तथा हजरत ईसा को जॉर्डन नदी के तट पर ज्ञान हुआ था , उसी प्रकार गुरु नानक देव जी को तीन दिन काली बेई नदी में अलोप रहने के बाद ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। गुरु नानक देव जी ने 25 वर्ष तक लगभग 45000 किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने जीवन में चार यात्राएं की जो उदासी के नाम से जानी जाती हैं। पहली उदासी (यात्रा) भारतवर्ष की पूर्व दिशा की है , जिसमें वे ढाका तक गये। दूसरी उदासी में वे दक्षिण में श्रीलंका तक गए। तीसरी उदासी में उन्होंने उत्तर दिशा में नेपाल , तिब्बत , सिक्किम , भूटान आदि की यात्रा की। चौथी उदासी में उन्होंने पश्चिम में मक्का-मदीना तक की यात्रा की। वे 40 दिन मक्का में रहे। भारतवर्ष के लिखित इतिहास में ऐसा कहीं नहीं मिलता कि गुरु नानक जी के पहले इतनी लंबी यात्रा और इतनी दूर तक की यात्रा किसी ने की हो। मक्का में उनकी एक घटना जगत-विख्यात है। मक्का पहुंचने के बाद एक बार रात के समय वे काबे की ओर पांव पसरकर सो गए। जीवन नामक एक मुल्ले ने उन्हें आकर कहा - तुम कैसे मुसलमान हो ? जो यह भी नहीं जानता कि काबे की ओर पांव करना कुफ्र है। उस तरफ अल्लाह का निवास है। इस पर नानक देव जी ने कहा - भाई , मुझे पता नहीं था कि उस तरफ खुद का घर है। आप मेरे पांव उसे तरफ कर दो , जिधर खुद का घर नहीं है। अब उस मुल्ले को महसूस हुआ कि खुदा तो हर तरफ है। कौन सी ऐसी दिशा या स्थान है , जिधर खुदा नहीं रहता। उसने नानक देव जी से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। काबे का प्रमुख काजी रुकनुद्दीन भी वहां पहुंचा , तो उसे भी खुदा की सर्वव्यापकता का ज्ञान गुरु नानक देव जी ने दिया। गुरु नानक देव जी महान वाणीकार थे। इनकी प्रमुख वाणियों में - जपुजी साहिब, आसा दी वार , पट्टी , बारहमाह , सिध गोसटि इत्यादि हैं। गुरु नानक देव जी की वाणी " श्री गुरु ग्रंथ साहिब " में संकलित है। गुरु नानक देव जी ने कीरत यानी कृति (कर्म) करने पर जोर दिया। उन्होंने केवल कीरत का उपदेश ही नहीं दिया बल्कि ज्योति-ज्योत समाने से पहले करतारपुर साहिब में 18 वर्ष तक खेती-बाड़ी कर दुनिया के सामने कीरत का सिद्धांत रखा , जिसे भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता में कर्म योग के अंतर्गत प्रस्तुत किया था। एक बार किसी विद्वान ने रविंद्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित राष्ट्रगान " जन-गण-मन" के बारे में चर्चा करते हुए यह कहा कि अपने भारत के लिए जैसा राष्ट्रगान लिखा है , वैसा ही विश्व के लिए राष्ट्रगान लिखें। तो विश्व कवि रवींद्र नाथ ठाकुर ने कहा कि ऐसा राष्ट्रगान गुरु नानक देव जी महाराज सदियों पहले ही लिख गए हैं। ऐसा कहते हुए उन्होंने नानक साहब के इस " शबद " का हवाला दिया - गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती। धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फुलंत जोती।। उनके कहने का तात्पर्य यह है कि किसी मूर्ति की आरती करने मात्र से ही भगवान की पूजा नहीं हो जाती है। भगवान की पूजा तो स्वत: प्रकृति कर रही है। इस तथ्य को उन्होंने उपयुक्त शबद के माध्यम से रखा। 🙏आप सभी क़ो मेरी तरफ से प्रकाश-पर्व की शुभकामनाएं।🙏 #गुरूनानक #🎂गुरूनानक जयंती #हैप्पी गुरूनानक जयंती🙏🙏 #गुरूनानक जयंती
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